<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-6488502539236057488</id><updated>2012-01-25T11:09:32.133+05:30</updated><category term='Madhai'/><category term='Handloom'/><category term='Narmada'/><category term='Corruption'/><category term='Writing Tips'/><category term='Village'/><category term='Hope'/><category term='Raikheda'/><category term='GM-Crop'/><category term='River'/><category term='YatraVritant'/><category term='Masanobu Fukuoka'/><category term='&apos;Media Education&apos;'/><category term='Culture'/><category term='Tribal'/><category term='OrganicFarming'/><category term='Asian College of Journalism'/><category term='MediaWorkshop'/><category term='rivers'/><category term='Ujjain'/><category term='Agriculture'/><category term='Chhattishgarh'/><category term='Diary'/><category term='water'/><category term='Narsinghpur'/><category term='Ganiyari'/><category term='JSS'/><category term='kerala'/><category term='Hashiye-Par'/><category term='Ajandhana'/><category term='Nature Farming'/><category term='Beej Bachao Andolan'/><category term='irrigation'/><category term='Satpura'/><category term='PipariyaSrajan'/><category term='Raju Titus'/><category term='Hoshangabad'/><category term='SarangSchool'/><category term='Health'/><category term='Education'/><category term='Youth'/><title type='text'>| Hashiye Par |  हाशिये पर |</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://hashiye-par.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>Baba Mayaram</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07974100393280656159</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TQ2zSrZyPhI/AAAAAAAAAKE/mmnqrZO0TCI/S220/baba_fb.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>27</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6488502539236057488.post-7115757401839204313</id><published>2011-08-18T12:48:00.001+05:30</published><updated>2011-08-18T15:26:55.343+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Hashiye-Par'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Corruption'/><title type='text'>भ्रष्टाचार की लड़ाई को वैकल्पिक राजनीति से जोड़ना होगा</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div closure_uid_6c5n39="142"&gt;&lt;div closure_uid_kamk2f="134"&gt;भ्रष्टाचार पर अन्ना हजारे के आंदोलन को अभूतपूर्व समर्थन मिल रहा है। सरकार और अन्ना आमने सामने आ गए हैं। उन्हें गिरफतार कर जेल भेज दिया है और उन्होंने जेल में ही अनषन जारी रखा है। इधर देश भर में उनके आंदोलन के समर्थन में रैली, धरना और मोमबत्ती जलाकर समर्थन दिया जा रहा है। सरकार सांसत में है। &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब भी अपने देश में कोई समुदाय या व्यक्ति अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ता है या व्यवस्था पर सवाल उठाता है तो सरकार उसकी बात सुनने के बजाय उसे दबाने की भरसक कोशिष करती है। हाल ही में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बाबा रामदेव ने दिल्ली में अपना आंदोलन शुरू किया था तो पुलिस ने आधी रात को पहुंचकर उन्हें बलपूर्वक वहां से खदेड़ दिया था। समर्थकों पर डंडे बरसाए गए थे। और अब अन्ना के खिलाफ आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस सरकार की तरफ से ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है जिसमें हठधर्मिता और तानाशाही की बू आती है। डंडे का जोर दिखाया जा रहा है। हालांकि जन समर्थन को देखते हुए अब सरकार के रूख में नरमी आई है। जिस तरह से अन्ना को मीडिया का समर्थन मिल रहा है, वह स्वागत योग्य है। लेकिन जमीनी संघर्शों और जल, जंगल और जमीन की लड़ाईयों को उचित स्थान नहीं मिल पा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश के कई कोनों में इस समय जमीनी स्तर पर कई आंदोलन चल रहे हैं। उनका दमन करने की खबरें आती रहती हैं। उनके कार्यकर्ताओं पर मुकदमे और उन्हें जेल कर दी जाती है। वही रामदेव के साथ हुआ और वैसा ही अन्ना हजारे के साथ करने की तैयारी लग रही है। म्ुाुद्दे से हटकर उसे संसद और सिविल सोसायटी के बीच टकराव की तरह पेश किया जाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div closure_uid_6c5n39="159"&gt;&lt;div closure_uid_kamk2f="160"&gt;अन्ना की मुहिम मौजू हैं, उससे असहमत नहीं हुआ जा सकता। क्योंकि यह एक ऐसा मुद्दा है जो देश केा खोखला कर रहा है। ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार फैला हुआ है। क्या नेता और क्या अफसर सभी इसमें डूबे हुए हैं। इनका ठेकेदार, कंपनियों पूंजीपतियों, दलालों और माफियाओं के साथ गठजोड़ बन गया है। घोटाले पर घोटाले सामने आ रहे हैं। पहले कुछ लाख या करोड़ के घोटाले होते थे, अब लाख करोड़ तक पहुंच गए हैं। &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div closure_uid_kamk2f="145" style="text-align: left;"&gt;ताजा मामला 2 जी स्पेक्टम घोटाले का है जिसकी राषि 1.74&amp;nbsp;&amp;nbsp;लाख&amp;nbsp;करोड़&amp;nbsp;&amp;nbsp;है। इस मामले में ूर्व मं.त्री ए राजा जेल में हैं। इसी मामले में तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री की बेटी कोनीमोझी भी जेल में हैं। राष्ट्रमंडल घोटाले के आरोप में सुरेश कलमाडी जेल की हवा खा रहे हैं। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;जानकारों का मानना है कि इन घपलों-घोटाला का दौर का गहरा संबंध उदारीकरण और वैष्वीकरण की नीतियों से है। वे मानते हैं कि वर्ष 1991 में जब से ये नीतियों देश में लागू हुई हैं। इसमें देशी-विदेशी कंपनियों की बड़ी भूमिका है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरकारी तंत्र के भ्रष्टाचार के अलावा बाजार का भी भ्रष्टाचार बढा है। शिक्षा और चिकित्सा में बाजार की बेतहाशा लूट बढ़ी है। जो कानूनी रूप से तो वैध हो सकती हैं लेकिन जनता को लूटा जा रहा है। जैसे स्कूल या डॉक्टरों की अनाप-शनाप शुल्क वसूली। आजकल शिक्षा एक फलता-फूलता व्यापार है, इसमें आम लोगों की गाड़ी कमाई का पैसा लूटा जा रहा है। शायद इसे कानून बनाकर भी रोकना मुश्किल है। जल, जंगल, जमीन जैसे प्राकृतिक संसाधनों को कंपनी और उद्योगों को सौंपा ाज रहा है। इसमें भी काफी भ्रष्टाचार हो रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब सवाल यह है कि भ्रष्टाचार कैसे खत्म होगा? इसके सामाजिक और आर्थिक की पड़ताल जरूरी है। छोटे और बड़े भ्रश्टाचार में अंतर करना जरूरी है। एक साधारण व्यक्ति के भ्रश्टाचार और सत्ता में बैठे लोगों के भ्रष्टाचार का अंतर करना जरूरी है। भ्रश्टाचार का एक आयाम उपभोक्तादी संस्कृति भी है, जिस पर सोचना जरूरी है। देश में अलग-अलग चल रहे छोटे-छोटे आंदोलनों को इससे जोड़ना पड़ेगा और सबसे जरूरी है कि इसके लिए जनता को जागरूक होना पड़ेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सही है कि कुछ हद तक लोकपाल जैसे कानून से लगाम लगेगी पर पूरी तरह नहीं। धर्म, संस्कृति से अच्छाई का संदेश लोगों को मानव मूल्यों से संचालित करता है। गांधी के विचार हमारा मार्गदर्षन कर सकते हैं। यानी इस मामले में एक व्यापक दृष्टि जरूरी है तभी इस अभूतपूर्व चेतना से एक वैकल्पिक राजनीति बन सकती है, जो देश की जरूरत है।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6488502539236057488-7115757401839204313?l=hashiye-par.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hashiye-par.blogspot.com/feeds/7115757401839204313/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2011/08/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/7115757401839204313'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/7115757401839204313'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2011/08/blog-post.html' title='भ्रष्टाचार की लड़ाई को वैकल्पिक राजनीति से जोड़ना होगा'/><author><name>Baba Mayaram</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07974100393280656159</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TQ2zSrZyPhI/AAAAAAAAAKE/mmnqrZO0TCI/S220/baba_fb.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6488502539236057488.post-2513789623395456046</id><published>2011-06-09T22:35:00.000+05:30</published><updated>2011-06-09T22:35:23.936+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Hashiye-Par'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Satpura'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Tribal'/><title type='text'>जंगल हमरा मायका, जंगल ही ससुराल</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-1awQDp6a0zo/TfD83ATABgI/AAAAAAAAALw/fB0S2Hn5lpM/s1600/Picture+035.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://4.bp.blogspot.com/-1awQDp6a0zo/TfD83ATABgI/AAAAAAAAALw/fB0S2Hn5lpM/s320/Picture+035.jpg" t8="true" width="240" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;दुपहरी का समय था। भोजन करके लोग आराम कर रहे थे। हम गांव के अंतिम छोर पर स्थित घर में जाकर रुके। इस घर में महिलाओं के अलावा कोई पुरुष सदस्य नहीं था। बच्चे उघारे बदन खेल रहे थे। महिलाएं थक-हारकर खटिया पर आराम कर रही थी। वे सुबह महुआ बीनने गई थीं। यह दृष्य होषंगाबाद जिले में सोहागपुर विकासखंड कें वनग्राम ढाबा का है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आदिवासी और जंगल एक दूसरे के पूरक हैं। उनमें परस्पर सहअस्तित्व है। 50 की उम्र पार कर चुकी सनिया बाई जंगल से निस्तार के बारे में कहती हैं कि जंगल ही हमारा जीवन है। हम जंगल से हैं और जंगल भी हमसे है। जंगल के बिना आदिवासी का जीवन वैसा ही है जैसा पानी के बिना मछली।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे आगे कहती है कि जंगल के सहारे हमारी कई पीढियां बीत गईं। छुटपन से लेकर अब तक उनकी पूरी जिंदगी ही जंगल में ही बीती है। छोटे से ही जंगल में अपने मां-बाप के साथ जाने लगी थी। मायके के गांव खडपाबड में स्कूल तो था नहीं इसलिए शुरू से ही घर के काम में हाथ बंटाने लगी। मुझे उनकी बात सुनकर पिपरिया के युवा कवि का एक दोहा याद आ गया -जंगल हमरा मायका, जंगल ही ससुराल, जंगल भीगी आंख है, जंगल आंखें लाल।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आमतौर पर जब हम जंगल में रहने वाले आदिवासियों के विकास के बारे में बात करते हैं तो वह मौद्रिक चीजों के बारे में ही केंद्रित होती है। लेकिन जंगल से कई तरह की अमौद्रिक चीजें मिलती हैं, उन पर ध्यान नहीं जाता, जो रोजमर्रा की बड़ी जरूरतें पूरी करती हैं। ये सब उन्हें प्रचुर मात्रा में निःशुल्क उपलब्ध होती हैं। और अब इसे वन अधिकार कानून ने भी मान्यता दे दी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सनिया कहती हैं कि जंगल से पहले बहुत सी चीजें मिलती थीं। तवा बांध में बहुत सा जंगल डूब गया। इस कारण अब बहुत कम वनोपज मिलती है। पहले जंगल कोयला बनाने के लिए काटा गया। यहां से ट्रकों कोयला बाहर जाता था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह बताती है कि पहले हमें महुआ, गुल्ली, शहद, तेंदू, तेंदूपत्ता, अचार, मेनर, आंवला, रामबुहारी, पत्तल-दोने, भाभर घास, भमोड़ी (मशरूम) सब कुछ मिलता था। बांस और घर की मरम्मत करने के लिए लकड़ी मिलती थी। लेकिन अब इसमें कमी आई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके अलावा बच्चों के लिए पोषण की चीजें निःशुल्क मिलती है। उन्होंने इसकी लंबी फेहरिस्त बनवाई-बेर, जामुन, अमरूद, मकोई, सीताफल, आम और कई तरह के फल-फूल सहज ही उपलब्ध हो जाते थे। और बहुत से अब भी मिलते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आदिवासी जंगल, पेड, पत्थर को देवता मानता है। उनका जीवन प्रकृति से बहुत करीब है। आदिवासी का जंगल के साथ मां-बेटे का रिश्ता है। वे जंगल से उतना ही लेते हैं जितनी उनको जरूरत है। सबसे कम प्राकृतिक संसाधनों में गुजर-बसर करने वाला है आदिवासी समुदाय।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन होशंगाबाद जिले में आदिवासी कई परियोजनाओं से विस्थापित हुए हैं। उन्हे अपने घरों से बेदखल होना पड़ा है। यहां 1970 में बने तवा बांध से 44 गांव और भारतीय फौज द्वारा गोला-बारूद के परीक्षण के लिए बनाई गई प्रूफरेंज के लिए 26 गांव विस्थापित किए गए। इसके बाद आर्डिनेंस फैक्टी में 9 गांवों के लोगों की जमीनें गईं। फिर 1981 में सतपुड़ा नेशनल पार्क में 2 गांवों की जमीनें गईं। कुल मिलाकर, 80 गांव विस्थापित हुए। जिन्हें नाममात्र का मुआवजा मिला। इससे जंगल भी नष्ट हुआ और लोगों का निस्तार भी प्रभावित हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब वन्य प्राणियों के संरक्षण के लिए सतपुड़ा टाइगर रिजर्व बनाया गया है। इसमें पहले से संरक्षित तीन क्षेत्र ष्षामिल किए गए है- सतपुड़ा राश्टीय उद्यान, बोरी अभयारण्य और पचमढ़ी अभयारण्य। सतपुड़ा टाइगर रिजर्व का क्षेत्रफल करीब 1500 है। इसमें निस्तार के लिए कई तरह की पाबंदियां लगाई जा रही हैं। इसलिए भी वन अधिकार कानून के तहत अधिकार महत्वपूर्ण है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब पहली बार वन अधिकार कानून के तहत् आदिवासियों के अधिकारों को मान्यता मिल रही है। इससे आदिवासियों को उम्मीदें हैं। लेकिन इस कानून को ढंग से क्रियान्वयन नहीं किया जा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आदिवासियों को वन अधिकार कानून के तहत जमीन के अधिकार के साथ सामुदायिक अधिकार भी दिया जाना है। इस कानून के अनुसार जंगल से निस्तार, लघु वनोपज का अधिकार और जंगल में अपने मवेशी चराने का अधिकार मिलेगा। इसके अलावा, पानी, सिंचाई, मछली एवं पानी की अन्य उपज का अधिकार भी मिलेगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सनिया बाई या उसकी जैसी अन्य महिलाओं को वन अधिकार कानून के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। लेकिन जमीन का अधिकार मिलने से वह खु्श थी। उसने हमें अधिकार पत्र भी दिखाया। पर सामुदायिक अधिकार का दावा गांव की तरफ से हुआ है या नहीं वह नहीं बता सकी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्राम वन अधिकार समिति, मगरिया के अध्यक्ष व सरपंच अषोक कुमार कुमरे का कहना है कि सामुदायिक दावा की उन्हें जानकारी नहीं थी। उन्हें वन अधिकार कानून की प्रक्रिया की कोई जानकारी सरकारी स्तर पर नहीं दी गई और न ही कोई प्रशिक्षण दिया गया। उन्होंने कहा कि दावा फार्म इतना कठिन और जटिल था कि हमारे पल्ले ही नहीं पड़ा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आदिवासी विकास, होशंगाबाद के सहायक आयुक्त के द्वारा जारी की गई जानकारी के अनुसार सामुदायिक दावों की संख्या मात्र 23 है। एक जिले के हिसाब से यह संख्या बहुत ही कम है। इसका साफ मतलब है कि सामुदायिक दावे जानकारी के अभाव में नहीं भरे गए हैं, जिन्हें भरवाए जाने चाहिए। क्योंकि जमीन के अधिकार के सामुदायिक अधिकार भी जरूरी है, जो कानून के अनुसार भी दिए जाने चाहिए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(यह लेख विष्व पर्यावरण दिवस के मौके पर सर्वोदय प्रेस सर्विस, इंन्दौर से 27&amp;nbsp;मई&amp;nbsp; को जारी हो चुका है)&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6488502539236057488-2513789623395456046?l=hashiye-par.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hashiye-par.blogspot.com/feeds/2513789623395456046/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2011/06/blog-post.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/2513789623395456046'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/2513789623395456046'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='जंगल हमरा मायका, जंगल ही ससुराल'/><author><name>Baba Mayaram</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07974100393280656159</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TQ2zSrZyPhI/AAAAAAAAAKE/mmnqrZO0TCI/S220/baba_fb.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-1awQDp6a0zo/TfD83ATABgI/AAAAAAAAALw/fB0S2Hn5lpM/s72-c/Picture+035.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6488502539236057488.post-7046916274444783812</id><published>2011-04-21T15:20:00.001+05:30</published><updated>2011-04-21T15:26:39.994+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='&apos;Media Education&apos;'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='MediaWorkshop'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Ujjain'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Writing Tips'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Hoshangabad'/><title type='text'>ग्रामीण कार्यकर्ताओं की लेखन कार्यशाला</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-Vglqk_nqD6M/Ta_7sMu6sTI/AAAAAAAAALo/uWPXA8-geB4/s1600/Picture+011.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="300" i8="true" src="http://3.bp.blogspot.com/-Vglqk_nqD6M/Ta_7sMu6sTI/AAAAAAAAALo/uWPXA8-geB4/s400/Picture+011.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&amp;nbsp;जब कभी मै लेखन या मीडिया कार्यशाला करता हूं तब इस सवाल से सामना होता है कि लेखन कैसे शुरू करें? यह सवाल मौजूं है। पर जब मैं कहता हूं कि लिखना लिखने से आता है। जैसे बोलने से बोलना आता है, चलने से चलना आता है या पढ़ने से पढ़ना आता है। तो कई बार यह सीधी बात समझ नहीं आती। सिद्धांतत इसे मान भी लिया जाए तो भी बात आगे नहीं बढ़ पाती। लेखन शुरू नहीं हो पाता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;10 से 12 मार्च तक उज्जैन में लेखन कार्यशाला हुई। इस कार्यशाला में यह सवाल एक कैथोलिक सिस्टर ने किया। मैंने पूछा आखिर लेखन शुरू करने में क्या दिक्कत आती है? जवाब आया- अच्छे शब्द नहीं मिलते। अगर अच्छे शब्द से उनका मतलब उत्कृष्ट और मानक हिन्दी के शब्दों से है तो माफ कीजिए इससे बचना जरूरी है। लिखने के लिए जरूरी है जैसा हम सोचते हैं, वैसा लिखें, शब्दजाल में न फंसे।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-OYUg_B4yLD4/Ta_5i2ANxvI/AAAAAAAAALg/xa3Z0qqkE7w/s1600/Picture+082.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" i8="true" src="http://1.bp.blogspot.com/-OYUg_B4yLD4/Ta_5i2ANxvI/AAAAAAAAALg/xa3Z0qqkE7w/s320/Picture+082.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;लेखन करने से पहले जानकारी चाहिए। जैसे रोटी बनाने के लिए आटा चाहिए। या किसी चिड़िया को घोंसला बनाने के लिए घास के छोटे-छोटे तिनके चाहिए। इसी प्रकार हमें पाठक की जिज्ञासाओं को ध्यान में रखकर जानकारी जुटाना चाहिए। क्या,कब, कहां, कौन, क्यों और कैसे जैसे सवालों के जवाब चाहिए। जिसे पत्रकारिता की भाशा में 5 डब्ल्यू और एक एच कहा जाता है। इसके लिए हमेशा कापी-पेन साथ में हो और कोई नई जानकारी मिले तो तत्काल नोट करना चाहिए।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;कई बार हम लिखने के लिए बैठते हैं और एक लाइन लिखते हैं। फिर उसे काटते हैं। यह अभ्यास चलता रहता है। थक-हार कर हम एक तरफ कलम-कागज समेटकर रख देते हैं। सोचते हैं कि यह हमारे वश का काम नहीं। है। अगर जानकारी हो तो सरल शब्दों में अपनी बात लिखें तो शायद यह दिक्कत नहीं आएगी। मैंने ऐसे कई प्रतिभागियों को देखा है कि अगर उन्हें सिरा पकड़ में आ जाए तो वे एक बार शुरू होते हैं तो लिखते ही जाते हैं। जैसे कोई महिला सब्जी काटने बैठती है तो फिर काटती ही जाती है। फिर रूकती नहीं। लेखन भी मु्श्किल नहीं। बशर्ते उनके पास कहने को कुछ हो। अनुभव या जानकारी हो।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-c99xSfg2cBE/Ta_60XLY0uI/AAAAAAAAALk/H0cvt5LFv88/s1600/Picture+067.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" i8="true" src="http://1.bp.blogspot.com/-c99xSfg2cBE/Ta_60XLY0uI/AAAAAAAAALk/H0cvt5LFv88/s320/Picture+067.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;काल्पनिक या अमूर्त ढंग से न लिखकर किसी वास्तविक घटना पर लिखना अच्छा रहता है। आंखों देखा हाल, डायरी या विवरणात्मक ढंग से किसी घटना को लिखा जा सकता है। इसी प्रकार बहुत सारे मुद्दो पर न लिखकर किसी एक मुद्दे पर उसके अलग-अलग पहलुओं पर लिखना चाहिए। कभी-कभी हम लिखते समय ही गलत-सही का विचार कर उसमें काटा-पीटी करने लगते हैं। इससे बचें तो ठीक रहेगा। एक बार लिखने के बाद यह काम बाद में इत्मीनान से किया जा सकता है। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;इस कार्यशाला में 20 प्रतिभागी थे जिसमें अधिकांश गैर सरकारी संस्था कृपा वेलफेयर सोसायटी के कार्यक्रम संयोजक व ग्रामीण कार्यकर्ता थे। हमने इन दिनों में संपादक के नाम पत्र, खबरें बनाना, केस स्टडी, समूह चर्चा के आधार पर रिपोर्ट बनाने का अभ्यास किया। इसके साथ ही फील्ड विजिट भी की। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;उज्जैन के पास कोल्हूखेड़ी गांव गए, जो जहां सपेरा समुदाय के लोग रहते हैं। घुमतू समुदाय के लोग पहले इधर-उधर जा-जाकर अपना पेट पालते थे। लेकिन अब कोल्हूखेड़ी में स्थाई बस गए हैं। हालांकि अब इनका परंपरागत काम यानी सांप पकड़ना और उसे लेकर भीख मांगना बहुत कम हो गया है। ये अब मजदूरी का काम भी करते हैं। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;तीन समूहों में विभक्त हमारे प्रतिभागियों ने यहां बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों से साक्षात्कार लिए। और इसके आधार पर वापस कक्षा में आकर दीवार अखबार तैयार किए। जिसका हर समूह ने प्रस्तुतिकरण किया। इस अवसर पर संस्था के संचालक फादर सुनील उज्जाई ने दीवार अखबार पर टिप्पणी की और सबका आभार माना।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-J4VLjc-fRVE/Ta_8noILOLI/AAAAAAAAALs/zXCyAEvW3Cw/s1600/Picture+094.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" i8="true" src="http://4.bp.blogspot.com/-J4VLjc-fRVE/Ta_8noILOLI/AAAAAAAAALs/zXCyAEvW3Cw/s320/Picture+094.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6488502539236057488-7046916274444783812?l=hashiye-par.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hashiye-par.blogspot.com/feeds/7046916274444783812/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2011/04/blog-post.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/7046916274444783812'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/7046916274444783812'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2011/04/blog-post.html' title='ग्रामीण कार्यकर्ताओं की लेखन कार्यशाला'/><author><name>Baba Mayaram</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07974100393280656159</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TQ2zSrZyPhI/AAAAAAAAAKE/mmnqrZO0TCI/S220/baba_fb.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-Vglqk_nqD6M/Ta_7sMu6sTI/AAAAAAAAALo/uWPXA8-geB4/s72-c/Picture+011.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6488502539236057488.post-7042692066019048263</id><published>2011-03-22T15:54:00.001+05:30</published><updated>2011-03-22T21:51:45.263+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Raju Titus'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Nature Farming'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Masanobu Fukuoka'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Asian College of Journalism'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Hoshangabad'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Agriculture'/><title type='text'>कुदरती खेती का एक अनूठा प्रयोग</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;table align="center" cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="margin-left: auto; margin-right: auto; text-align: center;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="https://lh3.googleusercontent.com/-0MCHRJ6ezZ8/TYhzqtPg3ZI/AAAAAAAAALQ/s5KH5OmQe4M/s1600/acj+.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" height="308" r6="true" src="https://lh3.googleusercontent.com/-0MCHRJ6ezZ8/TYhzqtPg3ZI/AAAAAAAAALQ/s5KH5OmQe4M/s400/acj+.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;एशियन कॉलेज औफ जर्नालिज्म के छात्र-छात्राएं&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;पिछले दिनों मैं होशंगाबाद के राजू टाइटस फार्म गया, जहां वे पिछले 25 बरस से कुदरती खेती कर रहे हैं। मध्यप्रदेश में होशंगाबाद-भोपाल रोड़ पर स्थित टाइटस फार्म की शहर से दूरी करीब 3 किलोमीटर है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे साथ चैन्नई के मशहूर एशियन कॉलेज औफ जर्नालिज्म के प्रतिभाशाली छात्र-छात्राएं भी थे। राजू भाई ने द्वार पर हमारा स्वागत इस सवाल के साथ किया कि क्या आपने पीपली लाइव देखी है। वे बोले- आज हर किसान नत्था बन गया है। इन दिनों मध्यप्रदेश में किसानों की आत्महत्या के समाचार लगातार आ रहे हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ कदम चलते ही हम गेहूं के खेत में पहुंच गए। हवा के साथ गेहूं के हरे पौधे लहलहा रहे थे। हम एक पेड़ की छाया तले खड़े होकर राजू भाई का अनुभव सुन रहे थे। कुछ अचरज की बात यह थी कि खेत में फलदार और अन्य जंगली पेड़ थे जिनके नीचे गेहूं की फसल थी। आम तौर पर खेतों में पेड़ नहीं होते हैं। लेकिन यहां अमरूद, नीबू और बबूल के पेड़ों के नीचे गेहूं की फसल थी। अमरूद के फलों से लदे पेड़ देखकर सुखद आश्चर्य हो रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;table cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="float: right; margin-left: 1em; text-align: right;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="https://lh5.googleusercontent.com/-Jnr7IQUf0As/TYh1GebvKZI/AAAAAAAAALY/yD6ckaV-STE/s1600/raju.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; margin-bottom: 1em; margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" height="271" r6="true" src="https://lh5.googleusercontent.com/-Jnr7IQUf0As/TYh1GebvKZI/AAAAAAAAALY/yD6ckaV-STE/s320/raju.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;राजू टाइटस &lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;वे बताते हैं कि पेड़ों के कारण खेतों में गहराई तक जड़ों का जाल बुना रहता है। और इससे भी जमीन ताकतवर बनती जाती है। अनाज और फसलों के पौधे पेड़ों की छाया तले अच्छे होते हैं। छाया का असर जमीन के उपजाऊ होने पर निर्भर करता है। चूंकि हमारी जमीन की उर्वरता और ताकत अधिक है, इसलिए पेड़ों की छाया का फसल पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;आधुनिक खेती या रासायनिक खेती प्रकृति के खिलाफ है। रासायनिक खादों व कीटनाशको से हमारी खेतों की मिट्टी की उर्वरता खत्म हो रही है। मिट्टी में मौजूद जीवाणु और जैव तत्त्व मर रहे हैं। जबकि कुदरती खेती,, प्रकृति के साथ होती है। यद्यपि प्राकृतिक खेती की शुरूआत जापान के कृपि वैज्ञानिक फुकुओवा ने की है। लेकिन हमारे यहां भी ऐसी खेती होती रही है। मंडला के बैगा आदिवासी बिना जुताई की खेती करते हैं जिसे झूम खेती कहते हैं।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;यहां बिना जुताई (नो टिलिग) और बिना रासायनिक खाद के यह कुदरती खेती की जा रही है। बीजों को मिट्टी की गोली बनाकर बिखेर दिया जाता है और वे उग आते हैं। यह सिर्फ खेती की एक पद्धति भर नहीं है बल्कि जीवनशैली है। यहां का अनाज और फल जैविक हैं और पानी और हवा शुद्ध है। यहा कुआं है, जिसमें पर्याप्त पानी है।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;रासायनिक खेती का दुष्प्रभावों का उन्हे प्रत्यक्ष अनुभव है। वे खुद पहले रासायनिक खेती करते थे। पर उसमें लगातार हो रहे घाटे और मिट्टी की उर्वरता कम होने के कारण उसे छोड़ दिया। लेकिन उन्होंने फुकुओवा की किताब एक तिनके से क्रांति को पढ़कर फिर खेती की ओर रूख किया और तबसे अब तक कुदरती खेती कर रहे हैं।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;a href="https://lh6.googleusercontent.com/-lGY1G2h3D0U/TYh0rYTwLlI/AAAAAAAAALU/J4oUZw9LouI/s1600/titus+farm.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" r6="true" src="https://lh6.googleusercontent.com/-lGY1G2h3D0U/TYh0rYTwLlI/AAAAAAAAALU/J4oUZw9LouI/s320/titus+farm.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;बिना जुताई के खेती मुश्किल है, ऐसा लगना स्वाभाविक है। जब पहली बार मैंने सुना था तब मुझे भी वि्श्वास नहीं हुआ था। लेकिन देखने के बाद सभी शंकाएं निर्मूल हो गई। दरअसल, इस पर्यावरणीय पद्धति में मिट्टी की उर्वरता उत्तरोतर बढ़ती जाती है। जबकि रासायनिक खेती में यह क्रम्शः घटती जाती है। और एक स्थिति के बाद उसमें कुछ भी नहीं उपजता। वह बंजर हो जाती है।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;करीब 12 एकड़ के फार्म में सिर्फ 1 एकड़ में खेती की जा रही है और बाकी 11 एकड़ में सुबबूल (आस्टेलियन अगेसिया) का जंगल है। सुबबूल एक चारे की प्रजाति है। आगे नाले को पार कर हम जंगल में पहुंच चुके थे। यहां कुछ मजदूर महिलाएं लकड़ी सिर पर रखकर ले जा रही थी जबकि कुछ पुरु्श पेड़ों से टहनियों की कटाई-छंटाई कर रहे थे।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;राजू भाई बताते हैं कि हम खेती को भोजन की जरूरत के हिसाब से करते हैं, बाजार के हिसाब से नहीं। हमारी जरूरत एक एकड़ से ही पूरी हो जाती है। यहां से हमंे अनाज, फल और सब्जियां मिलती हैं, जो हमारे परिवार की जरूरत पूरी कर देते हैं। जाड़े मे गेहूं, गर्मी मे ंमक्का व मूंग और बारि्श में धान की फसल ली जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबबूल के जंगल से हमें मवे्शियों का चारा और लकड़ियां मिल जाती हैं। लकड़ियों का टाल है, जहां से जलाऊ लकड़ी बिकती हैं, जो हमारी आय का मुख्य स्त्रोत है। उनके मुताबिक वे एक एकड़ जंगल से हर वर्ष करीब ढाई लाख रू की लकड़ी बेच लेते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आमतौर पर किसान अपने खेतों से अतिरिक्त पानी को नालियों से बाहर निकाल देते हैं लेकिन यर्हां ऐसा नहीं किया जाता। वे कहते हैं कि हम खेतों को ग्रीन कवर करके रखते हैं। बारि्श में कितना ही पानी गिरे, वह खेत के बाहर नहीं जाता। खेतों में जो खरपतवार, ग्रीन कवर या पेड़ होते हैं, वे पानी को सोखते हैं। इससे एक ओर हमारे खेतों में नमी बनी रहती है। दूसरी ओर वह पानी वाष्पीकृत होकर बादल बनता है और बारि्श में पुन् बरसता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन खेतों में पुआल, नरवाई, चारा, तिनका व छोटी-छोटी टहनियों को पड़ा रहने देते हैं, जो सड़कर जैव खाद बनाती हैं। खेत में तमाम छोटी-बड़ी वनस्पतियों के साथ जैव विविधताएं आती -जाती रहती हैं। और हर मौसम में जमीन ताकतवर होती जाती है। इस जमीन में पौधे भी स्वस्थ और ताकतवर होते हैं जिन्हें जल्द बीमारी नहीं घेरती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां जमीन को हमे्शा ढककर रखा जाता है। यह ढकाव हरा या सूखा किसी भी तरह से हो, इससे फर्क नहीं पड़ता। इस ढकाव के नीचे अनगिनत जीवाणु, केंचुए और कीड़े-मकोड़े रहते हैं। और उनके ऊपर-नीचे आते-जाते रहने से जमीन पोली और हवादार व उपजाऊ बनती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जमीन जुताई से भू-क्षरण होता है। जब जमीन की जुताई की जाती है और उसमें पानी दिया जाता है तो खेत में कीचड़ हो जाती है। बारि्श होती है तो पानी नीचे नहीं जा पाता और तेजी से बहता है। पानी के साथ खेत की उपजाऊ मिट्टी बह जाती है। इस तरह हम मिट्टी की उपजाऊ परत को बर्बाद कर रहे हैं और भूजल का पुनर्भरण भी नहीं कर पा रहे हैं। साल दर साल भूजल नीचे चला जा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;table cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="float: right; margin-left: 1em; text-align: right;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/f/fa/Masanobu-Fukuoka.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; margin-bottom: 1em; margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" height="307" r6="true" src="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/f/fa/Masanobu-Fukuoka.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;कृपि वैज्ञानिक फुकुओवा &lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;कुदरती खेती एक जीवन पद्धति है। इसमें मानव की भूख मिटाने के साथ समस्त जीव-जगत के पालन का विचार है। यह पूरी तरह अहिंसक खेती भी है। इससे मिट्टी-पानी का संरक्षण भी होता हैं। इसे ऋषि खेती इसलिए कहा जाता है कि क्योंकि ऋषि मुनि कंद-मूल, फल और दूध को भोजन के रूप में ग्रहण करते थे। बहुत कम जमीन पर मोटे अनाजों को उपजाते थे। वे धरती को अपनी मां के समान मानते थे। उससे उतना ही लेते थे, जितनी जरूरत होती थी। सब कुछ निचोड़ने की नीयत नहीं होती थी। इस सबके मद्देनजर कुदरती खेती भी एक रास्ता है। कुदरती का यह प्रयोग सराहनीय होने के साथ-साथ अनुकरणीय भी है।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6488502539236057488-7042692066019048263?l=hashiye-par.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hashiye-par.blogspot.com/feeds/7042692066019048263/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2011/03/blog-post.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/7042692066019048263'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/7042692066019048263'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2011/03/blog-post.html' title='कुदरती खेती का एक अनूठा प्रयोग'/><author><name>Baba Mayaram</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07974100393280656159</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TQ2zSrZyPhI/AAAAAAAAAKE/mmnqrZO0TCI/S220/baba_fb.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='https://lh3.googleusercontent.com/-0MCHRJ6ezZ8/TYhzqtPg3ZI/AAAAAAAAALQ/s5KH5OmQe4M/s72-c/acj+.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6488502539236057488.post-8639512917467035272</id><published>2011-01-22T20:25:00.000+05:30</published><updated>2011-01-22T20:25:46.840+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Hashiye-Par'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='&apos;Media Education&apos;'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='MediaWorkshop'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Education'/><title type='text'>गांव की खबरों से जुड़ते बच्चे</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TTrj80wdD9I/AAAAAAAAAKw/5gg6rkICzEs/s1600/IMG_4476.JPG" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="300" s5="true" src="http://2.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TTrj80wdD9I/AAAAAAAAAKw/5gg6rkICzEs/s400/IMG_4476.JPG" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;इस वर्ष खाली रह गया तालाब, यह शीर्षक था एक दीवार अखबार का, जो सतपुड़ा पर्वतीय क्षेत्र के एक छोटे से गांव के स्कूली बच्चों ने तैयार किया था। रंग-बिरंगी स्याही से हस्तलिखित अखबारों को जब मैंने देखा तो देखता ही रह गया। हरे-भरे खेत, जंगल, मोर, शेर, नदी, नहर और तालाब के सुंदर चित्रों ने मन मोह लिया। यह दीवार अखबार बच्चों ने तीन दिनी कार्यशाला के बाद बनाए थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2 से 4 दिसंबर तक चली मीडिया कार्यशाला के आखिरी दिन बच्चों की टोलियों ने 9 दीवार अखबार बनाए। इसके पहले उन्होंने अपने आसपास के मुद्दों की पहचान और लेखन की बारीकियों को जानने की कोशिश की। मेरी स्कूली बच्चों के साथ यह दूसरी कार्यशाला थी। ग्रामीण पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के लिए कार्यशालाओं का पूर्व अनुभव था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TTrmOkNzrOI/AAAAAAAAAK0/cJrmow82arU/s1600/IMG_4550.JPG" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" s5="true" src="http://1.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TTrmOkNzrOI/AAAAAAAAAK0/cJrmow82arU/s320/IMG_4550.JPG" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;बच्चों ने खबर बनाने से लेकर संपादन तक सभी काम खुद किए। संपादक के नाम चिट्ठी और साक्षात्कार की सावधानियों को समझा। कार्यशाला में 6 वीं से लेकर 8 वीं तक के करीब 40 बच्चों ने भाग लिया। यह कार्यशाला मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में पिपरिया के पास समनापुर में हुई। यह कार्यशाला एकलव्य संस्था के सहयोग से की गई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरे दिन बच्चों की टोलियों ने गांव और खेत-खलिहान में जाकर ग्रामीणों से साक्षात्कार लिए। अपने ही बच्चों को नई भूमिका में देखकर ग्रामीणों को सुखद आश्चर्य हुआ। खेती-किसानी, जंगली जानवर, गांव के परंपरागत रोजगार, पशुपालन, बिजली-सड़क की दैनंदिन समस्याएं आदि विषयों पर जानकारी एकत्र की। एक टोली को गांव की कुछ महिलाओं के सवालों का भी सामना करना पड़ा, जो किसी पत्रकार के लिए आम बात है। लेकिन इन बच्चों के लिए यह नई और परेशानी की बात थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आम तौर पर स्कूलों मंे छुट्टी के लिए आवेदन पत्र और पत्र लेखन भी याद करवाया जाता है। लेकिन यहां बच्चों ने अपने मन से गांव की समस्याओं पर संपादक के नाम पत्र लिखे। यद्यपि उनकी भाषा में अनगढ़पन और अशुद्धियां थी लेकिन उनमें नयापन था। एक सपाट और सीधी सादी बात थी। उन्होंने बारिश से होने वाली अड़चनों और लड़कियों के लिए जरूरी हाईस्कूल की मांग को अपनी लेखनी का विषय बनाया। राहड (अरहर) दाल के कम उत्पादन के कारण गिनाए। &lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TTrryUkbEGI/AAAAAAAAAK4/87x-s-s_XxI/s1600/MediaWorkshop+3blog.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="264" s5="true" src="http://3.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TTrryUkbEGI/AAAAAAAAAK4/87x-s-s_XxI/s320/MediaWorkshop+3blog.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;अगर हम भाषागत त्रुटियों को नजरअंदाज कर दें तो इन बच्चों की सोच और कल्पनाओं का दायरा बड़ा है। गांव से लेकर देश-दुनिया की समस्याओं को उन्होंने अपनी खबरों में जगह दी। अपने स्कूल के खेल मैदान के गड्ढे से लेकर बारिश कम होने जैसी खबरों को प्रमुखता दी। खेल मैदान की स्थानीय समस्या है तो बारिश कम होने का संबंध मौसम परिवर्तन से जोड़ा जा सकता है, जो दुनिया में चिंता का कारण बना हुआ है। दालों के महंगे दामों की चर्चा हो रही है। यह पूरा इलाका दालों के लिए प्रसिद्ध है। नर्मदा कछार की उपजाऊ मिट्टी में पैदा हुई तुअर की दालें मशहूर हैं। यहां बच्चों ने राहड (अरहर )में इल्ली और नगदी फसलों के कारण उसके रकबे में कमी की खबर को प्रमुखता दी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जंगली सुअरों से फसलों का नुकसान, यह केवल एक गांव की नहीं बल्कि पूरे सतपुड़ा पर्वतीय क्षेत्र की समस्या है। शेर बचाने के लिए तो देश में काफी चिंता जताई जा रही है लेकिन जंगली जानवरों खासकर सुअरों से किसानों की फसलों को बचाने के लिए कोई आवाज नहीं है। जबकि इन क्षेत्रों में बहुत ही मामूली और गरीब किसान हैं। प्रकृति के नजदीक रहने वाले आदिवासी हैं, जो बहुत ही कम संसाधनों में अपना गुजारा करते हैं। लेकिन उनके जंगल से निस्तार पर कई तरह की रोक है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TTrszJeGw7I/AAAAAAAAAK8/jvrbam-wbhs/s1600/IMG_4632.JPG" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="150" s5="true" src="http://3.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TTrszJeGw7I/AAAAAAAAAK8/jvrbam-wbhs/s200/IMG_4632.JPG" width="200" /&gt;&lt;/a&gt;स्कूली शिक्षा से बाहर देश के बहुत ही कम भाग्यवान बच्चे हैं जिन्हें जानने-सीखने का मौका मिलता है। मौजूदा शिक्षा सिर्फ परीक्षा में कंठस्थ करके उगल देने पर जोर देती है। ठूंस-ठूंस कर ज्ञान की घुट्टी पिलाने से बच्चे शिक्षा से जुड़ते नहीं है, उससे दूर छिटकते हैं। इसमें सोचने-समझने का मौका नहीं मिलता। अपने आसपास के परिवेश से जुड़ना और सीखना। नई-नई चीजों को देखना, उनका अहसास करना और अपने शब्दों में व्यक्त करना, यह भी शिक्षा का एक माध्यम है, ऐसी कोशिश करना फालतू माना जाता है। लेकिन वास्तव में यह भी शिक्षा का एक माध्यम है। इसका एक आयाम है किसी भी चीज को समग्रता में देखना। समाचार बनाने में खबर के सभी पहलुओं को शामिल किया जाता है, जिससे बच्चे किसी खबर के सभी पहलुओं से परिचित हो &lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;छोटी उम्र में ही बच्चे बहुत कुछ सीखते-समझते हैं, यह सर्वज्ञात है। लेकिन यही कीमती समय उनका नीरस और उबाऊ शिक्षा में चले जाते हैं। अगर इस अवधि में उन्हें हम आसपास के वातावरण से जानने-सीखने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। प्रकृति को गुरू मानकर उससे सीखा जाए, और इनसे सीखकर उन्हें शब्दों में ढाला जाए तो बेहतर शिक्षा मिल पाएगी। शिक्षा का एक और एक माध्यम है स्कूली पाठ्यक्रम के अलावा कई तरह की किताबें। किताबों की सैर करना और उनमें गोतें लगाना, शिक्षाप्रद और आनंददायी होता है। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TTruvCQc0PI/AAAAAAAAALE/s5_Me-fQEm4/s1600/bargad.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" s5="true" src="http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TTruvCQc0PI/AAAAAAAAALE/s5_Me-fQEm4/s320/bargad.jpg" width="248" /&gt;&lt;/a&gt;इसी प्रकार, लेखन एक रचनात्मक काम है। उससे बच्चों का भाषाई और लेखन कौशल विकसित होता है, जो शिक्षा का भी एक महत्वपूर्ण आयाम है। जिन बच्चों ने इस कार्यशाला में भाग लिया, उनकी भाषा और वाक्य विन्यास कमजोर था। इसके बावजूद उन्होंने खड़ी बोली में लिखा और जहां उन्हें वे शब्द नहीं मिले, स्थानीय बोली में वाक्य बनाएं। यही कार्यशाला की विशेषता थी। अगर इस तरह की गतिविधियां स्कूलों में और स्कूल के बाहर निरंतर की जाएं तो मौजूदा शिक्षा की स्थिति में सुधार होगा। और शिक्षा के प्रति बच्चों का उनका नजरिया भी बदलेगा। उन्हें पढ़ने में रूचि होगी और मजा भी आएगा। &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6488502539236057488-8639512917467035272?l=hashiye-par.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hashiye-par.blogspot.com/feeds/8639512917467035272/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2011/01/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/8639512917467035272'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/8639512917467035272'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2011/01/blog-post.html' title='गांव की खबरों से जुड़ते बच्चे'/><author><name>Baba Mayaram</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07974100393280656159</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TQ2zSrZyPhI/AAAAAAAAAKE/mmnqrZO0TCI/S220/baba_fb.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TTrj80wdD9I/AAAAAAAAAKw/5gg6rkICzEs/s72-c/IMG_4476.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6488502539236057488.post-1116847131185856311</id><published>2010-11-27T19:56:00.000+05:30</published><updated>2010-11-27T19:56:08.932+05:30</updated><title type='text'>रेत में नाव नहीं चलेगी</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TPES8bm336I/AAAAAAAAAJ4/XSgp5buTByc/s1600/Picture+023.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="640" src="http://1.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TPES8bm336I/AAAAAAAAAJ4/XSgp5buTByc/s640/Picture+023.jpg" width="480" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;नर्मदा तीरे कार्तिक की पूर्णिमा पर सांडिया में मेला लगता है,यह ज्ञात था। देखने की इच्छा थी, वह हाल ही में&amp;nbsp; पूरी हुई। इस मौके पर जगह-जगह मेलों का आयोजन होता है। नर्मदा और दूधी नदी के संगम पर केतोघान में और नर्मदा और तवा के संगम पर बांद्राभान समेत अनेक जगह मेले लगते हैं। पिपरिया में रहने के कारण बार-बार नर्मदा के दर्शन हुए हैं। लेकिन मेलों का आनंद ही कुछ और है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूर्णिमा के दो-तीन पहले से ही सरै भरते ( साष्टांग लेटकर नर्मदा तक जाना ) हुए श्रद्धालु मिलने लगे थे। एक दिन पहले तो रात भर हर-हर नर्मदे का जयकारा करते हुए नर्मदा जाने वालों का तांता लगा रहा। पैदल, साइकिल, मोटर साइकिल, टेक्टर-ट्राली और चार पहिया वाहनों से जनधारा नर्मदा की ओर बहती रही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह-सवेरे गोपाल भाई यानी गोपाल राठी का फोन आ गया। सांडिया मेले में चलना है, तैयार हो जाओ। मैं अपने बेटे के साथ मोटर साइकिल से निकल पड़ा। गोपाल भाई के साथ उनकी पत्नी यानी भाभी जी भी थीं। साथ चले। सड़क पर भारी भीड़। तेज गति से वाहन दौड़ रहे थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिपरिया से सांडिया&amp;nbsp; की दूरी करीब 20 किलोमीटर है। नर्मदा अमरकंटक से उद्गमित होकर इसी इलाके से होकर गुजरती है। हम कुछ दूर चले होंगे कि हमारे एक मित्र कृष्णमूर्ति मिल गए। वे कृषि वैज्ञानिक हैं। लेकिन उनका यह परिचय अधूरा है। वे इस इलाके की संस्कृति में गहरे रचे-बसे हैं और उसके जानमकार हैं। उन्होंने आल्हा की तर्ज पर एक प्रसिद्ध कृति के सृजन में योगदान दिया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गोपाल भाई थोड़ी दूर गाड़ी चलाते फिर रूक जाते। थकते वे नहीं थे लेकिन श्रद्धालुओं की भीड़ देखकर उत्साहित हो रहे थे। उनमें बाल-सुलभ कौतूहल है, जो उन्हें सदैव उत्साह से भर देता है। मेलों का उद्देश्य भी यही रहा है। ग्राम्य जीवन की धीमी गति और जटिलता में हाट-मेलों से नये उत्साह का संचार हो जाता है। जो कई दिनों तक बना रहता था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सांडिया के रास्ते में मुझे बैलगाड़ी नहीं दिखी लेकिन इसके थोड़ा ऊपर केतोघान के मेले में बैलगाड़ियों का जाम लगा देखा है। मेले के लिए बैलों की साज-सज्जा देखते ही बनती है। उन्हें नहलाना, रंगना और मुछेड़ी ( रंग-बिरंगी रस्सियां बांधना ) बांधना, यह सब मेले की तैयारी का हिस्सा हुआ करते थे। हालांकि उस मेले में गए भी वर्षों हो गए। लेकिन याद ऐसी ताजी है जैसी कल की ही बात हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TPEUiiyjyVI/AAAAAAAAAJ8/O70QwKjWhEU/s1600/soordas.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="400" src="http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TPEUiiyjyVI/AAAAAAAAAJ8/O70QwKjWhEU/s400/soordas.jpg" width="272" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;अब हम मेले में पहुंच गए हैं। श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है। स्त्री, पुरुष, बच्चे, बूढे और साधु महात्मा मेले में घूम रहे हैं। रंग-बिरंगी दूकानें लगी हैं। मुझे बच्चों की चीजों ने आकर्षित किया। ढमढमा, बांसुरी, रंगीन पन्नी के चश्मा, कागज की चकरी, रंग-बिरंगे गुब्बारे मन मोह रहे थे। मिठाईयों की दूकानों में जलेबी, मोती-चूर के लड्डू और नमकीन देखकर मुंह में पानी आ रहा था। जगह-जगह भंडारे लगे थे जिनमें श्रद्धालु भोजन कर रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नर्मदा मेलों में पहले भोजन का मतलब बाटी और भर्ता हुआ करता था। लेकिन आज अधिकांश भंडारों में पूड़ी-सब्जी और खिचड़ी परोसी जा रही थी। हमने भी यही भोजन किया। हमारे मित्र श्रीगोपाल गांगूडा ने गन्ना खिलाया, जिसे हमने घूम-घूमकर खाया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लौटते समय नौका विहार का कार्यक्रम बना। हम नाव में सवार हो गए। नर्मदा में पानी बहुत कम था। केंवटों ने कुछ दूर तो नाव को धकेला। फिर चप्पू चलाने लगे। हमारी नजरें दूर-दूर तक फैले तट पर फैल गईं-शांत, और अनुपम छटा बिखेरती&amp;nbsp; नर्मदा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कितने ही इसके दर्शन मात्र से तर जाते हैं। डुबकी लगाते हैं। मनोकामना लेकर आते हैं। हम भी उसके स्पर्श मात्र से धन्य हो रहे थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करीब एक फर्लांग की दूरी तय की होगी कि केंवट बोल पड़ा- नाव आगे नहीं जाएगी, पानी कम है, रेत में नाव नहीं चलेगी। हमें थोड़ी निराशा हुई। मैंने कुछ लोगों से इस पर बात की तो पता चला कि हर साल पानी कम होते जा रहा है। जगह-जगह टापू भी निकल आए हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लौटते-लौटते सारंगी बजाते सूरदास की धुन मोहित कर गईं। हम खड़े होकर देखते रहे। मिट्टी के खिलौने की दूकान दिखी। बेटे ने तोता, घोड़ा, सिर पर घड़ा रखे पनहारिन, हाथ चक्की आदि खरीदीं। कृष्णमूर्ति ने कहा- वर्षों बाद बहुत मजा आ गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TPESTMVJIPI/AAAAAAAAAJ0/oL7NxJSbwOg/s1600/sandiya+mela.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="281" src="http://2.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TPESTMVJIPI/AAAAAAAAAJ0/oL7NxJSbwOg/s400/sandiya+mela.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;रास्ते में मैं सोच रहा था कि नर्मदा घाटी में कई बांध बनाए जा रहे हैं। कोयला बिजलीघर के प्रोजेक्ट आ रहे हैं।&amp;nbsp; नर्मदा की सहायक नदियां दम तोड़ रही हैं। क्या नर्मदा के बहाव के साथ पल्लवित-पुष्पित हमारी संस्कृति को हम बचा पाएंगे? क्या हमारी आगे आनेवाली पीढ़ियां नर्मदा के सौंदर्य और संस्कृति के दर्शन कर पाएंगे?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6488502539236057488-1116847131185856311?l=hashiye-par.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hashiye-par.blogspot.com/feeds/1116847131185856311/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2010/11/blog-post_27.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/1116847131185856311'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/1116847131185856311'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2010/11/blog-post_27.html' title='रेत में नाव नहीं चलेगी'/><author><name>Baba Mayaram</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07974100393280656159</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TQ2zSrZyPhI/AAAAAAAAAKE/mmnqrZO0TCI/S220/baba_fb.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TPES8bm336I/AAAAAAAAAJ4/XSgp5buTByc/s72-c/Picture+023.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6488502539236057488.post-6272285655939739759</id><published>2010-11-14T21:03:00.001+05:30</published><updated>2010-11-14T21:15:27.818+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Hashiye-Par'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Narmada'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='River'/><title type='text'>नर्मदा से साक्षात्कार- छोटे धुंआधार में</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TN_9DGimvaI/AAAAAAAAAJo/J6BNe15pfFg/s1600/Blog+photo1.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="300" px="true" src="http://3.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TN_9DGimvaI/AAAAAAAAAJo/J6BNe15pfFg/s400/Blog+photo1.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;जब कभी मौका मिलता है नर्मदा चला जाता हूं। इस बार दीवाली के बाद भाई दूज पर नरसिंहपुर बहन के घर गया। वहां से चिनकी घाट के नीचे घूरपुर गांव के पास छोटा धुंआधार गए। साथ में बेटा और भांजा था। वैसे तो नरसिंहपुर से 20-25 किलोमीटर की दूरी है पर पक्की सड़क है पर आगे का रास्ता कठिन है। शेर नदी के कुछ आगे से बाएं की तरफ मुड़ना पड़ता है। खेत हैं और उनके बीच पगडंडी। &lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;अरहर, ज्वार के हरे-भरे खेत मन मोह रहे थे। अरहर के खेत के बीच से मोटर साइकिल जाते हुए ऐसा लग रहा था जैसे हम किसी गुफा में प्रवेश कर रहे हैं। अरहर के उंचे पौधे पीले फूलों और फल्लियों से लगे थे। उनके बीच से गुजरते हम उनसे टकरा रहे थे या कहें उनके स्पर्श से रोमांच से भर रहे थे। बेटा बहुत हथेलियों से उन्हें स्पर्श कर उछल-उछल पड़ रहा था। भांजा गाड़ी चला रहा था। और में ऐसे खेतों को देखकर धन्य हो रहा था। क्योंकि खेतों में ही असली उत्पादन होता है। एक बीज लगाओ और सैकड़ों बीज होते हैं। यह नर्मदा कछार का इलाका अरहर के लिए प्रसिद्ध है।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TOAA0WWVCsI/AAAAAAAAAJs/GV12rPG_Koc/s1600/blog+photo4.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" px="true" src="http://3.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TOAA0WWVCsI/AAAAAAAAAJs/GV12rPG_Koc/s320/blog+photo4.jpg" width="258" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;आगे बढ़े तो अरहर के साथ ज्वार के भुटटे दानों से लदे लटक रहे थे। ये दाने मोतियों जैसे चमक रहे थे। चिड़िया दाना चुगने के लिए इधर-उधर फुदक रही थी। हालांकि यहां की खेती असिंचित है, पर मिट्टी बहुत उपजाऊ है। कुछ खेतों में बोउनी की तैयारी की जा रही थी। जबकि कुछ खेतों में किसान चना वगैरह की बोउनी कर रहे थे। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;अब हम पूछते-पाछते छोटे धुंआधार पहुंच चुके थे। सुबह के करीब 10 बजे होंगे। छोटी हरी-भरी पहाड़ी और बड़ी नीली चट्टानें। देखते ही हम उछल पड़े। बहुत मजा आ गया। चट्टानों और नुकेले पत्थरों के बीच नर्मदा वेग से उछलती-कूदती बह रही हैं। चट्टानों से नर्मदा मचलती-खेलती आगे बढ रही है। घूरपुर घाट पर नर्मदा तट चौड़ा है जो यहां आकर बहुत संकरा हो गया है। यहां नर्मदा की एक अनुपम छटा और सौंदर्य है। जैसे वह शांत वातावरण और एकांत में अपने ही अंदाज में मचल रही हो।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;जबलपुर के पास भेडाघाट धुआंधार में जहां ऊपर से खांई मे गेंद की भांति टप्पा खाकर गिरती है और उछलती है। जबकि यहां विशाल तट से एकदम संकरी होती हुई चट्टानों के बीच तेज गति मचलती आगे बढ़ती हैं। सौंदर्य ऐसा बिखेरती है कि देखते ही बनता है। मेरे बेटे ने कई फोटो लिए। चूंकि उसकी चित्रकारी और फोटोग्राफी विशेष रूचि है, इसलिए वह कभी इस चट्टान पर कभी उस चट्टान पर चढ़कर अलग-अलग ढंग से नर्मदा के रूप कैमरे में कैद कर रहा था।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;मैं नर्मदा को एकटक निहारता रहा। नर्मदा को कई जगह कई रूपों में देख चुका हूं। जबलपुर का ग्वारी घाट, भेड़ाघाट, बरमान, केतोघान, सांडिया, महेश्वर, ओंकारेश्वर और खलघाट जैसे कई स्थानों में नर्मदा के दर्शन किए हैं। नर्मदा एक नदी का नाम नहीं है जो अमरकंटक से निकलकर अरब सागर में मिलती है। बल्कि वह नर्मदा किनारे के लोगों के लिए जीवन है। प्रेरणा स्त्रोत है। इसके बहाव के साथ-साथ ही संस्कृति और सभ्यता पल्लवित और पुष्पित हुई है। मेखल पर्वत से उद्गमित होकर यह नाचती-गाती, चमकती छलांग लगाती हुई आगे बढ़ती है। नर्मदा किनारे के लोग अपने जीवन में नर्मदा के पास अपनी कामना लेकर आते हैं। वह जीवनदायिनी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;अब लौटने का समय हो गया है। घूरपुर घाट पर स्नान किया। यहां कुछ महिलाएं और बच्चे स्नान कर रहे हैं। मछुआरे जाल डालकर बैठे हैं। मैं सोच रहा था क्या भविष्य हम नर्मदा के इस सौंदर्य को बचा पाएंगे। हमने इस पर पहले ही बड़े-बड़े बांध बना लिए है। स्वाभाविक प्रवाह को रोक दिया है। अब नर्मदा के किनारे कोयला बिजलीघर बनाने की योजनाएं आ रही हैं। &lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TN_8bxlIUsI/AAAAAAAAAJk/puaag69m410/s1600/Blog+Photo2.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="400" px="true" src="http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TN_8bxlIUsI/AAAAAAAAAJk/puaag69m410/s400/Blog+Photo2.jpg" width="290" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6488502539236057488-6272285655939739759?l=hashiye-par.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hashiye-par.blogspot.com/feeds/6272285655939739759/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2010/11/blog-post_14.html#comment-form' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/6272285655939739759'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/6272285655939739759'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2010/11/blog-post_14.html' title='नर्मदा से साक्षात्कार- छोटे धुंआधार में'/><author><name>Baba Mayaram</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07974100393280656159</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TQ2zSrZyPhI/AAAAAAAAAKE/mmnqrZO0TCI/S220/baba_fb.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TN_9DGimvaI/AAAAAAAAAJo/J6BNe15pfFg/s72-c/Blog+photo1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6488502539236057488.post-5400102562371179737</id><published>2010-11-06T16:33:00.001+05:30</published><updated>2010-11-09T19:50:45.513+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Hashiye-Par'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Satpura'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Hoshangabad'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='PipariyaSrajan'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Youth'/><title type='text'>सतपुड़ा में युवाओं की एक सार्थक पहल</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TNU0RlAsDAI/AAAAAAAAAJY/p_imRSL7aDo/s1600/pipariyas1.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="300" src="http://3.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TNU0RlAsDAI/AAAAAAAAAJY/p_imRSL7aDo/s400/pipariyas1.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;सुबह का समय है। पिपरिया एकलव्य में दरी पर करीब 40 लड़के-लड़कियां बैठे हैं। वे किसी साहित्यक गोश्ठी या किसी वाद-विवाद प्रतियोगिता के लिए यहां नहीं आए हैं। बल्कि उन्होंने अपने जीवन में जो कुछ अर्जित किया हैं, उसे साझा करने और नई पीढ़ी को देने के लिए एकत्रित हुए हैं। वे बारी-बारी से अपनी-अपनी बात कह रहे हैं। बातचीत&amp;nbsp; हिन्दी-अंग्रेजी के मिले-जुले संवाद में चल रही है। यह आयोजन था पिपरिया सृजन का, जो पिछले 5 वर्षो से दीवाली मिलन के अवसर पर होता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिपरिया सृजन एक अनौपचारिक समूह है जिसमें मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के एक छोटे कस्बे पिपरिया से निकले युवा हैं, जो या तो अपनी आगे की पढ़ाई कर रहे हैं या फिर कहीं जॉब कर रहे हैं। ये युवा आपस में इंटरनेट के माध्यम से संपर्क में रहते हैं। पिपरिया सृजन का गूगल ग्रुप्स में भी एक एकाउंट है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिपरिया सृजन की शुरुआत उन युवाओं से हुई है जो एकलव्य पुस्तकालय के नियमित पाठक रहे हैं। और वे आज देश-विदेश में अध्ययनरत हैं या रोजगार में लगे हैं। पुस्तकालय से उनका लगाव एवं संपर्क लगातार बना हुआ है। पिपरिया सृजन इसी का परिणाम है। एकलव्य पुस्तकालय इस समूह का संपर्क एवं समन्वय केन्द्र है। इसमे शुरुआत से लेकर अब तक प्रमुख भूमिका गोपाल राठी एवं कमलेश भार्गव की रही है जो इसके संस्थापकों में से एक हैं।&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TNlYiW4qIKI/AAAAAAAAAJg/AIRbV6ZCgyY/s1600/DSCF9811.JPG" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" src="http://1.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TNlYiW4qIKI/AAAAAAAAAJg/AIRbV6ZCgyY/s320/DSCF9811.JPG" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;सतपुड़ा अंचल का यह कस्बा भोपाल से जबलपुर रेलमार्ग पर स्थित है। पिपरिया से 54 किलोमीटर दूर सतपुड़ा की रानी पचमढ़ी है, जो एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। सतपुड़ा की सबसे उंची चोटी धूपगढ़ भी यहीं है। इस इलाके से नर्मदा नदी भी गुजरती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिपरिया सृजन की सोच यह है कि हम अपने कस्बे और इलाके की नयी पीढ़ी की मदद करे। चाहे वह कैरियर गाइडेंस के रूप में हो या उनके समग्र व्यक्तित्व में सहायक जानकारी हो। किसी भी तरह अपने छोटे भाई-बहनों और साथियों की मदद करने की सच है। चूंकि दीवाली पर सब लोग अपने घर और रिश्तेदारों से मिलने आते हैं इसलिए यह बैठक दीवाली के अगले दिन ही होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बैठक में मुंबई से प्रेरणा परसाई आई हैं। वहां वह कंपनी में सॉफटवेयर इंजीनियर है। हालांकि उनका जन्म भोपाल में हुआ है लेकिन उनके पिता पिपरिया के हैं। उनके दादाजी पिपरिया में ही रहते हैं। गुजरात से मनीष आए हैं, वे वहां केमिस्ट के पद पर कार्यरत है। हैदराबाद से आदित्य दुबे शामिल हुए, जो पिपरिया सृजन के सक्रिय कार्यकर्ता हैं। प्रवीण चौकसे भोपाल से पधारे हैं जिनका पिपरिया आना-जाना होता रहता है। इसके अलावा अनिकेत, अमित,चन्द्रप्रकाश और रूबी शुक्ला सक्रिय हैं। डॉ. कल्पना चौधरी, अतुल पटेल, अजय पटेल, अमित शर्मा, प्रशांत मिश्रा, श्रीगोपाल मिश्रा, महेन्द्र साहू, हर्षवर्धन बल्दुआ, शांतनु सोनी, दीपक रजक, श्रवण राय, योगेश चौरसिया, श्याम मालानी, सचिन परसाई आदि युवाओं की सक्रिय पहल रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सभी के मन में स्कूली और महाविद्यालयीन छात्रों के लिए कुछ न कुछ करने की तमन्ना है। साथ ही ऐसे छात्रों के लिए भी मदद करने की रूचि है, जो आज हाशिये पर हैं।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TNU1O5I6zpI/AAAAAAAAAJc/gjh8GjRN6bc/s1600/piparadshfk.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://3.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TNU1O5I6zpI/AAAAAAAAAJc/gjh8GjRN6bc/s320/piparadshfk.jpg" width="295" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;आजकल षिक्षा का मकसद पैसा कमाना हो गया है। बच्चे कैरियर के बारे में सोचते हैं लेकिन इस व्यवस्था में कैरियर बनाना मुष्किल है। हमारे युवाओं की सारी ष्षक्ति इसमें ही लग जाती है। कैरियर के चक्कर कांशियस (चेतना) भी खत्म हो जाती है। कैरियर कुछ का बनता है। कई इस दौड़ से बाहर हो जाते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिलट्रेट शिक्षा व्यवस्था सबको सब कुछ नहीं दे सकती है। इसमें कुछ का भाग्य चमक सकता है। हमें शिक्षा के सही मायने समझने होंगे। शिक्षा से दिमाग रोशन होता है। एक अच्छा इंसान बनता है। इस ओर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। बहरहाल, इन युवाओं की बात सुनकर मेरा दिल उछल रहा था। सोच रहा था। अगर यह कोशिश कामयाब होती है तो बहुत उपयोगी होगी। इस सार्थक प्रयास के लिए बहुत-बहुत शुभकामनाएं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6488502539236057488-5400102562371179737?l=hashiye-par.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hashiye-par.blogspot.com/feeds/5400102562371179737/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2010/11/blog-post.html#comment-form' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/5400102562371179737'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/5400102562371179737'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2010/11/blog-post.html' title='सतपुड़ा में युवाओं की एक सार्थक पहल'/><author><name>Baba Mayaram</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07974100393280656159</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TQ2zSrZyPhI/AAAAAAAAAKE/mmnqrZO0TCI/S220/baba_fb.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TNU0RlAsDAI/AAAAAAAAAJY/p_imRSL7aDo/s72-c/pipariyas1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6488502539236057488.post-3570339411816103901</id><published>2010-10-23T15:19:00.001+05:30</published><updated>2010-10-23T15:19:13.696+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Health'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Hashiye-Par'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Ganiyari'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='JSS'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Chhattishgarh'/><title type='text'>क्या कसूर है जो उसे टी. बी. हुई?</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TMKmlBtnngI/AAAAAAAAAJQ/rleCSiT20Ps/s1600/Kalabaiwith.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="640" src="http://3.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TMKmlBtnngI/AAAAAAAAAJQ/rleCSiT20Ps/s640/Kalabaiwith.jpg" width="459" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;i&gt;''कभू-कभू अइसे लगत है कि अब नई बचहूं। पीरा के मारे चल नइ सकव। बइठे मं घलो पीरा होथे । रात-रात भर नींद नइ परत हे। एक महीना ले दवा खात हों, तभो ले पीरा नइ माड़त हे। '' &amp;nbsp;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-style: normal;"&gt;यह कहना है कलाबाई बैगा का। वह स्पाइन (रीढ &amp;nbsp;की हड्‌डी) टी.बी. की मरीज है। इन दिनों वह अपने मां-बाप के घर औरापानी में हैं। ससुराल कुरदर गांव में उसकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है।&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;छत्तीसगढ में बिलासपुर जिले की कोटा तहसील का एक पहाडी गांव है औरापानी। कोटा से आगे सेमरिया तक पक्की सडक है और फिर 3-4 किलोमीटर कच्ची सडक। उस पर हाल ही में मिट्‌टी डाली गई है। जिस दिन हम वहां गए उस दिन सुबह हल्की बारिश हुई थी। इस कारण गाडी के चक्कों में मिट्‌टी चिपक रही थी और गाडी चलाना मुशिकल हो रहा था।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;गांव में घुसते ही पहला घर कलाबाई के मां-बाप का है। कलाबाई से यह मेरी दूसरी मुलाकात थी। दो दिन पहले वह अपने पति के साथ गनियारी जन स्वास्थ्य सहयोग केन्द्र में जांच कराने के लिए आई थी लेकिन उस समय उसे रीढ &amp;nbsp;की हड्‌डी और पेट में असहनीय दर्द था। उससे बात करना मुशिकल हो रहा था। वह बैठ भी नहीं पा रही थी।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कलाबाई की उम्र &amp;nbsp;22 वर्ष है। वजन करीब 35 किलो। वह 8 वीं तक पढी है। उसकी दो लडकिया हैं, एक है महेश्वरी (2 साल) और रीतू (4 माह)। बीमारी से पहले वह सभी तरह के काम कर सकती थी। घर के काम से लेकर बाहर मजदूरी करने जाती थी। उसके पति के मां-बाप नहीं होने के कारण घर में कोई दूसरा सहारा नहीं है।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए उसे और पति को काम करना पडता था। वे दोनों मिलकर मानसून के मौसम में मिलकर 100-150 रू कमा लेते थे। लेकिन अब कलाबाई स्पाइन टी.बी. (टयूबर क्लोसिस) से पीडित है। हालांकि गांव में उसके परिवार के लोग कहते हैं कि उसे कोई बीमारी नहीं है। वह नाटक कर रही है।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;टी़ बी. दो प्रकार की होती है। एक पल्मोनरी टी बी यानी फेफडे की और दूसरी नॉन पल्मोनरी टी. बी.। यानी शरीर के अन्य भागों में पायी जाने वाली टी. बी. जैसे त्वचा, पेट के हिस्से में, दिमाग व हडि्‌डयों में पायी जाने वाली टी. बी.। सबसे ज्यादा संक्रामक फेफडे वाली टी.बी. होती है। इसमें रोगी छींकता है या खांसता है, उसके माध्यम से टी. बी. का कीटाणु माइको बैक्टीरिया ट्‌यूबर क्लोसिस हवा में छोडता है। जिससे पास में बैठा व्यक्ति जैसे ही सांस लेता है, वह शरीर में प्रवेश कर जाता है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जन स्वास्थ्य सहयोग के &amp;nbsp;प्रमुख डॉ. योगेश जैन का कहना है कि हमारे देश में 14 वर्ष की उम्र तक 70 प्रतिशत लोगों में टी.बी. का बैक्टीरिया प्रवेश कर जाते हैं। पर जरूरी नहीं है कि सब लोग टी.बी. की बीमारी से पीडित हों। इससे गरीब ही ज्यादा बीमार होते हैं। क्योंकि उनमें रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है। कुपोषण होता है। कलाबाई भी उसी से पीडित है। उनका कहना है कि अगर कलाबाई के कुपोषित &amp;nbsp;शरीर पर 4 माह पहले बच्चे पैदा करने का बोझ न पडता तो वह टी. बी. की शिकार न होती। &amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;चिकित्सक टी. बी. होने का एक कारण कुपोषण को मानते हैं। इस इलाके में लोगों के भोजन में भात (चावल) प्रमुख होता है लेकिन उसके साथ दाल नहीं होती। जन स्वास्थ्य सहयोग के द्वारा 400 परिवारों में किए जा रहे अध्ययन के अनुसार &amp;nbsp;सिर्फ 16 प्रतिशत परिवार ही ऐसे हैं, जो सप्ताह भर दाल का स्वाद चख सकते है। 20 प्रतिशत परिवार सप्ताह में एक बार ही दाल जुटा पाते हैं। जबकि 9 प्रतिशत परिवारों को भात के साथ आलू, भाजी और खट्‌टा खाना पडता है। &amp;nbsp;यह माना जा चुका है कि कुपोषण के साथ गरीबी का गहरा संबंध है। भारत में प्रोटीन संबंधी कुपोषण है। इस अध्ययन में आधे परिवार 200 टीबी से पीडित थे। यह अध्ययन अभी जारी है।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TMKsX0oS50I/AAAAAAAAAJU/KUpAqbNchXQ/s1600/grandmother_kalabai.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="307" src="http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TMKsX0oS50I/AAAAAAAAAJU/KUpAqbNchXQ/s400/grandmother_kalabai.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;भारत में दालों की उपलब्धता भी कम होती जा रही है। ऐसा सांखयकीय आंकडे &amp;nbsp;भी बताते हैं। 1951 में देश में एक औसत व्यक्ति को खाने एक दिन में खाने के लिए 60.7 ग्राम दाल उपलब्ध थी जो 2007 में घटकर 35.5 ग्राम रह गई है। गरीबों में दाल की उपलब्धता कम है, यह उपयुक्त अध्ययन बताता है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;गांव में लोग भात (चावल) के सब्जी खाते हैं। अधिकांश सब्जी में आलू होता है। गरीब होने के कारण फल, अंडे या मांस भी उनके भोजन में नहीं होता। कलाबाई कहती है कि जब पैसा ही नइ हे, तो अंडा से कहां से लावो,। &amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;हालांकि वह इलाज के लिए देर से पहुंची। पहले वह बैगाई (झाड़-फूंक) करवाती रही। झोला छाप डॉक्टर (फर्जी डॉक्टर) से इलाज करवाती रही। जब पूरी तरह लाचार हो गई। खटिया पर पड &amp;nbsp;गई तब जन स्वास्थ्य सहयोग गनियारी पहुंची। अब गनियारी अस्पताल में &amp;nbsp;उसका इलाज पिछले 2 माह से चल रहा है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;चूंकि दवा का असर धीरे-धीरे होता है। इसलिए एक तो कलाबाई को अब तक दर्द से राहत नहीं मिल पाई है। उसे दोनों पैरों में दर्द होता है। वह चल नहीं पाती है। देर तक बैठ भी नहीं सकती। ज्यादा देर बैठे रहने में सांस लेने में दिक्कत होती है। &amp;nbsp;खडे होने से ही थोडी राहत मिलती है लेकिन ज्यादा देर खडे भी नहीं रह सकती। वह कहती है कि हडडी कोमल होवउ नइ करे, लकडी कस कडकत हे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;चिकित्सकों का कहना है कि टी.बी. मरीज को स्वस्थ होने के लिए पोषण की स्थिति ठीक होनी चाहिए। साथ ही परिवार और समाज का भी सहयोगात्मक रवैया होना चाहिए। मरीज को बहुत ज्यादा मानसिक परेशानी होगी तो उसकी हालत में सुधार जल्द नहीं हो पाएगा। कलाबाई को अपने बच्चों व अपने भविष्य के बारे में गहरी चिंता है। कभी-कभी उसका पति दूसरी शादी की बात भी करता है।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कुल मिलाकर, बीमारी से वह तो खुद परेशान है ही, घर की माली हालत भी बिगडती जा रही है। पहले वह घर का, खेती-किसानी का, जंगल से तेंदूपत्ता तोडना, महुआ लाना आदि सब काम करती थी। वह बांस के बर्तन बनाती थी। &amp;nbsp;बैगा जनजाति के ये लोग बांस के बर्तन बनाते हैं।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कलाबाई भी झउआ (टोकनी), खरेटा (बडी झाडू,) सूपा, पंखा, खुमरी (छातानुमा बांस से बनाई जाती है) आदि बनाती थी और इन्हें बेचकर जो पैसा मिलता था उससे घर का खर्च चलता था। बीमार होने के बाद वह यह काम नहीं कर सकती। सब काम छूट गया है। एक तो अब कोई कमाई का स्त्रोत भी नहीं है। दूसरी इलाज और जांच के लिए गनियारी और बिलासपुर आने-जाने में खर्च भी होता है। एम आर आई की जांच के कराने के लिए उसे दो-तीन बार बिलासपुर भेजा गया। पर वहां की मशीन खराब है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;इस कारण उसे यह चिंता खाए जा रही है कि आखिर वह ठीक होगी या नहीं? बच्चों का आगे क्या होगा? उसे क्या बीमारी है, इसके बारे में उसे ठीक से मालूम नहीं है। दूसरी तरफ पति तेजूराम भी पूरी तरह उसके साथ नहीं है। कभी-कभार वह शराब पीकर उसके साथ गाली-गलौच करता है। पूरी देखभाल की जिम्मेदारी कलाबाई के मां-बाप पर आ गई है। जबकि वे भी यह सोचकर परेशान है कि आखिर कलाबाई कब तक ठीक होगी ?&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;टी बी मरीजों के उपचार में लगे चिकित्सकों का मानना है कि कलाबाई पूरी तरह स्वस्थ हो जाएगी। बशर्ते ये कि टी.बी. की दवा पूरी अवधि 9 माह तक नियमित ले। उसे धीरज रखना चाहिए और दवा लेते रहना चाहिए। मैं कला के घर से लौटते समय सोच रहा था कि बैगा आदिम जनजाति है। कलाबाई भी बैगा है। छत्तीसगढ &amp;nbsp;सरकार ने बैगा विकास प्राधिकरण भी बनाया है। उसका बडा बजट है। क्या कलाबाई जैसे जरूरतमंद मरीजों को उससे मदद नहीं मिल सकती? बैगाओं के जीवन स्तर को सुधारा नहीं जा सकता? उनकी पोषण की स्थिति को नहीं सुधारा जा सकता?&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TMKhqtYJODI/AAAAAAAAAJI/A6PZuaKdcxg/s1600/JSS_Edited1.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="301" src="http://1.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TMKhqtYJODI/AAAAAAAAAJI/A6PZuaKdcxg/s400/JSS_Edited1.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;कलाबाई की दोनों बेटियों को कभी इस स्थिति से न गुजरने पडे, क्या यह सुनिशचत हो सकता है? जन स्वास्थ्य सहयोग के एक चिकित्सक की टिप्पणी अविस्मरणीय है कि आखिर कलाबाई का क्या कसूर है, जो उसे टी बी हुई। क्या उसका गरीब होना तो नहीं? उन्होंने कहा &lt;i&gt;टी. बी. कीटाणुओं से बढकर गरीबी की बीमारी है।&lt;/i&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6488502539236057488-3570339411816103901?l=hashiye-par.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hashiye-par.blogspot.com/feeds/3570339411816103901/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2010/10/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/3570339411816103901'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/3570339411816103901'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='क्या कसूर है जो उसे टी. बी. हुई?'/><author><name>Baba Mayaram</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07974100393280656159</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TQ2zSrZyPhI/AAAAAAAAAKE/mmnqrZO0TCI/S220/baba_fb.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TMKmlBtnngI/AAAAAAAAAJQ/rleCSiT20Ps/s72-c/Kalabaiwith.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6488502539236057488.post-8961055961143006547</id><published>2010-09-07T19:42:00.000+05:30</published><updated>2010-09-07T19:42:43.342+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Hashiye-Par'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Satpura'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='rivers'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Hoshangabad'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='River'/><title type='text'>दम तोड़ रही हैं सतपुडा की नदियां</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TIX-HBoBjNI/AAAAAAAAAJA/kcIYwjIcPS0/s1600/Picture+002.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="299" src="http://1.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TIX-HBoBjNI/AAAAAAAAAJA/kcIYwjIcPS0/s400/Picture+002.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;आमतौर पर जब कभी नदियों पर बात होती है तो ज्यादातर वह बड़ी नदियों पर केंद्रित होती है। लेकिन इन सदानीरा नदियों का पेट भरने वाली छोटी नदियों पर हमारा ध्यान नहीं जाता, जो आज अभूतपूर्व संकट से गुजर रही हैं। अगर हम नजर डालें तो पाएंगे कि कई छोटी-बडी नदियां या तो सूख चुकी हैं या फिर बरसाती नाले बनकर रह गई हैं। गांव-समाज के बीच से तालाब, कुंए और बाबडी जैसे परंपरागत पानी के स्रोत तो पहले से ही खत्म हो गए हैं। अब इन छोटी नदियों पर आए संकट से बडी नदियां तो प्रभावित हो ही रही हैं। जनजीवन के साथ पशु-पक्षी और वन्य- जीवों को भी परेशानी का सामना करना पड &amp;nbsp;रहा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश-दुनिया में नदियों के किनारे ही सभ्यताएं पल्लवित-पुष्पित हुई है। जहां जल है, वहां जीवन है। लेकिन आज नदियां धीरे-धीरे दम तोड &amp;nbsp;रही हैं। नदियों का प्रवाह अवरूद्ध &amp;nbsp;हो रहा है। वर्षों पुरानी नदी संस्कृति खत्म रही है। उनमें पानी नहीं हैं, &amp;nbsp;पानी को स्पंज की तरह सोखकर रखने वाली रेत नहीं है। सतपुडा अंचल की बारहमासी सदानीरा नदियां या तो सूख गई है या बारिश में ही &amp;nbsp;उनकी जलधारा प्रवाहित होती हैं, फिर टूट जाती है। उनके किनारे लगे हरे-भरे पेड &amp;nbsp;और उन पर रहने वाले पक्षी भी अब नजर नहीं आते। यानी पानी बिना सब सून।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मध्यप्रदेश में सतपुड़ा पहाड &amp;nbsp;और जंगल कई छोटे-बडे नदी-नालों का उद्‌गम स्थल है। पहाड &amp;nbsp;और जंगलों में पेड &amp;nbsp;पानी को जडों में संचित करके रखते हैं और &amp;nbsp;धीरे-धीरे वह पानी रिसकर नदियों में जलधाराओं के रूप में प्रवाहित होता है। और एक्वीफर के माध्यम से संचित पानी भूजल में संग्रहीत होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जंगल कम हो रहे हैं। कुछ वर्षों से बारिश कम हो रही है या खन्ड बारिश हो रही है । बार-बार सूखा पड रहा है। इसके अलावा, नदियों के तट पर बडी तादाद में ट्‌यूबवेल खनन किए जा रहे हैं। डीजल पंप से सीधे पानी को खेतों में लिफट करके सिंचाई की जा रही है। स्टापडेम बनाकर पानी को उपर ही रोक लिया जाता है, जिससे जलधारा आगे नहीं बढ &amp;nbsp;पाती। उद्योगीकरण और शहरीकरण बढ &amp;nbsp;रहा है। ज्यादा पानी वाली फसलें लगाई जा रही हैं। बेहिसाब पानी इस्तेमाल किया जा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सतपुडा की दुधी, मछवासा, आंजन, ओल, पलकमती और कोरनी जैसी नदियां धीरे-धीरे दम तोड &amp;nbsp;रही हैं। देनवा में अभी पानी नजर आता है लेकिन उसमें भी साल दर साल पानी कम होता जा रहा है। तवा और देनवा में भी पानी कम है। अमरकंटक से निकलकर इस इलाके से गुजरने वाली सबसे बडी नर्मदा भी इसी इलाके से गुजरती है। इनमें से ज्यादातर नदियां नर्मदा में मिलती हैं। इनके सूखने से नर्मदा भी प्रभावित हो रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर हम मध्यप्रदेद्गा के पूर्वी छोर पर होशंगाबाद और नरसिंहपुर जिले विभक्त करने वाली दुधी नदी की बात करें, तो नदियों के संकट को समझा जा सकता है। यह नदी कुछ वर्ष पहले तक एक बारहमासी सदानीरा नदी थी। दुधी यानी दूध के समान। साफ और स्वच्छ। छिंदवाड़ा जिले में महादेव की पहाडियों से पातालकोट से दुधी निकलती है और सांडिया से ऊपर खैरा नामक स्थान में नर्मदा में आकर मिलती है। यह नर्मदा की सहायक नदी है। पर आज दुधी में एक बूंद भी पानी नहीं ढूंढने से नहीं मिलता। बारिश के दिनों में ही पानी रहता है और अप्रैल-मई माह तक आते-आते पानी की धार टूट जाती है और रेत ही रेत नजर आती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;जहां कभी पानी होने के कारण नदी में जनजीवन की चहल-पहल होती थी, पशु-पक्षी पानी पीते थे। बरौआ- कहार समुदाय के लोग इसकी रेत में डंगरवारी तरबूज-खरबूज की खेती करते थे। धोबी कपडे धोते थे, मछुआरे मछली पकड ते थे, केंवट समुदाय के लोग जूट के रेशों से रस्सी बनाते थे। वहां अब सन्नाटा पसरा रहता है। नदी संस्कृति खत्म हो गई है। अब लोग नदी के स्थान पर हैंडपंप और ट्‌यूबवेल पर आश्रित हो गए हैं, जिनकी अपनी सीमाएं हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TIX8jyCbj3I/AAAAAAAAAI4/SPxb8WDy_KU/s1600/Picture+016.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="400" src="http://2.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TIX8jyCbj3I/AAAAAAAAAI4/SPxb8WDy_KU/s400/Picture+016.jpg" width="298" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;इसी जिले के पिपरिया कस्बे से गुजरने वाली मछवासा नदी भी सूख चुकी है। सोहागपुर की पलकमती कचरे से पट गई है। इन नदियों में जो पानी दिखता है, वह नदियों का नहीं, शहरों की गंदी नालियों का है। पलकमती से ही पूरे सोहागपुर का निस्तार होता था। सोहागपुर का रंगाई उद्योग और पानी की खेती दूर-दूर तक मशहूर थे। अब यह खेती अपनी अंतिम सांसें गिन रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तवा और नर्मदा पर बांध बनाए गए हैं। उनसे सैकडों गांव विस्थापित हुए। जबसे बरगी बांध बना है तबसे तरबूज-खरबूज की खेती चौपट हो गई है। बरगी बांध १९९० में बन गया लेकिन उसकी नहरें आज तक नहीं बनी। इसलिए बांध में ज्यादा पानी रहता है तो छोड &amp;nbsp;दिया जाता है जिससे डंगरवारी बह जाती है। नर्मदा बांध बनने से उसमें मछलियां भी कम हो गई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि नर्मदा उसकी कई सहायक नदियों के सूखने के कारण वह बहुत कमजोर हो गई है। लेकिन हम इस सबसे नहीं चेत रहे हैं और पानी का बेहिसाब इस्तेमाल से पानी के स्रोतों को ही खत्म कर रहे है, जो शायद फिर पुनर्जीवित न हो सकें। अगर हमें बड़ी नदियों को बचाना है तो छोटी नदियों पर ध्यान देना होगा। छोटी नदियों का संरक्षण जरूरी है। अगर हम इन पर छोटे-छोटे स्टापडेम बनाकर जल संग्रह करें तो नदियां भी बचेंगी और खेती में भी सुधार संभव है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6488502539236057488-8961055961143006547?l=hashiye-par.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hashiye-par.blogspot.com/feeds/8961055961143006547/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2010/09/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/8961055961143006547'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/8961055961143006547'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2010/09/blog-post.html' title='दम तोड़ रही हैं सतपुडा की नदियां'/><author><name>Baba Mayaram</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07974100393280656159</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TQ2zSrZyPhI/AAAAAAAAAKE/mmnqrZO0TCI/S220/baba_fb.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TIX-HBoBjNI/AAAAAAAAAJA/kcIYwjIcPS0/s72-c/Picture+002.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6488502539236057488.post-7968906171533970370</id><published>2010-05-12T13:41:00.007+05:30</published><updated>2010-05-13T11:36:50.778+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Hashiye-Par'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Satpura'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Hoshangabad'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Education'/><title type='text'>मीडिया शिक्षा का अभिनव  प्रयोग</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/S-pfQZq6ddI/AAAAAAAAAIQ/KRcxB15lp-Y/s1600/Divya.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="305" src="http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/S-pfQZq6ddI/AAAAAAAAAIQ/KRcxB15lp-Y/s400/Divya.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;दिव्या, जानकी, दीक्षा, मनीषा,रामकुमार, गोविंद आदि स्कूली बच्चे हाथ में पेन-कापीलिए साक्षात्कार ले रहे थे। डापका गांव के पूर्व सरपंच लक्ष्मण प्रसाद मेहरा और कोरकू&amp;nbsp; रानी रेवाबाई अपने ही गांव के बच्चों को नई भूमिका में देखकर भाव विह्वल हो गईं। बच्चे सवाल पर सवाल किए जा रहे थे और गांव के लोग उन्हें सुखद आश्चर्य से देख रहे थे। यहां चाहे घरों में काम करती महिलाएं हों या खेत जाने वाले किसान,&amp;nbsp; दूकान पर बैठे दुकानदार हों या स्कूल के शिक्षक सबसे बच्चों ने सबके साक्षात्कार लिए।&amp;nbsp; अलग-अलग टोलियों में विभक्त बच्चे पेशेवर पत्रकारों की तरह चर्चा कर रहे थे। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;यह दृश्य था मध्यप्रदेश में होशंगाबाद जिले के पिपरिया विकासखंड के एक छोटे से गांव डापका का। यह गांव सतपुड़ा की घाटी की गोद में बसा है। यहां आदिवासी ज्यादा हैं। पिपरिया विकासखंड मुखयालय से यहां की दूरी लगभग १५ किलोमीटर है। यहां के बच्चे अखबार से ज्यादा परिचित नहीं हैं और न ही टेलीविजन पर समाचार सुनते हैं। गांव के लोगों की माली हालत अच्छी नहीं है। खेती-किसानी के अलावा वनोपज और जंगल से निस्तार होता है। कुछ लोग हम्माली के काम के लिए पिपरिया आते हैं। &lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/S-phVhwnouI/AAAAAAAAAIg/-4mD3_uequc/s1600/MW.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="253" src="http://2.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/S-phVhwnouI/AAAAAAAAAIg/-4mD3_uequc/s320/MW.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;इस गांव में हमने शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत एकलव्य संस्था के सहयोग से मीडिया कार्यशाला का आयोजन किया । स्कूली बच्चों के साथ मीडिया कार्यशाला का यह मेरा पहला प्रयोग था। इसके पहले मैं ग्रामीण पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ ऐसी कार्यशाला कर चुका हूं। कार्यशाला में माध्यमिक स्तर के ३५ बच्चे शामिल थे। यह कार्यशाला ७ मई से १० मई तक चली।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस दौरान पहले दो दिनों में मीडिया के विभिन्न माध्यमों का बच्चों पर क्या असर होता है, खबर कैसे बनती है और उन्हें कैसे लिखा जाता है, इस पर चर्चा की गई।&amp;nbsp; संपादक के नाम पत्र और साक्षात्कार के लिए क्या-क्या तैयारी चाहिए, इस पर प्रकाश डाला गया और इसके अभ्यास किए गए। तीसरे दिन गांव का दौरा किया।&amp;nbsp;&amp;nbsp; ग्रामीणों से कई मुद्‌दों पर बच्चों ने बातचीत की। जिसमें बिजली कटौती, पीने के पानी की समस्या, फसल की रखवाली, नरवाई (हारवेस्टर की कटाई के बाद गेहूं के ठंडलों में आग लगाई जाती है) से नुकसान, गांव का विकास कैसा होना चाहिए आदि मुद्‌दे शामिल थे। चौथे और अंतिम दिन इन मुद्‌दों पर चमत्कार, नजर, पहल, कोयल, हाथी, कबूतर, सोनपरी आदि दीवार अखबार तैयार किए गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिजली कटौती से आटाचक्की नहीं चलती और आटा पिसाई नहीं हो पाती, यह बात समझी जा सकती है। लेकिन पड़ोसी के घर से आटा मांगकर रोटी बनाई जाती है, यह बहुत कम लोग जानते हैं। हमारे साथ आए कुछ शहरी मित्रों को यह जानकारी भी नई थी कि फसल को कैसे सुअरों से नुकसान होता है।&amp;nbsp; जबकि जंगल क्षेत्र में यह समस्या आम और विकट है। जंगली जानवर और खासतौर से सुअर उनकी गेहूं- चना की फसलों को बहुत नुकसान पहुंचाते हैं। इन सभी समस्याओं पर बच्चों ने न केवल इन पर समाचार बनाएं बल्कि सुअर की नकल उतार कर भी बताई। जिस दिन से यहां खेतों में गेहूं-चना का बीज बोया जाता है उसी दिन से रखवाली करनी पडती है। खेत में डेरा डालकर रहना पडता है। अन्यथा जंगली जानवर सुअर, हिरण आदि उनकी फसलों को चौपट कर देते हैं। यह वैसा ही है कि नजर हटी कि दुर्घटना घटी।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/S-pf6kxYw2I/AAAAAAAAAIY/FKbrK6n21KU/s1600/Childrens_interviewing.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="336" src="http://3.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/S-pf6kxYw2I/AAAAAAAAAIY/FKbrK6n21KU/s400/Childrens_interviewing.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्कूली बच्चों को मीडिया शिक्षा की जरूरत महसूस की जाती रही है।&amp;nbsp; मीडिया का उन पर कई तरह से असर देखा जा सकता है। नकारात्मक असर की&amp;nbsp; खबरें आती रहती हैं। उन पर सिनेमा, टेलीविजन, रेडिया और समाचार पत्रों का असर देखा जाता है। जिनमें से आक्रामक हिंसा, नकल, फैशान और उपभोक्ता संस्कृति की ओर रूझान प्रमुख है। लेकिन मीडिया का सकारात्मक असर भी हो सकता है। शॆक्षणिक और सृजनात्मक असर भी हो सकता है, इस पर कम ही ध्यान दिया जाता है। अपने अनुभव और अवलोकन को शब्दों में कैसे अभिव्यक्त कर सकते हैं यह कार्यशाला का एक उद्‌देशय था। एकलव्य के जुडे चंदन यादव ने लेखन को चित्र और कार्टून से जोड कर बच्चों को बताया। एकलव्य पिपरिया के गोपाल राठी, कमलेशा भार्गव और राकेशा कारपेंटर ने पूरी कार्यशाला का संयोजन किया और भोपाल से आईं दीपाली ने उपयोगी सुझाव दिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/S-ph6ue35xI/AAAAAAAAAIo/SbwYqKhIgLc/s1600/wall_paper.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="400" src="http://2.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/S-ph6ue35xI/AAAAAAAAAIo/SbwYqKhIgLc/s400/wall_paper.jpg" width="300" /&gt;&lt;/a&gt;आम तौर पर मीडिया वन-वे दिखाई देता है। वह खबरें या कार्यक्रम देता है और हम उसे देखते हैं। चाहे फिल्मों हो, टेलीविजन हो, रेडियो हो और समाचार पत्र. हों, ये सभी माध्यम वन-वे ही हैं। इनमें दर्शाकों की भूमिका सिर्फ दर्शक तक है। जबकि चाहे मनोरंजन की बात हो या संवाद की, इनमें भागीदारी बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती थी। लेकिन बच्चों में यह दृ्‌ष्टि विकसित करना कि वे खबर के पीछे की खबर को जान सकें। उन पर बात कर सकें और उनमें आलोचनात्मक और विशलेषणात्मक क्षमता विकसित की जा सके। वे मीडिया की बारीकियां समझ सकें और उनमें लेखन कौशाल विकसित हो सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कार्यशाला में यह कोशिश की गई कि बच्चों से संवाद बनाया जाए और वे भी इस पूरी प्रक्रिया में शामिल हों और हम बहुत हद इसमें सफल भी हुए। आखिरी दिन यह कोशिश सफल हुई जब उन्होंने खुद अपनी-अपनी टोलियों में दीवार अखबार तैयार किए। अखबार के नाम रखने से लेकर संपादन तक की भूमिका उन्होंने निभाई। वे अपने-अपने काम में इतने मनोयोग और तन्मयता से लगे थे, उन्हें देखते ही बनता था। मैं यह सोच रहा था कि ऐसा माहौल स्कूलों में क्यों&amp;nbsp; नहीं बन सकता?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6488502539236057488-7968906171533970370?l=hashiye-par.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hashiye-par.blogspot.com/feeds/7968906171533970370/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2010/05/blog-post.html#comment-form' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/7968906171533970370'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/7968906171533970370'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='मीडिया शिक्षा का अभिनव  प्रयोग'/><author><name>Baba Mayaram</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07974100393280656159</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TQ2zSrZyPhI/AAAAAAAAAKE/mmnqrZO0TCI/S220/baba_fb.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/S-pfQZq6ddI/AAAAAAAAAIQ/KRcxB15lp-Y/s72-c/Divya.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6488502539236057488.post-3535484845373260600</id><published>2010-04-15T08:38:00.003+05:30</published><updated>2010-04-15T19:00:20.290+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Handloom'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Hashiye-Par'/><title type='text'>बुनकरों की रोजी-रोटी का संकट</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/S8cP67D_5ZI/AAAAAAAAAH4/aguo8SP-X8o/s1600/Picture+046.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 300px; FLOAT: left; HEIGHT: 400px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5460350578171307410" border="0" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/S8cP67D_5ZI/AAAAAAAAAH4/aguo8SP-X8o/s400/Picture+046.jpg" /&gt;&lt;/a&gt; ''मैंने हथकरघे पर कपड़ा बनाने का काम पिताजी से बचपन में सीखा और थोडा-बहुत अब भी करता हूं। लेकिन अब यह काम धीरे-धीरे खत्म होने की कगार पर है। इस बस्ती में पहले हर घर में हथकरघा (हैंडलूम) चलता था, अब सिर्फ एक-दो घरों में चलता है। हथकरघे बंद पडे हैं और उनमें धूल जमी हैं। लोग रोजगार की तलाश में इधर-उधर भटक रहे हैं।'' यह कहना है मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर के एक बुनकर महेन्द्र कोस्टी का।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नरसिंहपुर जिला मुख्यालय है। यहां कोस्टी समुदाय के बुनकरों की बस्ती है। इस बस्ती में 20-25 परिवार हैं। अब यहां हथकरघों की खट-पट सुनाई नहीं पड ती है। कुछ समय पहले करतल ध्वनि की तरह आवाज गूंजा करती थी। गली-मोहल्लों में चहल-पहल होती थी। पुरुष हथकरघे पर बैठते थे और महिलाएं चरखा पर सूत की बाविन बनाती थी॥ जब बडे -बुजुर्ग काम से थोडा थक जाते थे तब बच्चे भी सीखने के लिहाज से हाथ आजमाया करते थे। जैसे बीस बरस पहले कैलाश ने अपने पिता के साथ करघा सीखा था। लेकिन आज वह फेरी लगाकर कपडा बेचता है क्योंकि करघा अब बंद हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महेन्द्र कोस्टी कहते है कि यह घर बैठे का काम है और इसे करने में उन्हें बडा संतोष का अनुभव होता है। हाथ से होने वाली कताई-बुनाई हुनर व कौशल की मांग करती हैं, जिसमें वे दक्ष हैं। एक दिन में करीब 4-5 रजाईयों का कपडा तैयार कर लेते थे। लेकिन अब खाली हाथ हैं, काम नहीं है। सिर्फ ठंड के मौसम में करघे चलते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे बताते है कि अब सूत महंगा हो गया। उसे जबलपुर और नागपुर से मंगाते है। और मशीनीकरण होने के कारण उनकी बुनी हुई रजाईयों की मांग कम हो गई। नई-नई डिजाईन का भी जमाना है। पावरलूम के कपड़ों से हम स्पर्धा नहीं कर सकते। इसलिए हमारी सरकार को मदद करनी चाहिए। हाल ही उन्होंने रेशम विभाग की मदद से साडियों बनाने का काम शुरू किया है, लेकिन उसमें भी सिर्फ मजदूरी ही मिलती है। अब नरसिंहपुर की तरह सिवनी, मंडला, छिंदवाडा, लोधीखेडा, सौसर आदि कई जगहों के बुनकरों की रोजगार की समस्या पैदा हो गई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह काम स्वावलंबी हो सके, पूरी तरह बुनकरों के हाथ में हो, इसलिए सूत के लिए मिलों पर निर्भरता नहीं होनी चाहिए, यह गांधी जी की भी सोच थी। उन्होने यह समझ लिया था हाथ की बुनाई की आर्थिक सफलता के लिए जरूरी है कि कताई भी हाथ से ही हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमने नगद फसलों से प्रेरित होकर खेती में फसलचक्र को बदल लिया है। अब स्थानीय स्तर पर कपास उपलब्ध नहीं है। हालांकि यहां के आसपास की जमीन नर्मदा कछार होने के कारण बहुत ही उपजाऊ है, जिसमें कपास की खेती संभव है। इसलिए बुनकरों को अब सूत सस्ते में उपलब्ध हो सके, यह प्रयास करना चाहिए। अन्यथा सूत महंगा होने मात्र से बुनकरों की कमर टूट जाती है। यद्यपि यहां सहकारिता का पुराना अनुभव ठीक नहीं है। लेकिन वह भी एक अच्छा विकल्प हो सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे देश में खेती के अलावा छोटे-छोटे परंपरागत ग्रामो द्योग व लघु कुटीर उद्योग धंधे हुआ करते थे जिनसे लोगों को रोजगार मिलता था। इन काम-धंधों का खत्म करने का सिलसिला अंग्रेजों के जमाने से ही शुरू हो गया था, जो अब भी जारी है। उन्होंने हमारे किसानों व बुनकरों की कमर तोड ने के बहुत प्रयास किए। आजादी के बाद हमने बडे-बडे उद्योग लगाने पर जोर&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/S8cRqcrKppI/AAAAAAAAAIA/nN58WYPjhvM/s1600/Picture+074.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 357px; FLOAT: right; HEIGHT: 249px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5460352494159439506" border="0" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/S8cRqcrKppI/AAAAAAAAAIA/nN58WYPjhvM/s400/Picture+074.jpg" /&gt;&lt;/a&gt; दिया और उन्हें बढावा देने के लिए सब्सिडी भी दी गई। उन्हें आधुनिक भारत के मंदिर कहा गया। लेकिन छोटे घरेलू उद्योगों पर ध्यान नहीं दिया गया बल्कि उनकी उपेक्षा की और खत्म होने के लिए छोड दिया जिससे बेरोजगारी बढती चली जा रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थशास्त्री और समाजवादी विचारक श्री सुनील कहते है कि केवल खेती से ही देश के लोगों की जीविका नहीं चल सकती। खेती के पूरक के रूप में छोटे-मोटे काम धंधे भी जरूरी है। लेकिन हमने औद्योगिकीकरण के चलते बड़े उद्योगों को बढावा दिया है और छोटे उद्योगों को खत्म किया है। इससे इन उद्योगों का बाजार में कब्जा हो गया और उन्हें इन छोटे उद्योगों में लगे लोगों का सस्ता श्रम भी उपलब्ध हो गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुनकरों की तरह लोहार, बढई, बंशकार, तेली, रंगरेज, मोची, भड भूजे आदि कई घरेलू काम-धंधे थे। धीरे-धीरे वे या तो खत्म हो गए, या फिर खत्म होने की कगार पर हैं। इस कारण बडी संखया में लोग बेरोजगार हो रहे हैं और उनकी रोजी-रोटी का संकट बढ ता जा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जबकि गांधीजी का दावा था कि ''चरखा सर्वाधिक सस्ता, सहज, सस्ते और व्यावहारिक ढंग से हमारे आर्थिक क्लेश की समस्या का समाघान कर सकता है। यह राष्ट्र की समृद्धि का और इसलिए , स्वतंत्रता का प्रतीक है। वह वाणिज्यिक युद्ध का नहीं, अपितु वाणिज्यिक शांति का प्रतीक है।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मशीनीकरण भी एक कारण है, जिससे लोग बडी संखया में बेरोजगार हो रहे हैं। हैंडलूम की जगह पावरलूम ने ले ली है। इसी प्रकार खेती में मशीनीकरण से बडे पैमाने में लोगों को खेती से अलग होना पड रहा है। खेत की जुताई से लेकर कटाई तक मशीनीकरण से काम होने लगा है जिससे लोगों को खेती में काम नहीं मिल पा रहा है। वहीं दूसरी ओर हरित क्रांति का भी संकट स्पष्ट रूप से सामने आ गया है। और हरित क्रांति वाले कई राज्यों में किसान अपनी जान दे रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश के जाने-माने पत्रकार भारत डोगरा का मानना है कि आज दुनिया में जब जलवायु परिवर्तन एक चिंता का विषय का बना हुआ है, तब अनियंत्रित मशीनीकरण पर पुनर्विचार करना चाहिए। क्योंकि इससे निकलने वाली ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन से जलवायु बदलाव का संकट बढने का खतरा बढ गया है। इसलिए अब हथकरघा जैसे कामों को फिर से खडा करने की जरूरत है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/S8cTjqfb2qI/AAAAAAAAAII/Ucc3Op_Gze4/s1600/Picture+036.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 455px; FLOAT: left; HEIGHT: 312px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5460354576632502946" border="0" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/S8cTjqfb2qI/AAAAAAAAAII/Ucc3Op_Gze4/s400/Picture+036.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6488502539236057488-3535484845373260600?l=hashiye-par.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hashiye-par.blogspot.com/feeds/3535484845373260600/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2010/04/blog-post.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/3535484845373260600'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/3535484845373260600'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='बुनकरों की रोजी-रोटी का संकट'/><author><name>Baba Mayaram</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07974100393280656159</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TQ2zSrZyPhI/AAAAAAAAAKE/mmnqrZO0TCI/S220/baba_fb.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/S8cP67D_5ZI/AAAAAAAAAH4/aguo8SP-X8o/s72-c/Picture+046.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6488502539236057488.post-5640723794702749947</id><published>2010-03-20T16:37:00.004+05:30</published><updated>2010-03-20T17:11:12.734+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Narmada'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='River'/><title type='text'>क्या नर्मदा की निर्मल चादर मैली होगी?</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/S6Su4Mw1wHI/AAAAAAAAAHI/QVfvJ-Ae6Zg/s1600-h/Picture+081.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 384px; FLOAT: right; HEIGHT: 275px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5450673729547124850" border="0" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/S6Su4Mw1wHI/AAAAAAAAAHI/QVfvJ-Ae6Zg/s400/Picture+081.jpg" /&gt;&lt;/a&gt; मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर जिले के सांईखेड़ा विकासखंड में एन.टी.पी.सी. के कोयला बिजलीघर लगने की खबर से गांववासी आंदोलित हैं। वे अपने घर-जमीन बचाने के लिए महात्मा गांधी की राह पर चलकर सत्याग्रह कर रहे हैं। धरना, प्रदर्शन और संकल्प का सिलसिला चल रहा है। वे प्रशासन के आला अफसरों से लेकर मुख्यमंत्री तक से मिल चुके हैं लेकिन अब तक उन्हें कोई स्पष्ट आश्वासन नहीं मिला है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इधर उन्होंने आंदोलन तेज करते हुए पिछले दिनों नर्मदा जल में खडे होकर संकल्प ले लिया है कि जान देंगे पर जमीन नहीं। गांववासियों की एकता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पंचायत चुनाव का उन्होंने पूर्ण रूप से बहिष्कार किया और इन गांवों में एक भी वोट नहीं पडा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नर्मदा और दूधी नदी के संगम पर बनने वाला यह सुपर कोयला बिजलीघर 2640 मेगावाट बिजली बनाएगा। इसमें 9 गांव की जमीन उपजाऊ जमीन ली जाने वाली है। तूमडा, महेशवर, संसारखेडा, मेहरागांव, झिकौली और निमावर ग्राम पंचायतों के 9 गांवों की जमीन जाएगी। इसके अलावा बरौआ, नोरिया, केंवट जैसे मछुआरा समुदाय के लोग भी प्रभावित होंगे। इन समुदायों का बरगी बांध बनने से पहले ही डंगरबाडी (तरबूज-खरबूज की खेती) का धंधा चौपट हो गया है। बरगी बांध से समय-असमय पानी छोडा जाता है, इस कारण तरबूज-खरबूज की खेती नहीं हो पा रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तूमड़ा निवासी दयाद्गांकर खेमरिया कहते हैं कि यह सबसे उपजाऊ जमीन है। फसलों के रूप में सोना उगलती है। हम इसमें सभी फसलें लेते हैं। पहले यहां कपास और मूंगफली की खेती होती थी। वर्तमान में यहां की तुअर प्रसिद्ध है। यह नर्मदा कछार की जमीन है। सोयाबीन, गेहूं, गन्ना सब कुछ होता है। उन्होंने कहा कि हालांकि गांव नहीं हटाए जा रहे हैं लेकिन जब जमीन नहीं रहेगी, तो हम क्या करेंगे? यहां के पूर्व सरपंच छत्रपाल ने कहा कि हम किसी भी कीमत पर एन. टी. पी.सी. का संयंत्र नहीं लगने देंगे। इसका पूरी ताकत से विरोध किया जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तरह नर्मदा पर करीब एक दर्जन बिजलीघर बनने वाले हैं। बडे-बडे बांध बनने के बाद नर्मदा पर यह दूसरा सबसे बडा संकट है। बरगी बांध, इंदिरा सागर, ओंकारेश्वर, महेश्वर और सरदार सरोवर जैसे बांध बनाए जा चुके हैं। इससे नर्मदा के किनारे बसे गांवों और मंदिरों के रूप में हमारी बरसों पुरानी सभ्यता व संस्कृति खत्म हो रही है। नर्मदा की परिक्रमा की परंपरा बहुत पुरानी है। नर्मदा किनारे कई परकम्मावासी मिल जाएंगे। यहां कई पुरातत्वीय महत्व के स्थल भी मिले हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/S6SwdkmAWuI/AAAAAAAAAHQ/rbZa2fyFN2g/s1600-h/chotasadhu+019.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 318px; FLOAT: left; HEIGHT: 219px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5450675471110920930" border="0" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/S6SwdkmAWuI/AAAAAAAAAHQ/rbZa2fyFN2g/s400/chotasadhu+019.jpg" /&gt;&lt;/a&gt; बिजलीघर के विरोध करने के लिए बनी किसान मजदूर संघर्ष समिति तूमडा ने नर्मदा मां से भी अपने ऊपर आए इस संकट में गुहार लगाई है। इसमें कहा गया है कि '' हे मां, तेरी असीम कृपा से इस इलाके में जो नेमत बरसती थी, उससे यहां के रहवासियों को वंचित किया जा रहा है। मां ! जिस जमीन को तू हर साल अपने आंचल में समेट कर नया उर्वर जीवन देती रही है, बिजलीघर लग जाने के बाद, तेरी यही नियामत राख के पहाडों से बांझ हो जाएगी।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करीब 5 हजार आबादी वाले तूमड़ा गांव की दीवारों पर एन.टी.पी.सी. के विरोध में नारे लिखे गए हैं। चौराहे पर एकत्र होकर दिन भर बिजलीघर ही चर्चा के केन्द्र में है। लोग बेचैन और परेशान हैं। आंदोलन कर रहे हैं। अब तक कोई अनिद्गचय का वातावरण बना हुआ है। दयाशंकर खेमरिया कहते हैं ''हमें प्यास लगी है, पानी चाहिए, वे हमें संतरा की गोली देते हैं। स्पष्ट कुछ नहीं कहा जाता, संयंत्र यहीं लगेगा या और कहीं। ''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समाजवादी जनपरिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री सुनील ने कहा कि नर्मदा बरगी बांध बनने से नर्मदा में तरबूज-खरबूज की बाडियों का धंधा चौपट हो गया। अब बिजलीघरों की राखड और कारखानों के प्रदूषण से मछली खतम हो जाएगी। उन्होंने कहा कि इनसे नदियां, जमीन, जंगल, जैव विविधता नहीं बचेगी। और नर्मदा जो बडे बांध बनने के कारण पहले से ही तालाब और नाला में बदल गई है, अब गटर में तब्दील हो जाएगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/S6Sz0gcQT9I/AAAAAAAAAHg/f6LBav_8r-U/s1600-h/Sunil.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 262px; FLOAT: right; HEIGHT: 295px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5450679163668156370" border="0" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/S6Sz0gcQT9I/AAAAAAAAAHg/f6LBav_8r-U/s400/Sunil.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;करीब 25 सालों से किसान-आदिवासियों के हक और इज्जत की लडाई लडने वाले श्री सुनील सवाल उठाते हैं कि क्या नर्मदा की स्थिति यमुना और गंगा जैसी नहीं होगी ? क्या नर्मदा का पानी आचमन करने लायक, नहाने लायक और मवेशियों के पीने लायक भी रह जाएगा ? लाखों किसान व गांववासी तो सीधे उजडेंगे ही, इस नदी पर आश्रित करो्डों लोगों की जिंदगी व रोजी-रोटी भी क्या बर्बाद नहीं हो जाएगी ? यह कैसा विकास है ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस क्षेत्र में सक्रिय समाजवादी जनपरिषद से जुडे गोपाल राठी व श्रीगोपाल गांगूडा ने कहा कि है कि इससे नर्मदा बहुत ही पवित्र नदी है। इससे लोगों की भावनाएं जुडी हुई हैं, इसे प्रदूषित होने से बचाया जाना जरूरी हैं।&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;पर्यावरणीय मुद्‌दों पर सतत लेखन करने वाले पत्रकार भारत डोगरा का कहना है कि यह ग्लोबल वार्मिग के संदर्भ में भी देखना चाहिए। थर्मल पावर से जो जिन कार्बन गैसों का उत्सर्जन होगा, उसका असर तापमान पर भी पडेगा। यह दुनिया का सबसे चिंता का विषय है। इसलिए हमें ऊर्जा के दूसरे विकल्पों पर विचार करना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(लेखक विकास संबंधी मुद्‌दों पर लिखते हैं)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6488502539236057488-5640723794702749947?l=hashiye-par.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hashiye-par.blogspot.com/feeds/5640723794702749947/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2010/03/blog-post_20.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/5640723794702749947'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/5640723794702749947'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2010/03/blog-post_20.html' title='क्या नर्मदा की निर्मल चादर मैली होगी?'/><author><name>Baba Mayaram</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07974100393280656159</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TQ2zSrZyPhI/AAAAAAAAAKE/mmnqrZO0TCI/S220/baba_fb.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/S6Su4Mw1wHI/AAAAAAAAAHI/QVfvJ-Ae6Zg/s72-c/Picture+081.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6488502539236057488.post-4531367685575082341</id><published>2010-03-16T06:55:00.005+05:30</published><updated>2010-03-18T17:38:44.658+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='YatraVritant'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Narmada'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='River'/><title type='text'>नर्मदा का अनूठा सौंदर्य क्या बच पाएगा?</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/S57gN1zJvDI/AAAAAAAAAG4/Sq_5hIL-aaE/s1600-h/Maheshwar+033.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 360px; FLOAT: left; HEIGHT: 246px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5449039127549426738" border="0" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/S57gN1zJvDI/AAAAAAAAAG4/Sq_5hIL-aaE/s400/Maheshwar+033.jpg" /&gt;&lt;/a&gt; सुबह का समय है। मैं महेश्वर के नर्मदा तट पर घूम रहा हूं। सूर्योदय हो रहा है। सूरज का गोला धीरे-धीरे ऊपर आ रहा है और नर्मदा में उसकी तेज सुनहरी किरणें चमक रही हैं। घाट पर चहल-पहल है। कल सोमवती अमावस्या है। स्नान करने के लिए गांवों से हर-हर नर्मदे का जयकारा लगाते हुए श्रद्धालु आ रहे हैं जिसमें महिलाएं भी बड़ी संखया में शामिल हैं। मैं यहां एक कार्यशाला के सिलसिले में तीन दिनी प्रवास पर आया हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मध्यप्रदेश के खरगोन जिले में महेश्वर स्थित है। इसे देवी अहिल्या बाई की नगरी भी कहा जाता है। वे मल्हारराव होल्कर की पुत्रवधू थीं जिन्होंने अपने पति की मृत्युपरांत शासन की बागडोर संभाली। उनका जन्म ३१ अगस्त १७२५ में हुआ और निधन १३ अगस्त १७९५ को। उन्होंने करीब २८ साल द्गाासन किया। मालवा की राजधानी महेश्वर ही हुआ करती थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अहिल्या बाई होल्कर ने अपने शासन काल में कई उल्लेखनीय कार्य किए जिसमें से एक है यहां का हेंडलूम उद्योग। महेश्वर की साड़ियां बहुत ही प्रसिद्ध हैं। जब सभी जगह पावरलूम छा गया है उस समय यहां हेंडलूम से काफी लोगों को रोजगार उपलब्ध है। और यहां की साडियों की बाजार में काफी मांग है। जब कभी महिलाओं की योग्यता की बात आती है तब देवी अहिल्या जैसी महिलाओं की याद की जानी चाहिए जिन्होंने अपने कुद्गाल प्रशासन और न्याय से जनता का दिल का जीत लिया। इस कारण उन्हें देवी की उपाधि दी गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक नर्मदा भक्त तंबूरे की तान और खडताल के साथ भजन गा रहा था। कबीर का भजन। कबीर की तरह फक्कड और मस्तमौला उसका अंदाज था। मैं वहंस वहीं बैठ गया। ऐसे भक्त जो निस्वार्थ भाव से नर्मदा की महिमा का बखान करते हैं, उनका समर्पण देखते ही बनता है। नर्मदा मैया तो जीवनदायिनी और सबकी पालनहार है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नर्मदा में हल्की हवा के साथ लहरें उठती हैं, गिरती हैं। जैसे पानी के अंदर बैठा कोई बच्चा उन्हें हिला-डुला रहा हो। हमारे हृदय में भी इसी तरह सांस ऊपर-नीचे होती है। एक गहरी शान्ति का अनुभव हो रहा है। सोच रहा था कि इस विराट तट पर कितना शांत और आकर्षक लगती है नर्मदा। इसके कई रूप हैं।&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/S57j-rj0tVI/AAAAAAAAAHA/GPrIw48D8xs/s1600-h/Maheshwar+066.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 357px; FLOAT: right; HEIGHT: 293px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5449043265149252946" border="0" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/S57j-rj0tVI/AAAAAAAAAHA/GPrIw48D8xs/s400/Maheshwar+066.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले दिनों जब मैं जबलपुर के पास भेड़ाघाट गया था। वहां धुंआधार पर नर्मदा का एक अलग ही छटा है। मैय्या की धार ऊपर से गिर रही थी। और नीचे से फुहारे छूट रहे थे। खाई में पानी नीचे जाकर गेंद की तरह टप्पा खाकर ऊपर आ रहा था। बहुत की मनमोहक है नर्मदा। बरमान की सतधारा में वह सात धाराओं में बंटकर बेहद खूबसूरत लगती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां तट पर विराट और भव्य किला है जिसकी कारीगरी देखते ही बनती है। हम इसे देखने गए। इसकी दीवारों और मेहराबों में अलग-अलग आकृतियां उकेरी गई हैं। कई सीढियां चढ कर हम देवी अहिल्या के निवास व मंदिर गए। आरती का समय था। आरती में शामिल हो प्रसाद ग्रहण किया। यह सब देखकर राजाओं के पुराने वैभव व शासन की तो याद आती ही है। उनके द्वारा किए गए अच्छे कामों को भी जानने का मौका मिलता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन अब नर्मदा संकट में है। जगह-जगह इस पर बांध बनाए जा रहे हैं। महेद्गवर में भी बांध बन रहा है। नर्मदा बचाओ आंदोलन लंबे अरसे से संघर्षरत है। पर्यावरणविद्‌ व प्रखयात समाज सेविका मेधा पाटकर कहती हैं यह विकास नहीं, विनाश है। ऊर्जा के कई और विकल्प हैं, उन पर विचार करना चाहिए। मैं सोच रहा था क्या भविष्य में सौंदर्य की नदी नर्मदा बच पाएगी? क्या जीवनदायिनी नर्मदा सदानीरा बनी रहेगी ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महेश्वर की और भी छाया चित्र देखे &lt;a href="http://www.flickr.com/photos/vikalpkumar/"&gt;यहाँ क्लिक करे &lt;/a&gt;&lt;br /&gt;(यह लेख 17  मार्च 2010   &lt;em&gt;छत्तीसगढ़&lt;/em&gt; मै प्रकाशित )&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6488502539236057488-4531367685575082341?l=hashiye-par.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hashiye-par.blogspot.com/feeds/4531367685575082341/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2010/03/blog-post_16.html#comment-form' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/4531367685575082341'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/4531367685575082341'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2010/03/blog-post_16.html' title='नर्मदा का अनूठा सौंदर्य क्या बच पाएगा?'/><author><name>Baba Mayaram</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07974100393280656159</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TQ2zSrZyPhI/AAAAAAAAAKE/mmnqrZO0TCI/S220/baba_fb.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/S57gN1zJvDI/AAAAAAAAAG4/Sq_5hIL-aaE/s72-c/Maheshwar+033.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6488502539236057488.post-2320511380433874690</id><published>2010-03-04T20:55:00.001+05:30</published><updated>2010-03-04T20:57:50.433+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Satpura'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='YatraVritant'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Hoshangabad'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Agriculture'/><title type='text'>फसल उत्पादन ही नहीं, एक जीवन पद्धति है खेती</title><content type='html'>&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 381px; FLOAT: left; HEIGHT: 273px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5444794155967122658" border="0" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/S4_Lb-WLDOI/AAAAAAAAAGo/50IcrqnCuco/s400/March+161.jpg" /&gt;पिछले दिनों मैं अपने एक मित्र के बुलावे पर उनके खेत गया। मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के पिपरिया विकासखंड के डापका गांव में हम गए। खेत में चना की कटाई चल रही है। साथ में बेटा और एक अन्य मित्र भी थे। &lt;p&gt;सतपुड़ा की तलहटी में हरे-भरे खेत थे। चारों तरफ गेहूं, चना, मसूर, मटर और अरहर की फसलें थीं। सिंचाई की सुविधा नहर से थी। आजादी के बाद पहली पंचवर्षीय योजना में यहां एक नदी पर डोकरीखेडा बांध बनाया गया था, जिससे यहां खेतों की सिंचाई होती है। लेकिन इस बांध में भी पानी की कमी रहती है। अनियमित व कम वर्षा के कारण पिछले साल बांध सूखा था। लेकिन इस साल पर्याप्त पानी है। समीप के गांव झिरिया में एक स्टापडेम बनाकर इसमें पानी की नहर जोड दी गई है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शाम का समय था। चने की खेत कटाई चल रही है। मित्र के माता-पिता दोनों मिलकर कटाई कर रहे थे। झुंड में पक्षी फसलों में दाने चुग रहे थे। मचान से मित्र के पिता पक्षियों को भगाने के लिए हुर्र-हुर्र चिल्ला रहे थे। सामने सतपुड़ा की लबी पर्वत श्रृंखला थी। मेढ पर बैल चर रहे थे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हमारा होरा (भुने हुए हरे चने) खाने का कार्यक्रम था। मित्र और मैं बेर की सूखी टहनियां एकत्र कर रहे थे, जिससे चना भून सकें। मेढ पर लगे बेर पक कर झर गए थे। कहीं-कहीं बेर भी लगे थे। मैं टहनियां बीनने के साथ बेर भी तोड कर खा रहा था। उधर बेटा मटर के खेत में हरी फल्लियां तोड कर खाने लगा। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;अब हमने चने को भूनने के लिए सूखी टहनियां एकत्र कर ली है। मित्र की मां ने हरे चने काटकर दे दिए हैं। टहनियों पर हरे चने बिछाए जा रहे हैं। आग सुलगाने के लिए सूखी पत्तियां एकत्र कर आग लगा दी गई। आग धू-धू कर जलने लगी है। चना की घेटियां (दाने) फूटने लगे हैं। भुने चनों की खुशबू हमारे नथुनों में भर रही थी। आग से चने जल न जाए, इसलिए मित्र ने उलटने-पलटने के लिए एक डंडा हाथ में ले रखा है। उससे वे आग में चना भून रहे हैं। पलाश की हरी टहनियों से आग बुझाई जा रही है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अब होरा भुन गया है। हम सब उसे बीन-बीनकर खाने में लगे हैं। खेती-किसानी पर बात-चीत चल रही है। मित्र बता रहे थे हमने चना में किसी भी प्रकार की रासायनिक खाद नहीं डाली है। कीटनाशक का इस्तेमाल नहीं किया है। उन्होंने कहा कि अब तो कटाई भी कंबाईन हारवेस्टर से होने लगी है। लेकिन हम खेती का सब काम खुद ही करते हैं। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;शाम ढल चुकी है। होरा (भुने चने) खत्म हो गए थे। कुछ बचाकर घर के लिए थैले में रख लिए। लौटने का समय हो गया है। हम घर लौटने लगे। गांव में आए। वहां हर घर के पीछे एक बाड़ी देखी। बाडी में बैंगन, सेमी, आलू और फलदार वृक्ष देखकर बहुत ही अच्छा लगा। हालांकि मैदानी क्षेत्रों में बाड ी अब नहंी के बराबर हैं। लोगों ने बाडी के स्थान पर मकान &lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/S4_OJn51axI/AAAAAAAAAGw/py7vzOO1evc/s1600-h/March+227.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 385px; FLOAT: right; HEIGHT: 304px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5444797139239922450" border="0" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/S4_OJn51axI/AAAAAAAAAGw/py7vzOO1evc/s400/March+227.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;बना लिए हैं। जबकि जंगल पट्‌टी में बाडि यां अब भी देखी जा सकती है। बाडि यों से हरी सब्जियां मिलती हैं। हमारी ग्राम्य जीवनद्गौली की सबसे बडी विशेषता भी यही थी कि वह स्वावलंबी थी। खेती-बाडी भी स्वावलंबी थी। अब परावलंबी हो गई।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अब खेती में बीज से लेकर रासायनिक खाद, कीटनाशक, बिजली सब कुछ खरीदना पड ता है। टे्रक्टर से बुआई-जुताई, कंबाईन हारवेस्टर से कटाई होने लगी है। लागत बढ ती जा रही है। उपज घटती जा रही है। ज्यादा पानी, ज्यादा रासायनिक खाद, ज्यादा कीटनाशक आदि के कारण जमीन की उर्वरा द्यशक्ति घटती जा रही है। कुल मिलाकर सबका अन्नदाता किसान संकट में है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;लौटते समय मित्र ने ज्वार भी दिखाई। मसूर और ज्वार जैसी फसलें अब बहुत कम होने लगी हैं। अरहर का उत्पादन तो बहुत कम हो गया है। इस कारण इसके दाम आसमान छूने लगे हैं। पहले किसान भोजन की जरूरत के मुताबिक फसलचक्र को अपनाता था। अब उत्पादन और नगद पैसों से फसल का चुनाव होता है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;लेकिन असिंचित और कम सिंचाई में खाद्य सुरक्षा संभव है। यह सतपुडा की जंगल पट्‌टी के गांवों को देखकर कहा जा सकता है। लेकिन अब मौसम परिवर्तन होने लगा है। अगर बारिश बिल्कुल न हो तो असिंचित खेती भी संकट में हो जाती है। इन समस्याओं पर विचार करना जरूरी है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुल मिलाकर, आज डापका के खेत की सैर, होरा खाने का आनंद हमारी स्मृतियों के पन्नों में सदैव रहेगा। लेकिन मौसम परिवर्तन की मार से यह कब तक बचे रहेंगे, यह देखने वाली बात है।&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6488502539236057488-2320511380433874690?l=hashiye-par.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hashiye-par.blogspot.com/feeds/2320511380433874690/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2010/03/blog-post_04.html#comment-form' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/2320511380433874690'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/2320511380433874690'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2010/03/blog-post_04.html' title='फसल उत्पादन ही नहीं, एक जीवन पद्धति है खेती'/><author><name>Baba Mayaram</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07974100393280656159</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TQ2zSrZyPhI/AAAAAAAAAKE/mmnqrZO0TCI/S220/baba_fb.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/S4_Lb-WLDOI/AAAAAAAAAGo/50IcrqnCuco/s72-c/March+161.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6488502539236057488.post-4070374047096743853</id><published>2010-02-13T08:32:00.002+05:30</published><updated>2010-02-13T08:44:14.476+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Hope'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Hashiye-Par'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='OrganicFarming'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Agriculture'/><title type='text'>सजीव खेती ही एकमात्र रास्ता है</title><content type='html'>&lt;a href="http://farm1.static.flickr.com/46/136310496_216ff74e2f.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 349px; FLOAT: left; HEIGHT: 229px; CURSOR: hand" border="0" alt="" src="http://farm1.static.flickr.com/46/136310496_216ff74e2f.jpg" /&gt;&lt;/a&gt; "मैंने पहले रासायनिक खेती की और बाद में सजीव खेती। वर्ष 1994 तक मै रासायनिक खेती करता रहा। जिसमें मेरी जमीन की उर्वरक शक्ति गई, भूजल स्तर नीचे गया, देसी बीज खत्म हुए, फसलचक्र बदला और मजदूरों का रोजगार खत्म हुआ। लेकिन जब मेरा इस विनाशक खेती से मोहभंग हुआ और सजीव खेती अपनानी शुरू की तो मेरा जीवन ही बदल गया। इससे धीरे-धीरे भूमि की उर्वरक शक्ति बढ़ी, भूजल स्तर उपर आया और देसी बीज बचे और मजदूरों को रोजगार भी मिला। यानी सजीव खेती सिर्फ फसल उत्पादन की नहीं, समस्त जीव-जगत के पालन का विचार है। यह एक जीवन पद्धति है।" यह कहना है यवतमाल (महाराष्ट्र) जिले के किसान सुभाष शर्मा का।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाल ही में इन्दौर में 7 से 9 फरवरी तक चले सजीव कृषि समाज मेला में बताया। इस मेले का उद्घाटन मध्यप्रदेश के कृषि मंत्री ने किया था। मेले में देश के कई कोनों से आए कृषि वैज्ञानिक, शोधकर्ता, किसान शामिल हुए। इस मेले का आयोजन भारतीय सजीव कृषि समाज (ओ.एफ.ए.आई.), किसान कल्याण एवं कृषि विकास विभाग, मध्यप्रदेश शासन, मध्यप्रदेश विज्ञान-प्रौद्योगिकी परिषद और शासकीय कृषि महाविद्यालय ने मिलकर किया था। इसमें कृषि विशेषज्ञों के अलावा सीधे खेती करने वाले किसानों ने भी अपने अपने अनुभव साझा किए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां महाराष्ट्र के यवतमाल के छोटी गूंजरी के सजीव खेती करने वाले किसान सुभाष शर्मा ने कहा कि रासायनिक खेती विनाश करने वाली है जबकि सजीव खेती से निर्माण होता है। उन्होंने कहा कि सजीव खेती अपनाने से जमीन की उर्वरा शक्ति बढ़ गई है। गाय के गोबर से जमीन में केंचुओं और जीवाणुओं की संख्या बढ़ी जिन्होंने खेत को उर्वर बनाया। हमने खेत में वनस्पति भी लगाईं जिसकी पत्तियां जैव खाद में बदलीं। पेड़ों में पक्षी आए जिन्होंने फसलों की इल्लियों को खाया। यानी कीट नियंत्रण किया। और उन्होंने जो विश्ष्टा किया उससे जमीन उर्वर हुई। इससे अगले साल फसल में ज्यादा फल्लियां लगी। ज्यादा उत्पादन हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी प्रकार जीवाणुओं के कारण बारिश का पानी खेत में रूकेगा और भूजल स्तर ऊपर आएगा। अगर हमारे पास खुद का बीज होगा तो उसे हम बारिश आने के पहले ही बो देते हैं। यह प्रयोग पिछले 10 साल में सिर्फ एक बार ही फेल हुआ जब बोनी खराब हुई, अन्यथा हर बार सफल रहा। अगर हम खेत में मल्ंिचग करते हैं तो तुअर में फल्लियां ज्यादा लगती हैं। उसकी पत्तियां जैव खाद बनाती हैं। जमीन क्रमशः सुधरती जाती है। इस प्रकार सजीव खेती से मुनाफा भी कमाया। और इसमें हमने मशीन से नहीं, मजदूरों से काम लिया। उनकी क्षमता और ईमानदारी पर भरोसा किया। परिणामस्वरूप मुनाफा क्रमशः बढ़ रहा है। मजदूरों को अब दीपावली पर बोनस भी दिया जाता है।&lt;br /&gt;यह कहानी सिर्फ सुभाष जी की नहीं है, सजीव खेती की ओर अब बहुतेरे किसानों का रूझान बढ़ रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारी खेती का जो नुकसान हजारों वर्षों में नहीं हुआ, उतना हमने पिछले 40 वर्षों में कर लिया। अब हालत यह है कि लागत बढ़ती जा रही है, उपज कम होती जा रही है। हर साल रासायनिक खाद की खपत बढ़ती जा रही है। प्यासे बीजों को पानी पिलाने के लिए बेहिसाब भूजल उलीचा जा रहा है। बिजली संकट बढ़ रहा है। यानी कुल मिलाकर खेती खत्म हो रही है। घाटा का धंधा बन गई है। और भोजन-पानी भी जहरीला हो गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इधर हरित क्रांति की असफलता के समाधान के रूप में जैव तकनीक को सामने लाया जा रहा है, जो हरित क्रांति से भी ज्यादा खतरनाक है। हाल ही बीटी बैंगन का मामला सामने आया है, जिसका काफी विरोध हो रहा है। हमारे यहां बैंगन की हजारों किस्में हैं, फिर जीन परिवर्तित बीटी बैंगन को क्यों लाया जा रहा है, जिसके सुरक्षित होने पर वैज्ञानिकों में मतैक्य है। हालांकि फिलहाल, बीटी बैंगन को व्यावसायिक अनुमति नहीं दी गई है, लेकिन भविश्य में इस पर रोक लगी रहेगी, इस पर अब भी रहस्य बना हुआ है। यह तकनीक मानव स्वास्थ्य और पर्यावरणीय दृष्टि से सुरक्षित नहंी है, यह सवाल उठाया जा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए हमें सजीव खेती की ओर बढ़ना चाहिए। मिट्टी -पानी के संरक्षण करना चाहिए। देसी बीज, हल-बक्खर और गोबर&lt;a href="http://greenearthconsulting.org/Padyatra/Pictures/108_0803_yavatmal_subhash_sharma_organic_farm.JPG"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 249px; FLOAT: right; HEIGHT: 221px; CURSOR: hand" border="0" alt="" src="http://greenearthconsulting.org/Padyatra/Pictures/108_0803_yavatmal_subhash_sharma_organic_farm.JPG" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;खाद की खेती की ओर बढ़ना चाहिए। कम पानी वाले देसी बीज और जमीन की उर्वरक शक्ति बढ़ाकर कम्पोस्ट खाद के प्रयोग, हरी खाद के माध्यम से किसान असिंचित खेती या सीमित सिंचाई के माध्यम से अच्छा उत्पादन कर सकते हैं। यह सभी दृष्टि से सुरक्षित भी है। पर्यावरणविद् व प्रख्यात लेखक क्लाड अल्वारिस का कहना है कि सभी परंपरागत कृषि पद्धतियों को किसानों ने ही विकसित किया है, वैज्ञानिकों ने नहीं। इसलिए परंपरागत कृषि ज्ञान, पद्धतियों व जैविक खेती की ओर बढ़ना जरूरी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस कार्यक्रम के संयोजक डा. भारतेन्दु प्रकाश का कहना है कि हमें कृश्षि को जैविक व प्राकृतिक स्वरूप की ओर परंपरागत ज्ञान तथा संसाधनों के संरक्षणात्मक शोध का आधार लेकर लौटाना होगा। किसानों को आत्मनिर्भरता, परस्पर सहयोग तथा शोषणकारी बाजार से मुक्ति के लिए गंभीरता से कार्य करना होगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6488502539236057488-4070374047096743853?l=hashiye-par.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hashiye-par.blogspot.com/feeds/4070374047096743853/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2010/02/blog-post_13.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/4070374047096743853'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/4070374047096743853'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2010/02/blog-post_13.html' title='सजीव खेती ही एकमात्र रास्ता है'/><author><name>Baba Mayaram</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07974100393280656159</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TQ2zSrZyPhI/AAAAAAAAAKE/mmnqrZO0TCI/S220/baba_fb.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://farm1.static.flickr.com/46/136310496_216ff74e2f_t.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6488502539236057488.post-5415803174419595625</id><published>2010-02-12T16:40:00.006+05:30</published><updated>2010-05-16T13:21:00.833+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Beej Bachao Andolan'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Agriculture'/><title type='text'>खेती की अनूठी परंपरागत पद्धति है बारहनाजा</title><content type='html'>&lt;table cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="float: left; margin-right: 1em; text-align: left;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;img alt="" border="0" src="http://farm4.static.flickr.com/3265/2878222656_ef2c3399da.jpg" style="height: 369px; margin: 0px auto 10px; width: 259px;" /&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;बारहनाजा&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;पिछले दिनों इंदौर के सजीव कृषि मेले में उत्तराखंड के देसी बीजों का स्टाल लगा हुआ है। इन बीजों को मैंने अपने हाथ में लेकर देखा तो देखते ही रह गया। देर तक रंग-बिरंगे बीजों के सौंदर्य को निहारते रहा। धान, राजमा, मंडुवा (कोदा), मारसा (रामदाना), झंगोरा, गेहूं, लोबिया, भट्ट, राजमा और दलहन-तिलहन की कई प्रजातियां छोटी पालीथीन में चमक रही थीं। इन्हें बरसों से बीज बचाओ आंदोलन से जुड़े विजय जडधारी लेकर आए थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चिपको आंदोलन से निकले विजय जड़धारी पिछले कई बरसों से बीज बचाओ आंदोलन से जुड़े हुए हैं। सत्तर के दषक में यहां पेड़ों को कटने से बचाने के लिए अनूठा चिपको आंदोलन हुआ था जिसमें ग्रामीणों ने पेड़ों से चिपककर उन्हें बचाने के लिए देश-दुनिया में मिसाल पेश की थी। इस आंदोलन में महिलाओं ने प्रमुख भूमिका निभाई थी। यह आंदोलन देश-दुनिया में प्रेरणा का स्त्रोत बना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विजय जड़धारी इसी आंदोलन से जुड़े हुए थे। चूंकि वे गांव में रहते हैं इसलिए उन्होंने बहुत जल्द ही रासायनिक खेती के खतरे को भांप लिया और खेती बचाने के लिए देसी बीजों की परंपरागत खेती को पुनर्जीवित किया। उन्होंने कहा कि रासायनिक खेती की शुरूआत में कृषि विभाग के लोग मुफ्त में बीज किट दिया करते थे। उसमें रासायनिक खाद भी होता था। उससे उपज तो बढी, लेकिन बढ़ने के बाद क्रमशः धीरे-धीरे कम होती गई। जब हमने देसी बीजों की तलाश की तो हमें नहीं मिले। लेकिन हमारी देसी बीजों की तलाश जारी रही। अंततः हमें ऐसे किसान मिले जो मिलवां या मिश्रित खेती करते थे। बारहनाजा यानी बारह तरह के अनाज एक साथ बोते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बारहनाजा में बारह अनाज ही हों, यह जरूरी नहीं। इसमें ज्यादा भी हो सकते हैं। दरअसल, बारहनाजा भोजन की सुरक्षा व पोषण के लिए तो उपयोगी है ही। साथ में खेती और पशुपालन के रिष्ते को भी मजबूत बनाता है। फसलों के अवषेष जो ठंडल, चारा व भूसा के रूप में बचते हैं, वे पशुओं के आहार बनते हैं। गाय-बैल के गोबर से ही भूमि की उर्वर शक्ति बढ़ती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां बारहनाजा में कौन-कौन से अनाज बोते हैं, यह जानना भी उचित होगा। कोदा (मंडुवा), मारसा (रामदाना), ओगल (कुट्टू, ), जोन्याला (ज्वार ), मक्का, राजमा, गहथ (कुलथ ), भटट, रैयास, उड़द, सुंटा, रगडवास, गुरूंया, तोर, मूंग, भंजगीर, तिल, जख्या, सण, काखड़ी आदि।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बारहनाजा का एक फसलचक्र है। यहां की लगभग 13 प्रतिशत भूमि सिंचित है और 87 प्रतिशत असिंचित। सिंचित भूमि में ज्यादा विविधता नहीं है। जबकि असिंचित भूमि में विविधतायुक्त बारहनाजा दलहन, तिलहन आदि की विविधतापूर्ण खेती होती है। इसमें मिट्टी बचाने का भी जतन होता है। इसलिए फसल कटाई के बाद वे खेत को पड़ती छोड़ देते हैं। जमीन को पुराने स्वरूप में लाने की कोशिश की जाती थी। अब तो एक वर्ष में तीन-तीन चार फसलें ली जा रही हैं। मिट्टी-पानी का बेहिसाब दोहन किया जा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;table cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="float: right; margin-left: 1em; text-align: right;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;img alt="" border="0" src="http://farm4.static.flickr.com/3065/2878221204_be286f3d1f.jpg" style="height: 338px; margin: 0px auto 10px; width: 238px;" /&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;विजय जडधारी&lt;/span&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;इसी प्रकार की मिश्रित फसलें मध्यप्रदेश के सूखा क्षेत्रों में प्रचलित हैं। हो्शंगाबाद की जंगल पट्टी में बिर्रा या उसका संशोधित&lt;span id="goog_472105612"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span id="goog_472105613"&gt;&lt;/span&gt; रूप उतेरा प्रचलित है। इसमें किसान मक्का, उड़द, अरहर, सोयाबीन, ज्वार आदि लगाते हैं। एक साथ फसल बोने की पद्धति को उतेरा कहा जाता है। खेती के इस संकट के दौर में सतपुड़ा जंगल के सूखे और असिंचित इलाके में खा़द्य सुरक्षा को बनाए रखने की उतेरा पद्धति प्रचलित है। इसे गजरा के नाम से भी जाना जाता है। इसमें चार-पांच फसलों को एक साथ बोया जाता है। इसका एक संशोधित रूप बिर्रा ( गेहू-चना दोनों मिलवां ) है जिसकी रोटी बुजुर्ग अब भी खाना पसंद करते है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उतेरा में एक साथ बोने वाले अनाज जैसे धान, ज्चार, कोदो, राहर और तिल्ली। उतेरा पद्धति के बारे में किसानों की सोच यह है कि अगर एक फसल मार खा जाती है तो उसकी पूर्ति दूसरी फसल से हो जाती है। जबकि नकदी फसल में कीट या रोग लगने से या प्राकृतिक आपदा आने से पूरी फसल नष्ट हो जाती है जिससे किसानों को भारी नुकसान होता है। उतेरा की खास बात यह भी है कि इसमें मिट्टी का उपजाऊपन खत्म नहीं होता। कई फसलें एक साथ बोने से पोषक तत्वों का चक्र बराबर बना रहता है। अनाज के साथ फलियोंवाली फसलें बोने से नत्रजन आधारित बाहरी निवेषों की जरूरत कम पड़ती है। फसलों के डंठल तथा पुआल उन मवेशियों को खिलाने के काम आते हैं जो जैव खाद पैदा करते है। इस प्रकार मनुष्यों को खेती से अनाज, पशुओं को भोजन और मिट्टी का उपजाऊपन भी उतेरा अक्षुण्ण है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यानी हमें टिकाऊ खेती की ओर बढ़ना होगा। पर्यावरण और मिट्टी-पानी का संरक्षण करना होगा। मेढबंदी व भू तथा जल संरक्षण के उपाय करने होंगे। हमारी खेती में मानव की भूख मिटाने के साथ पर्यावरण संरक्षण व समस्त जीव-जगत के पालन का विचार भी था। जो बेतहाशा रासायनिक खादों के साथ गुम होता जा रहा है। इसलिए हमें टिकाऊ खेती को अपनाने की जरूरत है। बीज बचाओ आंदोलन का यह प्रयास सराहनीय होने के साथ-साथ अनुकरणीय भी है।&lt;br /&gt;&lt;i&gt;(लेखक विकासात्मक मुद्दो पर लिखते है)&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;18 फरवरी,2010, &lt;i&gt;जनसत्ता&lt;/i&gt;   नयी  दिल्ली मै प्रकाशित.&lt;br /&gt;12 मई, 2010, &lt;i&gt;द पायोनिएर &lt;/i&gt;दिल्ली&amp;nbsp; में प्रकाशित.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6488502539236057488-5415803174419595625?l=hashiye-par.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hashiye-par.blogspot.com/feeds/5415803174419595625/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2010/02/blog-post.html#comment-form' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/5415803174419595625'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/5415803174419595625'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2010/02/blog-post.html' title='खेती की अनूठी परंपरागत पद्धति है बारहनाजा'/><author><name>Baba Mayaram</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07974100393280656159</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TQ2zSrZyPhI/AAAAAAAAAKE/mmnqrZO0TCI/S220/baba_fb.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://farm4.static.flickr.com/3265/2878222656_ef2c3399da_t.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6488502539236057488.post-1733382181088265641</id><published>2010-01-30T09:05:00.003+05:30</published><updated>2010-01-30T09:28:26.255+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Hashiye-Par'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='GM-Crop'/><title type='text'>जैव तकनीक से जुड़े हैं कई खतरे</title><content type='html'>&lt;img style="MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 354px; FLOAT: right; HEIGHT: 256px; CURSOR: hand" border="0" alt="" src="http://www.orissadiary.com/admin1/images/allnewsimage/15012.jpg" /&gt; इन दिनों बी.टी. बैंगन का मुद्दा चर्चा का विषय बना हुआ है। जन सुनवाईयां आयोजित की जा रही हैं। विरोध हो रहा है। अब इस विषय पर विचार करना जरूरी हो गया है कि मानव स्वास्थ्य से जुड़े गंभीर मसले पर विशेषज्ञ समितियां क्यों मंजूरी दे रही हैं। हालांकि अभी सरकार ने इसे पूरी तरह झंडी नहीं दी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बी.टी. बैगन पर चर्चा करने से पहले यह जानना उचित होगा कि आखिर जैव तकनीक है क्या? जेनेटिक इंजीनियरिंग या जैव तकनीक एक नई तकनीक है जिसके द्वारा एक प्रजाति के जीन को दूसरी प्रजाति मं प्रवेश कराना संभव होता हे। इससे एक प्रजाति के गुण दूसरी प्रजाति में आ जाते हैं। इसमें बेसिलस थुरूंजेनेसिस नामक बैक्टीरिया के क्राई 1 एसी (Cry1Ac) एक जीन को बैगन की कोशिका में प्रवेश कराया जाता है। यह जीन पौधे में, उसकी कोशिका में एक विशेष प्रकार का जहर पैदा करता है। इस जीन में कीट मारने की क्षमता होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मानव स्वास्थ्य से जुड़े इस मुद्दे पर जल्दबाजी में निर्णय लेना उचित नहीं है। कुछ वैज्ञानिकों ने इस पर आपत्ति जताई है। सुप्रीम कोर्ट ने वैज्ञानिक डा. पुष्प भार्गव को जेनेटिक इंजीनियरिंग एप्रूवल समिति (जीईएसी) के कार्य पर निगरानी रखने के लिए नियुक्त किया। डा. भार्गव ने इसे अनैतिक व गंभीर गलती बताया है। डा. भार्गव ने कहा है कि अब तक बीटी बैंगन के लिए जरूरी परीक्षण पूरे नहीं किए गए हैं। फिर इसे तत्काल मंजूरी देने का क्या औचित्य है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां बीटी कपास का उदाहरण देना उचित होगा। इसी तकनीक से तैयार बीटी कपास के चरने से पूर्व में आंध्रप्रदेश में भेड़, बकरी मरने की खबरें आई थीं। मध्यप्रदेश के मालवा-निमाड़ क्षेत्र में बीटी कपास चुनने वाले और जिनिंग मिलों में काम करने वाले मजदूरों को एलर्जी की शिकायत हुई है। कुछ समय पहले छत्तीसगढ़ में बीटी राइस के साथ बीटी बैंगन का मुद्दा का भी सामने आया था जिसका काफी विरोध हुआ था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अमरीका में बेयर नाम की कंपनी ने जीन परिवर्तित लिबर्टी लिंक राइस का परीक्षण किया। कुछ समय तक इसकी जानकारी दबी-छुपी रही। लेकिन जब उजागर हुई तो अमरीका के चावल निर्यात पर इसका असर पड़ा। यूरोपीय संघ ने अमरीकी चावल को आयात करने से इंकार कर दिया। अमरीका की धान की खेती जैव प्रदूषित हो गई। इसके चलते अमरीका को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। इसी प्रकार दुनिया के कई देशों ने अपने यहां जी एम फसलों पर रोक लगाई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक और उदाहरण लें तो लातिनी अमरीका के चार-पांच देशों ने आलू फसल की विविधता उत्पत्ति केन्द्र को जैव प्रदूषण से बचाने के लिए अपने यहां रोक लगाई। यहां आलू की कई किस्में हैं। ऐसे सुरक्षा उपाय इसलिए जरूरी है क्योंकि इससे खाद्य सुरक्षा व खेती की अर्थव्यवस्था खतरे में पड़ सकती है। मक्का के उत्पत्ति केन्द्र मेक्सिको के आदिवासी क्षेत्रों के जी. एम. मक्का से जैव प्रदूषण का मामला कई वर्षों से अन्तरराष्ट्रीय मुद्दा बना हुआ है। यह प्रदूषण अमरीकी कंपनियों द्वारा प्रचारित किए गए जी.एम. (जेनिटीकली मोडीफाइड) मक्का से ही हुआ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैव तकनीक आज देष और दुनिया में फ़लता-फ़ूलता व्यापार है। जैव तकनीक का आधार मुख्य रूप से जैव विविधता है। अगर जलवायु की दृष्टि से देखें तो यह विविधता गर्म जलवायु वाले देशों में पाई जाती है। और आर्थिक दृष्टि से देखें तो गरीब देषों में जैव विविधता का भंडार है। एक अनुमान के अनुसार हमारे यहां बैंगन की सैकड़ों किस्में हैं फिर यह नई किस्म क्यों? अगर हमारी जैव विविधता प्रदूषित हो गई तो इन्हीं कंपनियों का बीजों के व्यवसाय पर एकाधिकार हो जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ वर्षों पहले टर्मिनेटर टेक्नोलाॅजी का अमरीका में पेटेंट हो चुका है जिसके जरिए ऐसे बीज तैयार किए जा सकते हैं जो अगले साल उग ही न सकें। यानी पौधा-बीज-पौधा का चक्र ही खत्म हो जाए। हर साल किसान बड़ी-बड़ी कंपनियों पर निर्भर हो जाए, ऐसी कोशिशे की जा रही हैं। ऐसी स्थिति में बहुराश्टीय कंपनियों का खाद्य उत्पादन व वितरण में एकतरफा नियंत्रण हो जाएगा और ये कंपनियां बीज व रसायन का मनमाना दाम वसूल सकेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आजकल कई वैज्ञानिक जैव तकनीक के विभिन्न रूपों को तैयार करने में जुटे हैं। इसके माध्यम से विभिन्न जीवों में आनुवांशिक गुण या एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचने वाले गुण जीन के रूप में प्रकट होते हैं व जेनेटिक इंजीनियरिंग के जरिए एक जीव के कुछ विशेष जीनों को दूसरे जीव में पहुंचाया जा सकता है। इस तरह जीवन का एक नया रूप ही तैयार किया जा सकता है। अब तो पशु के किसी जीन को पौधे में, मनुष्य के किसी जीन को पशु में प्रवे्श करवाने के प्रयास हो रहे हैं। इससे जैव तकनीक पर कई सवाल खड़े किए जा रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके अलावा, जैव तकनीक से कई और खतरे जुड़े हुए हैं। यदि नए जीवाणुओं को वातावरण में छोड़ने से पहले उनेक संभावित-दुष्परिणामों की ओर ध्यान नहीं दिया गया तो इससे विनाश भी हो सकता है। जैव तकनीक से प्राप्त खाद्य पदार्थों को उपलब्ध कराने से पहले यह देखा जा रहा है कि इनके खाने से लोगों के स्वास्थ्य पर कोई विपरीत प्रभाव तो नहीं पड़ेगा? विदेशों में जीएम खाद्य पदार्थो पर लेबल लगाने की मुहिम चलाई जा रही है जिससे पता चल सके कि यह जीएम खाद्य है या नहीं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके अलावा, जैव तकनीक के तार उदारीकरण और भूमंडलीकरण से भी जुड़े हुए हैं। इसलिए यह मुद्दा और भी गंभीर है। विश्व व्यापार संगठन बनने से पहले भारत में बीज व्यवसाय में विदेशी कंपनियों को आने की इजाजत नहीं थी। बीजों के आदान-प्रदान किसानों के हाथ में था लेकिन अब स्थिति बदल गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बैंगन गरीबों की सब्जी है। आम तौर पर इसकी खेती गरीब ही करते हैं और खाते भी वे ही हैं। इसकी खेती बरसों से होती रही है। मध्यप्रदेश के कहार और बरौआ जाति के लोग इसकी खेती करते आ रहे हैं। वे नदियों के कछार व रेत में इसकी खेती करते हैं। लेकिन अगर बीटी बैंगन को हरी झंडी मिल गई तो उनकी थाली से बैंगन की सब्जी भी छिन जाएगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;(लेखक विकासात्मक मुद्दो पर लिखते है)&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6488502539236057488-1733382181088265641?l=hashiye-par.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hashiye-par.blogspot.com/feeds/1733382181088265641/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2010/01/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/1733382181088265641'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/1733382181088265641'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='जैव तकनीक से जुड़े हैं कई खतरे'/><author><name>Baba Mayaram</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07974100393280656159</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TQ2zSrZyPhI/AAAAAAAAAKE/mmnqrZO0TCI/S220/baba_fb.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6488502539236057488.post-3467828391693248706</id><published>2009-12-30T15:44:00.007+05:30</published><updated>2010-04-25T07:51:49.848+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Narsinghpur'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Hashiye-Par'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Diary'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Narmada'/><title type='text'>बरमान में सतधारा की निराली छटा</title><content type='html'>&lt;a href="http://farm3.static.flickr.com/2794/4437232836_8e09ac49a6.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 384px; FLOAT: left; HEIGHT: 252px; CURSOR: hand" border="0" alt="" src="http://farm3.static.flickr.com/2794/4437232836_8e09ac49a6.jpg" /&gt;&lt;/a&gt; भेड़ाघाट से लौटते हुए दूसरे दिन बरमान गए। रात्रि विश्राम नरसिंहपुर में किया। मध्यप्रदेश में करेली- सागर रोड़ पर स्थित है बरमान। यहां से भी नर्मदा होकर गुजरती है। अमरकंटक में विन्ध्यांचल और सतपुड़ा के मिलन बिन्दु से प्रारंभ होकर नर्मदा गुजरात में खम्बात की खाड़ी में मिलती है। इस बीच वह मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात राज्यों से होकर गुजरती है। यह मध्यप्रदेश की सबसे बड़ी नदी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;हम नर्मदा पुल पर उतरे और पैदल तट तक पहुंचे। यहां नर्मदा का तट बहुत ही संकरा है। पुल से ऊपर सतधारा है लेकिन ज्यादातर लोग पुल के नीचे ही स्नान करते हैं, ऊपर तक नहीं जाते। यहां विशालकाय चट्टानें हैं, उनके बीच से नर्मदा अपने ही निराले अंदाज में वेग से बह रही है। उफनती हुई स्वच्छ निर्मल धारा को देखते आंखें नहीं थकतीं। दिन भर बैठे देखते रहो। नयनाभिराम दृश्य। बहुत ही मनमोहक।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;नरसिंहपुर से बहन भी साथ आई है। वह साथ में बाटी-भर्ता बनाने की सामग्री भी लाई है। आटा, बैंगन, लहसुन, टमाटर आदि। घुटनों तक पानी में डुबकी लगाकर हम तट पर पहुंच गए। इधर बहन ने गोबर के उपलों की अंगीठी सुलगा दी थी। वह आटा गूंथ रही थी। बेटा और पत्नी आलू और बैगन भून रहे थे। कुछ ही देर में बाटी और भर्ता तैयार। हमने भरपेट भोजन किया। नर्मदा तट पर पानी पिया। बहुत मीठा और साफ व स्वच्छ। आत्मा तृप्त हो गई। &lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/SzsxxfJV-4I/AAAAAAAAAGg/_bxHD-YCyGk/s1600-h/SAN_BAR_NAR.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;नर्मदा न केवल उसके किनारे रहने वाले लोगों को बल्कि पशु-पक्षियों, वन्य प्राणियों, पेड़-पौधों और जंगलों को भी पालती-पोसती रही है। वह जीवनदायिनी है। नर्मदा जल की बात ही निराली है। यह जल सबको तारने और सबके दुखों को हरने वाला है। इसे लोग अपने घरों में बरसों सहेजकर रखते हैं। बहन ने भी यह जल बोतल में भरा और नर्मदा को नमन किया।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;बरमान में मकर संक्राति पर बड़ा मेला लगता है जिसकी तैयारी रेतघाट में शुरू हो चुकी हैं। इस मेले में दूर-दूर से बड़ी संख्या में लोग आते हैं। गांव से बैलगाड़ियों में भर कर लोग आते हैं। वे अपने बैलों को नहला-&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/SzsxxfJV-4I/AAAAAAAAAGg/_bxHD-YCyGk/s1600-h/SAN_BAR_NAR.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 365px; FLOAT: right; HEIGHT: 201px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5420981302714563458" border="0" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/SzsxxfJV-4I/AAAAAAAAAGg/_bxHD-YCyGk/s400/SAN_BAR_NAR.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;धुलाकर व सजा-धजा कर लाते हैं। और नर्मदा तट पर बाटी-भर्ता बनाकर खाते हैं।मेले में सर्कस भी आता है। ऐसे मेले ग्राम्य जीवन में उमंग व उत्साह का संचार कर देते हैं। इनका खासतौर से बच्चों और महिलाओं को बेसब्री से इंतजार रहता है, जिन्हें बाहर निकलने का मौका कम मिलता है।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;नर्मदा में चल रही छोटी नाव हमारा ध्यान बरबस ही अपनी ओर खींच रही थी। हालांकि मछुआरा समुदाय की हालत बहुत अच्छी नहीं मानी जा सकती। जबलपुर के पास नर्मदा पर बरगी बांध देश के बड़े बांधों में एक था। यह वर्ष 1990 के आसपास पूरा हुआ। मुझे पिछले वर्ष मछुआरा समुदाय जो केंवट, बरौआ, कहार में विभक्त है, के साथ बातचीत करने का मौका मिला। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;उनके अनुसार जबसे यह बांध बना है तबसे उनकी रोजी-रोटी छिन गई। नर्मदा के किनारे पर उनकी बड़ी आबादी है। जबलपुर से लेकर गुजरात तक ये नर्मदा नदी में मछली पकड़ने का काम करते थे और उसके तटों पर फैली रेत पर डंगरवारी (तरबूज-खरबूज की खेती) करते थे। बरगी बांध बनने से उनके दोनों धंधे प्रभावित हुए। बरगी बांध से समय-बेसमय पानी छोड़े जाने के कारण वे आज न तो डंगरवारी कर पा रहे हैं और न ही अब नर्मदा में मछली ही बची है।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;नर्मदा में लोग श्रद्धा से पैसे भी चढ़ाते हैं जिन्हें इसी मछुआरे समुदाय के बच्चे पानी में तैर कर पैसे उठा लेते हैं। इन बच्चों की पानी में गोता लगाने की गजब की क्षमता है। वे पानी के अंदर 5-10 मिनट तक सांस रोके रख सकते हैं। यह भी एक योग व प्राणायाम की तरह है, जिसे बिना अभ्यास के बड़े भी नहीं कर सकते। वर्श के अंत में और नए साल की शुरूआत में नर्मदा के साथ हमारा यह साक्षात्कार यादगार व मजेदार रहा। घर लौटते समय सोच रहा था कि युगों से प्रवाहमान नर्मदा जैसी नदियों को हम क्या बचा पाएंगे? नर्मदा की कई सहायक नदियां या तो सूख चुकी है या फिर बरसाती नाला बनकर रह गई है।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6488502539236057488-3467828391693248706?l=hashiye-par.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hashiye-par.blogspot.com/feeds/3467828391693248706/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2009/12/blog-post_30.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/3467828391693248706'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/3467828391693248706'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2009/12/blog-post_30.html' title='बरमान में सतधारा की निराली छटा'/><author><name>Baba Mayaram</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07974100393280656159</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TQ2zSrZyPhI/AAAAAAAAAKE/mmnqrZO0TCI/S220/baba_fb.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://farm3.static.flickr.com/2794/4437232836_8e09ac49a6_t.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6488502539236057488.post-1637578103794250323</id><published>2009-12-29T16:19:00.006+05:30</published><updated>2009-12-29T17:16:21.884+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Hashiye-Par'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Satpura'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Narmada'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='River'/><title type='text'>भेड़ाघाट में नर्मदा का सौंदर्य देखने उमड़ती है भीड़</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/SznrbraRuYI/AAAAAAAAAGY/9k9cV0LWAt8/s1600-h/Dhuadhaar3.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 400px; FLOAT: right; HEIGHT: 175px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5420622487259036034" border="0" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/SznrbraRuYI/AAAAAAAAAGY/9k9cV0LWAt8/s400/Dhuadhaar3.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;पिछले दो वर्षो में दो बार भेड़ाघाट जाना हुआ। मध्यप्रदेश के जबलपुर से नजदीक है भेड़ाघाट। वैसे तो हम बचपन से ही यहां के बारे में पढ़ते-सुनते आ रहे हैं लेकिन प्रत्यक्ष रूप से इसे देखने का संयोग हाल ही बना। यहां की मार्बल राक्स और धुआंधार दोनों ही बहुत प्रसिद्ध है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;हम 26 तारीख(दिसम्बर 2009 को पिपरिया से सवारी ट्रेन में सुबह सवार हुए। यह ट्रेन बरसों पुरानी है। इसी ट्रेन से लोग गंगाजी(इलाहाबाद) जाया करते हैं। इस ट्रेन के बारे में एक धारणा यह है कि यह प्राय: ’लेट’ ही चलती है। बात सच हुई। पिपरिया से ही एक्सप्रेस ट्रेनों से ’पिटती’ गई तो एकाध स्टेशन को छोड़कर प्राय: हरेक स्टेशन पर पिटी। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;मैं अपने परिवार के साथ जा रहा था। साथ में पत्नी और बेटा भी है। इस ट्रेन में जगह अमूमन मिल ही जाती है क्योंकि छोटे-छोटे ’स्टाप’ पर लोग चढ़ते-उतरते रहते हैं। वे आपस में अपने सुख-दुख की बातें करते हैं। इस बीच चना मसाला, अमरूद, मूंगफली बेचने वाले भी आते-जाते हैं। कुछ अप्रिय दृशय भी देखने मिलते हैं जब कोई छोटा बच्चा अपनी शर्ट उतारकर उससे बोगी का फर्श साफ कर हाथ फैलाता है। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;सुबह की हमारी ट्रेन शाम को भेड़ाघाट पहुंची। स्टेशन से कुछ दूर पैदल चल हम आटो-टेम्पो में सवार हो धुआंधार पहुंचे। एकाध किलोमीटर सीढ़ियों से नीचे उतरते हुए हमें बहुत से लोग मिले। दोनों ओर पूजा-सामग्री और मार्बल राक्स की मूर्तियों की दूकानें लगी थीं। शंख-शीप, कंठी-माला, नारियल आदि की दुकानें सजी थीं। हनुमान जी की मूर्ति के सामने एक सूरदास बहुत ही मधुर आवाज में तंबूरे की तान के साथ नर्मदा का बखान कर रहे थे। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;अब हम धुआंधार के सामने खड़े हैं। सामने यानी रेलिंग पर। नर्मदा यहां कोई 10-12 फीट नीचे खड्ड में गिरती है और फुहारों के साथ ऊपर उछलती है, मचलती है। गेंद की तरह टप्पा खाकर फब्वारों साथ ऊपर कूदती है । यहां नर्मदा का मनोरम सौंदर्य अपने चरम पर होता है। घंटों निहारते रहो, फिर भी मन न भरे। जल प्रपात का ऐसा नजारा शायद ही कहीं और देखने को मिले। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;धुआंधार के सामने दोनों ओर कतारबद्ध संगमरमर की चटानें हैं, जो नर्मदा का रास्ता रोकती हैं। इन मार्बल राक्स की बनावट ऐसी है कि लगता है इन्हें किसी धारदार छेनी से तराशा गया हो। चट्टानों की बीच नर्मदा सिकुड़ती जाती है पर वह अपने वेग में बलखाती, इठलाती और अठखेलियां करती आगे बढ़ती जाती है। मानो कह रही हो "मुझे कोई नहीं रोक सकता।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;यहां ’रोपवे’ भी हैं लेकिन मेरे बेटे ने इस पर यह कहकर जाने से मना कर दिया कि यह विकलांगों के लिए है। हम तो पैदल चलकर ही जाएंगे। यानी यह जेब ढीली करने का ही साधन है।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;संझा आरती का समय है। भक्तजन नर्मदा मैया की आरती कर रहे हैं। दीया जलाकर लोग आरती कर रहे हैं और कुछ लोग नर्मदा में दीप प्रवाह कर रहे हैं। कर्तल ध्वनि के साथ आरती में बहुत से लोग शामिल हो गए हैं। आरती के पशचात प्रसाद वितरण हो रहा है।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;कुछ परिक्रमावासी ’हर-हर नर्बदे’ का जयकारा कर रहे हैं। पहले लोग नर्मदा के एक छोर से दूसरे छोर तक और वापस उसी स्थान तक पैदल ही परिक्रमा करते थे। अब भी कुछ लोग करते हैं। लेकिन अब बस या ट्रेन से भी परिक्रमा करने लगे हैं।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;जीवनदायिनी नर्मदा की महिमा युगों-युगों से लोग गाते आ रहे हैं। लेकिन अब नर्मदा संकट में है। बरसों से नर्मदा बचाओ की लड़ाई लड़ी जा रही है। इस पर बड़े-बड़े बांध बनाए जा रहे हैं। मैं वापस लौटते समय सोच रहा था कि क्या इस जीवनदायिनी मनोरम &lt;span style="font-size:+0;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/Sznqs19JGLI/AAAAAAAAAGQ/AawiUfM2lFs/s1600-h/Dhuadhaar4.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 390px; FLOAT: left; HEIGHT: 200px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5420621682635774130" border="0" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/Sznqs19JGLI/AAAAAAAAAGQ/AawiUfM2lFs/s400/Dhuadhaar4.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;सौंदर्य&lt;/span&gt; की नदी को बचाया नहीं जा सकता? &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6488502539236057488-1637578103794250323?l=hashiye-par.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hashiye-par.blogspot.com/feeds/1637578103794250323/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2009/12/blog-post_29.html#comment-form' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/1637578103794250323'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/1637578103794250323'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2009/12/blog-post_29.html' title='भेड़ाघाट में नर्मदा का सौंदर्य देखने उमड़ती है भीड़'/><author><name>Baba Mayaram</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07974100393280656159</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TQ2zSrZyPhI/AAAAAAAAAKE/mmnqrZO0TCI/S220/baba_fb.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/SznrbraRuYI/AAAAAAAAAGY/9k9cV0LWAt8/s72-c/Dhuadhaar3.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6488502539236057488.post-6509715121845104109</id><published>2009-12-16T20:03:00.002+05:30</published><updated>2009-12-19T18:01:52.628+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Hope'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Health'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Ganiyari'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='JSS'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Chhattishgarh'/><title type='text'>स्वास्थ्य के क्षेत्र में जंगल में जल रही है नई लालटेन</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/SyjgRZBtIjI/AAAAAAAAAFg/ya8VqNDpBwE/s1600-h/Rural+women+image2.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 293px; FLOAT: left; HEIGHT: 216px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5415825141293457970" border="0" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/SyjgRZBtIjI/AAAAAAAAAFg/ya8VqNDpBwE/s400/Rural+women+image2.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;डगनिया की बिरसाबाई और मिनका बाई एक कपडे की गुड़िया और गुड्डे को गोद में लिए बैठी हैं। गोबर से लिपे-पुते एक दहलाननुमा बडे कमरे में करीब 40 महिलाएं उन्हें देख रही हैं।&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/SyjfmkvfRNI/AAAAAAAAAFY/NQfOkZmM938/s1600-h/Rural+women+image5.jpg"&gt;&lt;/a&gt; वे आपस में बातें भी कर रही हैं। अपने-अपने अनुभव साझा कर रही हैं। यहां कोई गुडडे-गुड़िया का खेल नहीं हो रहा है और ना ही कठपुतली का कोई नाच। दरअसल, ये महिलाएं जचकी कैसे करवाई जाए और जचकी करवाने में क्या-क्या दिक्कतें आ सकती हैं, इस पर बात कर रही हैं। ये सभी महिलाएं छत्तीसगढ़ के बिलासपुर के अचानक अभयारण्य के दूरदराज के गांव बम्हनी में एक स्वास्थ्य प्रशिक्षण शिविर में शामिल थीं, जहां अब तक पहुंचने के लिए कोई सड़क मार्ग नहीं है। जब सड़क नहीं है तो आने-जाने के लिए कोई सुविधा हो, यह सवाल व्यर्थ है। जबकि अच्छे स्वास्थ्य के लिए अच्छी यातायात व्यवस्था जरूरी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;छत्तीसगढ़ के बिलासपुर के कोटा-लोरमी विकासखंड में पिछले एक साल से गांवों में दाई का काम करने वाली महिलाओं का प्रशिक्षण का काम किया जा रहा है। जन स्वास्थ्य सहयोग ने इस काम की जिम्मेदारी ली है। दो वर्ष पूर्व "( 24 अक्टूबर, 2007 ) करीब 40 महिलाओं का अचानक अभयारण्य के अंदर के गांव बम्हनी में दो दिवसीय प्रशिक्षण किया गया। इस प्रशिक्षण में भाग लेने वाली लगभग पूरी महिलाएं अनपढ़ थीं लेकिन अनुभवहीन नहीं। उन्हें इस काम में बरसों का अनुभव था जिससे आगे वे यहां सीखने आई थीं। जन स्वास्थ्य के सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र से जुडीं डा. रमनी उन्हें प्रशिक्षण दे रही थीं। जन स्वास्थ्य केन्द्र बिलासपुर जिले में एक सरकारी संस्था है जो स्वास्थ्य के क्षेत्र में अनूठा कार्य कर रही है। वह कम कीमत में बेहतर इलाज के साथ दूरस्थ गांवों में भी अपनी सेवाएं दे रही है।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;उनके अनुसार आजकल अस्पताल में ही जचकी करवाने पर जोर दिया जा रहा है लेकिन दूरदराज के गांवों के लोग अस्पताल तक कैसे पहुंचे? यहां पहुंचने तक सड़क नहीं है और ना ही कोई वाहन। फिर अगर किसी भी तरह कोई वाहन कर भी लिया जाए तो बारिश के दिनों में बाढ समस्या है और सामान्य दिनों में भी गर्भवती महिलाओं के लिए जचकी और हैजा जैसी गंभीर स्थिति में अस्पताल तक पहुंचने तक भी अनहोनी की आशंका बनी रहती है। यानी यहां के लोगों को न अस्पताल की सुविधा है और ना ही नर्स उपलब्ध है। इसलिए हमने परंपरागत दाईयों का प्रशिक्षण की व्यवस्था की है जिससे गर्भवती महिला और उसके नवजात शिशु को बचाया जा सके। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;डा. रमनी का कहना है कि हमारे यहां मातृत्व मृत्यु दर ज्यादा है। (आंकडों के हिसाब से प्रसव के दौरान महिलाओं की मृत्यु दर वर्ष 2001- 03 में मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ मिलाकर प्रति एक लाख बच्चों के जन्म पर 379 थी, जबकि राष्ट्रीय औसत 301 था।) गर्भवती महिलाओं की मौत कई कारणों से हो सकती है। प्राय: प्रसव के दौरान अधिक रक्तस्त्राव, संक्रमण और ब्लड प्रेशर आदि से मौतें होती हैं। उन्होंने कहा कि अगर प्रसव के समय मां मर जाती है तो उसका बच्चा भी कुछ समय बाद मर जाता है। यानी इन दोनों को कैसे बचाया जाए, यह चुनौती है। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;उन्होंने कहा कि हालांकि अनपढ़ होने के कारण महिलाओं को सीखने में कुछ समय लगता है लेकिन वे सीखकर उसका इस्तेमाल कर रही है, यह उम्मीद बंधाता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि अतरिया की महिला सरपंच गर्भवती थी और उन्हें प्रसव पूर्व बहुत रक्तस्त्राव हो रहा था जब इसकी खबर गांव की दाई सूनी बाई को लगी तो उन्होंने प्रशिक्षण में सीखी तकनीक अपनाकर उनका &lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/SyjkvF9DVhI/AAAAAAAAAFw/pEtGjDrp3aM/s1600-h/Rural+women+image4.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 302px; FLOAT: right; HEIGHT: 199px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5415830049616254482" border="0" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/SyjkvF9DVhI/AAAAAAAAAFw/pEtGjDrp3aM/s400/Rural+women+image4.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;रक्तस्त्राव को रोका और उन्हें गनियारी अस्पताल भेजकर उनका इलाज करवाया जिससे जच्चा-बच्चा दोनों की जान बच सकी। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;इसी प्रकार दाईयों को बुखार नापना, खून की कमी की पहचान, पेशाब में संक्रमण और गर्भावस्था के समय होनेवाली समस्याओं से अवगत कराया जाता है। चूंकि बुखार नापने के लिए थर्मामीटर पढने में दिक्कत होती है इसलिए इसके लिए एक विशेष प्रकार का थर्मामीटर बनवाया गया है जिसमें पढ़ने की जरूरत नहीं रहती। इस थर्मामीटर में लाल-हरे रंगों को देखकर बुखार नापा जा सकता है। इसी प्रकार प्रसव के समय समयावधि का पता लगाने के लिए दाईयों को घड़ी देखना सिखाया जा रहा है। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;स्वास्थ्य कार्यकर्ता मंजू ने कहा कि दाईयां महिलाओं के प्रसव के समय सभी काम करती हैं। पहले नाल काटने का काम सुईन करती थी अगर वह किसी काम से गांव से बाहर चली गई तो बच्चे बिना नाल कटे हुए हफते भर तक पडे रहते थे जिससे संक्रमण का खतरा बना रहता था। फिर उन्हें जो अनाज और पैसे आदि देना पडता था, वह भी बच जाता है। उन्होंने कहा कि हमारी दाईयां दिन हो या रात, बारिश हो या बाढ, सदैव काम करती हैं। अब गांवों में इस पर विचार किया जा रहा है कि जिस प्रकार बाल काटने के लिए नाई का और गाय चराने के लिए राउत का अनाज तय होता है उसी प्रकार दाई के लिए भी गांव वालों की ओर से व्यवस्था होना चाहिए।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;यह प्रशिक्षण शिविर शहरों में होने वाली कार्यशालाओं से अलग था। यहां कोई भाषण देने या ज्ञान के आदान-प्रदान की जल्दबाजी नहीं है। यहां प्रशिक्षक एक बात को बार-बार समझाने के लिए तत्पर हैं। ये न सिर्फ़ अपनी पढाई को दाईयों को देने के लिए उतावले हैं बल्कि उनसे भी कई बातें सीखने के लिए लालायित हैं। ये महिलाएं प्रसव के दौरान होनेवाली दिक्कतों का अभिनय भी करके बता रही थी जिससे माहौल &lt;span style="font-size:0;"&gt;म&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/SyjiLtoybcI/AAAAAAAAAFo/-eq_HMcldm8/s1600-h/Rural+women+image3.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 300px; FLOAT: right; HEIGHT: 277px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5415827242770132418" border="0" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/SyjiLtoybcI/AAAAAAAAAFo/-eq_HMcldm8/s400/Rural+women+image3.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;नोरंजक&lt;/span&gt; हो जाता था। बुजुर्ग महिलाएं जब गर्भवती महिला के बच्चे की धडकन सुन रही थी तब उनके चेहरे पर बाल सुलभ मुस्कान तैर रही थी। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;बम्हनी की फगनी बाई, बाबूटोला की मयाजो, जगती बाई, जकडबांधा की मिलाजू, ठुमरी और गुलिया बाई ने प्रशिक्षण के बारे में कहा कि उन्हें दस्ताने मिल गए। चशमा मिल गया। अंधेरे के लिए टार्च की व्यवस्था की जा रही है। गर्भवती महिलाओं की हर माह जांच की जाती है। उनके नवजात शिशुओं के लिए नए कपडे दिए जाते हैं। फिर बम्हनी में क्लिनिक है, गंभीर स्थिति के लिए गनियारी में अस्पताल है। यह सब हमारे लिए बहुत सुभीता हो गया है। कुल मिलाकर, जन स्वास्थ्य की पहल अंधेरे में आशा की नई किरण की तरह है&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6488502539236057488-6509715121845104109?l=hashiye-par.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hashiye-par.blogspot.com/feeds/6509715121845104109/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2009/12/blog-post_16.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/6509715121845104109'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/6509715121845104109'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2009/12/blog-post_16.html' title='स्वास्थ्य के क्षेत्र में जंगल में जल रही है नई लालटेन'/><author><name>Baba Mayaram</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07974100393280656159</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TQ2zSrZyPhI/AAAAAAAAAKE/mmnqrZO0TCI/S220/baba_fb.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/SyjgRZBtIjI/AAAAAAAAAFg/ya8VqNDpBwE/s72-c/Rural+women+image2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6488502539236057488.post-5129421857419040727</id><published>2009-12-15T16:42:00.002+05:30</published><updated>2009-12-23T14:53:50.345+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Village'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Tribal'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Chhattishgarh'/><title type='text'>क्यों याद आते हैं आदिवासी गांव?</title><content type='html'>कुछ समय पहले मेरा छत्तीसगढ़ जाना हुआ। जशपुर नगर के एक गांव में चराईखेरा में हम गए थे। विकासखंड कुनकुरी से गांव की दूरी लगभग 13-14 किलोमीटर है। यहां से आने-जाने के लिए दिन में एक-दो बसें ही चलती हैं। सड़कें कच्ची हैं अगर आपने रूमाल या कपड़े से &lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/SydyC2MdiuI/AAAAAAAAAEw/PxCh7091Y-A/s1600-h/CHRKHDA_FINAL1.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 480px; FLOAT: left; HEIGHT: 255px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5415422470169397986" border="0" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/SydyC2MdiuI/AAAAAAAAAEw/PxCh7091Y-A/s400/CHRKHDA_FINAL1.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;सिर नहीं ढका तो आपकी रंगत बदल जाएगी और आपको पहचानना मुशिकल हो जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जिस घर में हम रूके थे, वह कच्चा था लेकिन सीमेंट व कांक्रीट के पक्के घरों से अपेक्षाकृत ठंडा था। वहां हर चीज सुघड़ता से रखी हुई थी। गोबर व काली मिट्टी से लिपा-पुता यह घर अपना सौंदर्य बिखेर रहा था। ऊंची दीवारों वाले खपरैल से ढके इस हवादार घर के आगे-पीछे काफी खुली जगह थी। बच्चों के खेलने-कूदने और उठने-बैठने के हिसाब से पर्याप्त जगह थी, ऐसी सुविधा शहरी घरों में नहीं मिलती। अंग्रेजी के यू आकार के बने इस घर के पीछे बाड़ी थी। यहां के लगभग हर घर में बाड़ी है, जहां से हरी सब्जियां लगाई जाती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सब्जियों में पानी देने के लिए कुआं होता है, जिसमें बांस की लकड़ी के एक सिरे पर बाल्टी बंधी रहती है और दूसरे सिरे पर पत्थर। बिल्कुल रेलवे गेट की तरह। इस लकड़ी के एक सिरे को पकड़कर ऊपर-नीचे करने से पानी खींचा जा सकता है। इसे स्थानीय भाषा में टेढा कहा जाता है। छत्तीसगढ़ के कई इलाकों में इसी टेढ़ा पद्धति से सिंचाई की जाती है। यहां बाड़ियों में लगे हरे-भरे कटहल के पेड़ों को फलों से लदा देखकर कोई भी मोहित हो सकता है। इस गांव में आम का बगीचा था, जहां बच्चों की टोलियां मंडराती रहती थी, गुलेल से निशाना साधकर, आम गिराना, इनके बाएं हाथ का खेल है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके अलावा, चार ( चिरौंजी ) के जंगल में जाकर पेड़ों से पके चार को खाने का एक अलग ही मजा है। बरगद के फल, इमली, आंवला, इमली की पत्ती तोड़-तोड़कर बच्चे खाते रहते हैं। दस-बारह साल की अरसन हमारे साथ जंगल गई और बिना रूके चार के पेड़ पर सहज ही चढ़ गई। अरमिता जो हमें जंगल दिखाने ले गई थी, वह खुद बहुत पतली शाखाओं वाले पेड़ पर चढ़ी और जामुन जैसे पके चार गिराए, जिसे हमने बड़े मजे से खाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गांव के छोटे बच्चे जंगल के पेड़ों के नाम, जंगली जानवरों व फल-फूलों के नाम और पहाड़ों के बारे में ढेरों बाते जानते हैं, जिसे सुनकर सुखद आशचर्य होता है। ऐसी याददाशत शायद ही हमारे शहरी पढ़ाकू अंग्रेजदा बच्चों की हो। इसी प्रकार यहां के बुजुर्गों से बात कर जंगलों में मौजूद सैकड़ों जड़ी-बूटियों के बारे में जाना जा सकता है। भूख के दिनों में काम आने-वाले कंद-मूल, फल-फूलों के बारे में वे सहज ही बता देते हैं, जो यहां के जंगल और पहाड़ में मौजूद हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां उरांव आदिवासी हैं, इनमें से ज्यादातर बहुत पहले ईसाई बन गए थे। मजबूत काले और गठीले देह के इन लोगों का जीवन बड़ा कठिन लगता है। महिलाएं पुरुषों से अधिक काम करती हैं। लेकिन महिलाओं पर उतनी पाबंदी नहीं है, जितनी अन्य जगहों में होती है। यहां की लड़कियां साइकिल चलाती है, जो उनकी आजादी की प्रतीक बन गई है। वे साइकिल पर सवार होकर स्कूल जाती हैं। चर्च जाती हैं और हाट-बाजार जाती हैं। वे गांव से दूसरे गांव अकेले ही साइकिल से जा सकती हैं, उन्हें किसी पुरुष की मदद की जरूरत नहीं। इस गांव में तो बिजली है लेकिन पड़ोसी गांव कोनकेल आज तक बिजली नहीं है। वे अब भी चिमनी युग में जी रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां का जीवन कठिन व सुविधाविहीन है। अलसुबह 4 बजे लोग जाते हैं। हमारी तरह 8 बजे तक सोना इनकी आदत में नहीं। सबसे पहले मुंह हाथ धोकर उनकी दिनचर्या शुरू हो जाती है। महिलाएं साफ-सफाई का काम करती हैं। पानी भरती हैं, यह टेढा काम है। हैंडपंप नजदीक नहीं होने के कारण दूर-दूर से सिर पर पानी भरे बर्तन ढोना पड़ता है। झाडू लगाना भी बड़ी मशक्कत का काम है। यहां शहरों की तरह एक-दो चिकने कमरों की सफाई नहीं करनी पड़ती बल्कि अपने घरों की सफाई के साथ ढोरों व सुअरों को बांधने की लंबी-चौड़ी जगह को साफ करना पड़ता है। वहां के कचरे को उठाकर बाहर &lt;span style="font-size:0;"&gt;फेंकना&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/Syd0gJ7XRQI/AAAAAAAAAE4/uFpx0k_FifQ/s1600-h/CHRKHDA_FINAL2.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 496px; FLOAT: right; HEIGHT: 247px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5415425172705854722" border="0" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/Syd0gJ7XRQI/AAAAAAAAAE4/uFpx0k_FifQ/s400/CHRKHDA_FINAL2.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt; पड़ता है। महिलाओं की तरह भी पुरुष भी हाड़तोड़ मेहनत करते हैं। खेत-खलिहान से लेकर जंगल से वनोपज संग्रह के काम में लगातार करते रहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां दूर-दूर मकानों में रहने वाले लोगों में एक-दूसरे के साथ बहुत नजदीक रिशता है। सामूहिकता है, आपसी भाईचारा, आत्मीय रिशता और पारंपरिक मेल-जोल है। उन्हें उनकी संस्कृति आपस में सब को जोड़े हुए हैं। जोड़ने वाली संस्कृति के कई उदाहरण देखे जा सकते हैं। कोनकेल की अंजिता, रजनी, इस्दौर रेमा, असमिता, विनीता आदि कई स्कूली लड़के-लड़कियां अपने गांव के बुजुर्ग सुलेमान एक्का नामक किसान के खेत में गोबर खाद डालने का काम कर रहे हैं। यह गर्मी की छुटि्टयों की बात है। हालांकि उन्हें बदले में कुछ पैसा भी मिलेगा लेकिन इससे भी अधिक अपने गांव के बुजुर्ग किसान की मदद है। ऐसे गांवों को देखकर खु्शी से दिल उछल जाता है।&lt;br /&gt;&lt;span&gt;(यह लेख 22 दिसंबर 2009 को &lt;em&gt;छत्तीसगढ़&lt;/em&gt;, रायपुर मै प्रकाशित हो   चुका है)&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6488502539236057488-5129421857419040727?l=hashiye-par.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hashiye-par.blogspot.com/feeds/5129421857419040727/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2009/12/blog-post_15.html#comment-form' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/5129421857419040727'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/5129421857419040727'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2009/12/blog-post_15.html' title='क्यों याद आते हैं आदिवासी गांव?'/><author><name>Baba Mayaram</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07974100393280656159</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TQ2zSrZyPhI/AAAAAAAAAKE/mmnqrZO0TCI/S220/baba_fb.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/SydyC2MdiuI/AAAAAAAAAEw/PxCh7091Y-A/s72-c/CHRKHDA_FINAL1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6488502539236057488.post-3229694375794085815</id><published>2009-12-12T17:37:00.000+05:30</published><updated>2009-12-12T18:46:06.742+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Satpura'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Hoshangabad'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Culture'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Madhai'/><title type='text'>सतपुड़ा का मढ़ई-मेला</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/SyOTqVMc2SI/AAAAAAAAAEo/T5JrTyaslLA/s1600-h/Picture+116.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 300px; FLOAT: left; HEIGHT: 400px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5414333532482623778" border="0" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/SyOTqVMc2SI/AAAAAAAAAEo/T5JrTyaslLA/s400/Picture+116.jpg" /&gt;&lt;/a&gt; मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में पिपरिया और पचमढ़ी के बीच में स्थित है मटकुली। आज(19 अक्टूबर ) वहां की मढई है। मैं अपने बेटे के साथ मढ़ई-मेला देखने जा रहा हूं। हम सतपुड़ा के जंगल के बीच से गुजर रहे हैं। थोडी देर पहले हमें मोर का एक सुंदर जोड़ा दिखा। मटकुली पहुंचने से पहले ही हमें सजे-धजे स्त्री-पुरुष और बच्चे मिले, जो अपने गांवों से मढ़ई के लिए मीलों पैदल चलकर आ रहे थे। अब हम मटकुली में पहुंच गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;यहां सड़क से लगे एक मैदान में मढ़ई-मेला लगा हुआ है। दूर से ही हमें सबसे पहली झलक ढालों की दिखी। यहां गांगो की मड़िया (मंडप) थी, जहां पड़िहार (पूजा करने वाले )मौजूद थे।गांगो की मूर्ति विराजमान थी। यह मड़िया इमली की टहनियों व पत्तों से बनी थी। ढाल लंबे बांस के एक सिरे पर मोर पंख से छतरीनुमा बनाई जाती है। ये ढालें करीब 15-20 फीट लंबी होती हैं। इन्हें लेकर लोग नाचते-गाते मंढई में आते हैं। अहीर नृत्य इसका मुख्य आकर्षण का केन्द्र होता है। इसमें विशेष वेश-भूषा में ढाल के साथ अहीर नाचते हुए चलते हैं। बाद में ढालें लेकर वे गांगो की मूर्ति के आसपास चक्कर लगाते हैं। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;मढ़ई में ढालों के आने का सिलसिला जारी है। मेले में काफी भीड़ जुट रही है। दूरदराज के गांव के लोग बैलगाडियों से भी आए हैं, जिनकी बैलगाड़ी विशाल पीपल पेड़ नीचे खड़ी हैं। बैल काफी सजे-धजे हैं। उन पर रंग-बिरंगे मुहरनुमा छापे दिखाई दे रहे थे।&lt;/div&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/SyOPHvzRSaI/AAAAAAAAAEY/0RTF5EvRoMc/s1600-h/Picture+060.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 345px; FLOAT: right; HEIGHT: 252px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5414328540282833314" border="0" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/SyOPHvzRSaI/AAAAAAAAAEY/0RTF5EvRoMc/s400/Picture+060.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;जैसे-जैसे शाम ढल रही थी मेले की रौनक बढ़ती जा रही थी। तेज रोशनी वाले बल्बों की रोशनी चमक रही थी। आदिवासी युवक-युवतियां व बच्चों की टोलियां इधर-उधर घूम रही थीं। यहां मिठाईयों की दूकान थी। मिट्टी के सुंदर खिलौने थे जिनमें तोता, गाय-बैल आदि शामिल थे। गुब्बारे व खिलौने बिक रहे थे। उमंग और उत्साह का माहौल था। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कार्तिक अमावस्या यानी दीपावली के अगले दिन से ही मढ़ई-मेला का सिलसिला शुरू हो जाता है पूर्णिमा तक चलता है। मुख्य रूप से गोंड आदिवासी इसे बड़े धूमधाम से मनाते हैं। गजेटियर के अनुसार गांगो तेलिन की याद में यह त्यौहार मनाया जाता है। वह एक बड़ी जादूगरनी थी। यहां गांगों की पूजा करने वाले बिसराम का कहना है कि ढाल देवी का प्रतीक है। यहां हम गांगो की पूजा करते हैं।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;हमारे ज्यादातर तीज-त्यौहार कृषि से जुड़े हुए हैं। मढ़ई का भी इससे जुड़ाव है। जब धान की नई फसल आ जाती है और उनके घरों में अनाज आ जाता है तब वे खुशियां मनाते हैं। यह समृद्धि और खुशहाली का मौका होता है। दीपावली खुशियां बांटने का त्यौहार है। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;इस मौके पर घर की लिपाई-पुताई और उसमें रंग-रोगन किया जाता है। शाम को गाय-बैल की पूजा की जाती है। उनकी सार (उन्हें बांधने का स्थान ) में दीये जलाए जाते हैं। और दूसरे दिन उन्हें रंग दिया जाता है।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मेले में अब सभी ढालें आ चुकी हैं और पड़िहार आपस में बातें कर रहे हैं। दूकानों पर काफी भीड़ है। लोग मिठाईयां खरीद रहे हैं। सिंघाड़ा और पींड (कंद-मूल) खरीद रहे हैं। इधर-उधर जाते समय धक्का-मुक्की हो रही है। अब घर जाने का समय हो गया है। पर हमारा लौटने का मन नहीं कर रहा है। कई साल बाहर रहने के बाद अपने इलाके की मढ़ई में जाना और देखना बहुत ही मजेदार था। &lt;/div&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/SyORPjvmC9I/AAAAAAAAAEg/A71gu76U5-c/s1600-h/Picture+169.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 493px; FLOAT: left; HEIGHT: 330px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5414330873508400082" border="0" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/SyORPjvmC9I/AAAAAAAAAEg/A71gu76U5-c/s400/Picture+169.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6488502539236057488-3229694375794085815?l=hashiye-par.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hashiye-par.blogspot.com/feeds/3229694375794085815/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2009/12/blog-post.html#comment-form' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/3229694375794085815'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/3229694375794085815'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2009/12/blog-post.html' title='सतपुड़ा का मढ़ई-मेला'/><author><name>Baba Mayaram</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07974100393280656159</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TQ2zSrZyPhI/AAAAAAAAAKE/mmnqrZO0TCI/S220/baba_fb.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/SyOTqVMc2SI/AAAAAAAAAEo/T5JrTyaslLA/s72-c/Picture+116.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6488502539236057488.post-4942559062148086110</id><published>2009-11-28T18:26:00.000+05:30</published><updated>2009-11-29T17:06:37.350+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Hope'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='kerala'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='SarangSchool'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Education'/><title type='text'>स्कूल बिना पढ़ाई :  शिक्षक दंपति की मेहनत रंग लाई</title><content type='html'>केरल में एक शिक्षक दंपति ऐसे हैं, जिन्होंने अपने बच्चों को कभी स्कूल नहीं भेजा। बल्कि खुद ही बच्चों की शिक्षा-दीक्षा की। आज उनके बच्चे पढ़ाई में किसी से पीछे नहीं हैं। बरसों पहले उन्होंने खुद सरकारी स्कूल से त्यागपत्र देकर खुद ही अपने बच्चों की पढ़ाई की जिम्मेदारी ली। पर घिसे-पिटे सरकारी स्कूलों की तरह नहीं बल्कि अपने नए और अनूठे तरीके से। आज उनके बच्चे किसी से कम नहीं हैं। बल्कि शिक्षा के अलावा और भी क्षेत्रों में उनकी प्रतिभा निखर रही है। उनका यह अनूठा आश्रमनुमा स्कूल पालक्कड़ जिले के चित्तूर में है। इस आवासीय स्कूल में 10 बच्चे पढ़ते हैं। स्कूल का नाम सारंग है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;इस स्कूल में बच्चे परीक्षा के लिए नहीं पढ़ते और न ही उन्हें पाठ्यक्रम पूरा करने का दबाव है। वे यहां हर तरह के दबाव से मुक्त हैं, आजाद हैं। वे सीखने के लिए पढ़ते हैं। मजे के लिए पढ़ते हैं। वे रोज अखबार पढ़ते हैं, उस पर चर्चा करते हैं। खेल-खेल में शिक्षा की शिक्षण पद्धति की बातें बहुत होती हैं, लेकिन केरल में इसे अमल में लाया जा रहा है। इस शिक्षक दंपति के बड़े बेटे गौतम को चार भाषाओं के जानकार हैं। वे &lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/SxEhCPNhwgI/AAAAAAAAAD8/88_vNz9HHOY/s1600/gauthamAnu.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 318px; FLOAT: right; HEIGHT: 219px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5409140949775401474" border="0" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/SxEhCPNhwgI/AAAAAAAAAD8/88_vNz9HHOY/s400/gauthamAnu.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;वेब डिजाइनिंग से लेकर खेती-किसानी के कई काम करते हैं। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;गौतम की तरह ही उनकी दोनों बहनें कन्नकी(14) और उन्नीआर्चा(12) भी इसी पद्धति से पढ़ाई कर रही हैं। कन्नकी की मूर्तिकला में रुचि है। जबकि उन्नीआर्चा वायलिन और मृदंग में अपनी प्रतिभा निखार रही हैं। दोनों मर्शल आर्ट, भोजन पकाना और कम्प्यूटर सीख रही हैं। उनके साथ और भी बच्चे सारंग स्कूल में पढ़ते हैं।कुछ समय पहले गौतम सारंग से हुई बातचीत के कुछ अंश यहां प्रस्तुत हैं:-&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;0 आपके मां-बाप दोनों शिक्षक थे और आपको कभी स्कूल नहीं भेजा?&lt;br /&gt;00 मेरे मां-बाप की सोच थी कि स्कूल में सिर्फ़ जानकारी मिलती है और उसका इस्तेमाल कैसे और किस उद्देशय के लिए करना है, इसे नहीं सिखाया जाता है। यह विवेक से आता है, समझ से आता है, संस्कृति से आता है। मौजूदा शिक्षा व्यवस्था की समस्या है कि वह हमें यह नहीं सिखा पा रही है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;0 जब आप एक दिन भी स्कूल नहीं गए तब आपने कैसे सीखा?&lt;br /&gt;00 सभी बच्चों में सीखने की प्रक्रिया चलती रहती है उन्हें सिखाने की जरूरत नहीं है। उनमें कौशल रहता है लेकिन उसकी हमेशा उपेक्षा होती है। आप जानते हैं कि सीखने के लिए उचित वातावरण की जरूरत होती है। स्कूल में यह वातावरण नहीं मिलता।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;0 आपको घर पर क्या यह वातावरण मिला?&lt;br /&gt;00 मेरे मां-बाप दोनों शिक्षक थे। वे सदैव लिखते-पढ़ते रहते थे। घर में अखबार आता था। जब मां-पिताजी पढ़ते थे तो मैं भी उन्हें देखा करता था। मेरे माताजी-पिताजी कुछ लिखते थे तो एक-दूसरे को पढ़कर सुनाते थे। जैसे वे अपने किसी मित्र को पत्र लिखते थे तो पढ़ते थे। वह मैं भी सुनता था। यह बच्चों की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है कि जैसा बड़े करते हैं उसी प्रकार से बच्चे करते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;यानी मुझे लिखने-पढ़ने का वातावरण घर पर ही मिल रहा था। अक्षर, शब्द और उच्चारण का शुरू से ही परिचय मिल रहा था। मैं हमेशा अक्षरों के बीच में था। इस तरह मैंने 4 साल की उम्र में मलयालम सीखना शुरू कर दिया था। लेकिन मेरी बहन 12 साल की हो गई। उसकी पढ़ने में ज्यादा रूचि नहीं है, उसे दूसरी चीजों में है। यानी हर बच्चा अलग है। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;0 आपकी विषय की समझ कैसे बनी?&lt;br /&gt;00 मेरी शिक्षा अलग-अलग टुकड़ों में नहीं हुई। मैं हर कहीं, हर समय सीखता रहता था। जो भी हम देखते हैं, सुनते हैं, वह नई चीज होती है। जो महसूस करते हैं, उसे देखते हैं, सूंघते हैं, उसकी खुशबू लेते हैं, उससे नया अनुभव होता है। उससे हमारे मन में नए-नए सवाल उठते रहते हैं। बच्चों में जन्मजात खोजी प्रवृत्ति होती है।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वे हमेशा सवाल करते हैं। वे जानकारी के लिए हमेशा भूखे रहते है। एक उदाहरण से अपनी बात समझाता हूं। जैसे मैं अपनी बाइक में पेट्रोल भरवाने के लिए पेट्रोल पंप गया। वहां मैंने अलग-अलग जगह पर पेट्रोल और डीजल लिखा देखा। इससे हम अक्षर ज्ञान भी कर सकते हैं। पेटोल के बारे में और जानना चाहेंगे तो रसायन की बात हो जाएगी। और अगर हम पेट्रोल के पैसे देंगे तो गणित का ज्ञान हो सकता है। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/SxEijxhRQvI/AAAAAAAAAEE/9M_5Y-EBv0w/s1600/Picture+062.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 361px; FLOAT: left; HEIGHT: 247px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5409142625432322802" border="0" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/SxEijxhRQvI/AAAAAAAAAEE/9M_5Y-EBv0w/s400/Picture+062.jpg" /&gt;&lt;/a&gt; 0 आपने कितनी भाषाएं सीखी और कैसे?&lt;br /&gt;00 मैंने मलयालम, इरूला (आदिवासी भाषा), अंग्रेजी, तमिल और हिंदी आदि भाषाएं सीखी हैं। मेरा सीखने का तरीका है पहले सुनना, फिर बोलना, फिर पढ़ना, फिर लिखना और अंत में व्याकरण सीखना। यह हो सकता है हम सीखने में कई बार गलतियां करते हैं, लेकिन मैं इन्हें सुधारने के लिए हमेशा तैयार रहता हूं। अगर हम शुरू से ही यही सोचेंगे कि मुझसे व्याकरण की गलतियां हो जाएंगी तो सीखने की प्रक्रिया आगे कैसे बढ़ेगी?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;0 तमिल कैसे सीखी?&lt;br /&gt;00 तमिलनाडु हमारा पड़ोसी राज्य है। मुझे फोटोग्राफी का शौक है। मैं वहां कैमरे से खीची गई फोटो धुलवाने जाया करता था। तमिल भाषा से मुझे प्यार हो गया। मैं उसे सीखने की कोशिश करने लगा। कुछ समय में लिखना-पढ़ना तो सीख गया पर अर्थ नहीं समझ पाता था। जब थोड़ा बड़ा हुआ तो पूरा सीखने के लिए मैंने फिर कोशिश की। रेडियो सुनता था, तमिल फिल्म देखता था। इस तरह तमिल सीख गया। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;0 और आपने क्या-क्या सीखा?&lt;br /&gt;00 बहुत लंबी सूची हो सकती है। जैसे इलेक्ट्रानिक्स, वेब डिजाइनिंग, फोटोग्राफी, सिनेमेटोग्राफी, भारत नाट्यम, कर्नाटक संगीत, टाइपिंग, कपड़ा बुनना, केरल मार्शल आर्ट, कुकिंग और जैविक खेती, पशुपालन आदि। बैंगलौर की एक विज्ञापन एजेंसी के साथ एक विज्ञापन बनाने में मदद की। सहायक कैमरामेन का काम किया। इसके अलावा, मलयालम की दो-तीन फिल्मों में सहायक सिनेमेटोग्राफी का काम किया।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;हमारे घर में छोटा पुस्तकालय है। उसमें तरह-तरह की किताबें हैं। मेरे मां-पिताजी और अब मेरे भी अलग-अलग क्षेत्र में काम करने वाले मित्र हैं। कई बार मैं उनके साथ उनके काम में सहयोग करते-करते सीखा। यात्राएं करता हूं। जो काम सीखना है उससे जुड़ता हूं। मैं हमेशा सीखता रहता हूं। इस तरह हमारे आसपास ही ज्ञान का भंडार है। अब इंटरनेट से भी हम सीख सकते हैं।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;0 यानी आपने काम के साथ सीखा है?&lt;br /&gt;00 जी हां! सीखने की प्रक्रिया यहीं है। आप पुस्तकों से सीखें या सीधे फील्ड में जाकर या लोगों से बातकर, यही प्रक्रिया सीखने की है। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6488502539236057488-4942559062148086110?l=hashiye-par.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hashiye-par.blogspot.com/feeds/4942559062148086110/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2009/11/blog-post_28.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/4942559062148086110'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/4942559062148086110'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2009/11/blog-post_28.html' title='स्कूल बिना पढ़ाई :  शिक्षक दंपति की मेहनत रंग लाई'/><author><name>Baba Mayaram</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07974100393280656159</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TQ2zSrZyPhI/AAAAAAAAAKE/mmnqrZO0TCI/S220/baba_fb.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/SxEhCPNhwgI/AAAAAAAAAD8/88_vNz9HHOY/s72-c/gauthamAnu.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6488502539236057488.post-7742990766368259891</id><published>2009-11-21T21:42:00.000+05:30</published><updated>2009-11-21T22:05:34.187+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Hope'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Health'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Ganiyari'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='JSS'/><title type='text'>कम कीमत में बेहतर इलाज की मिसाल है जन स्वास्थ्य सहयोग</title><content type='html'>अंग्रेजी के टी आकार के बरामदा में लोगों की भीड़ जमा है। सुबह के आठ बजे हैं। इन लोगों मे कई पिछली रात ही यहां पहुंच गए थे। जंगल के दूरदराज के गांवों के ये लोग यहां इलाज कराने के लिए आए हैं। डाक्टर को दिखाने के लिए यहां लाइन में लगना पड़ता है। नंबर लगाने के लिए बरामदे की पट्टी पर अपना गमछा या रस्सी बांध देते हैं। सबको डाक्टर का इंतजार है। यह आम दृ’य है छत्तीसगढ़। के बिलासपुर जिले के एक छोटे से कस्बे गनियारी का। गनियारी बिलासपुर से दक्षणि में 20 किलोमीटर दूर स्थित है।&lt;br /&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 355px; FLOAT: left; HEIGHT: 273px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5406593715634247426" border="0" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/SwgUVsk9FwI/AAAAAAAAADs/WL5nHBiRxY4/s400/P1050116.JPG" /&gt;&lt;br /&gt;अब डाक्टरों की गाड़ी आ गई है और बिना देर किए प्रारंभ हो जाता है मरीजों को देखने का सिलसिला। यहां सबसे पहले मरीजों की बात सुनी जाती है फिर जांच की जाती है और बाद में उपचार। डाक्टर पूछते हैं- क्या बीमारी है? जबाव आता है- खांसी। कब से है- बहुत दिनों से । क्या इलाज कराया- दुकान से दवा लेकर खाता रहा। बाद में मुझे डाक्टर ने बताया इस मरीज को टी। बी. है। इसे लापरवाही कहना भी जल्दबाजी होगी क्योंकि इसकी वजहें हैं। लोगों की अपनी कई समस्याएं हैं। वे गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई, कुपोषण जैसी कई समस्याओं से चौतरफा घिरे हुए हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस गैर सरकारी जन स्वास्थ्य सहयोग केन्द्र की स्थापना 1999 में हुई। देश की मौजूदा स्वास्थ्य सेवाओं की हालत से चिंतित दिल्ली के कुछ डाक्टरों ने इसकी शुरूआत की। इससे पहले उन्होंने देश भर में घूमकर ग्रामीण क्षेत्रों का दौरा किया जहां वे अपनी सेवाएं दे सके। और अंतत: देश के गरीब इलाकों मे एक छत्तीसगढ के एक छोटे कस्बे में उन्होंने काम प्रारंभ किया। देश के सबसे चोटी के अस्पताल आल इंडिया इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल साइंस (एम्स) से निकले युवा डाक्टरों ने यहां गरीबों के लिए स्वास्थ्य का अनूठा अस्पताल बनाया है। उनका यह काम पिछले करीब 10 सालों से चल रहा है। अपने पेशे में गहरी नि&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/SwgVXYgmLwI/AAAAAAAAAD0/dJtaOLp8Grc/s1600/IMG0107A.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 240px; FLOAT: right; HEIGHT: 320px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5406594844118626050" border="0" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/SwgVXYgmLwI/AAAAAAAAAD0/dJtaOLp8Grc/s400/IMG0107A.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;ष्ठा वाले यह चिकित्सक स्वास्थ्य के क्षेत्र में कई नए प्रयोग कर रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;कम कीमत में बेहतर इलाज किया जाता है। इस केन्द्र का उद्देशय है कि ग्रामीण समुदाय को सशक्त कर बीमारियों की रोकथाम और इलाज करना। साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों की स्वास्थ्य समस्याओं का अध्ययन करना, उनकी पहचान करना और कम कीमत में उचित इलाज करना। इस केन्द्र की उपयोगिया का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 2000 में बिना किसी उद्घाटन के ओ।पी.डी. शुरू हुई और मात्र 3 महीने के अंदर ही यहां प्रतिदिन आने वाले मरीजों की संख्या 250 तक पहुंच गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गनियारी में जन स्वास्थ्य का प्रमुख केंद्र स्थित है। यहां 15 बिस्तर का अस्पताल है। आपरेशन थियेटर है जो सप्ताह में तीन दिन चलता है। यहां 12 पूर्णकालिक डाक्टर हैं। यहां के जांच कक्ष में सभी तरह की जांच की जाती है। 80 प्रिशक्षति कर्मचारियों का स्टाफ है। दूरदराज के और गंभीर मरीजों के लिए एम्बुलेंस की सुविधा उपलब्ध है। यहां करीब 11 सौ गांवों के लोग इलाज कराने आते हैं। इसके अतिरिक्त यहां स्वयंसेवी संस्थाओं और संगठनों से जुड़े इच्छुक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को भी प्रिशक्षति किया जाता है।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;सामुदायिक कार्यक्रम के प्रमुख डा। योगेश जैन कहते हैं कि हमारे काम की सीमा है, सरकार ही इस काम को बेहतर ढंग से कर सकती है। लोगों को पीने का साफ पानी भी उपलब्ध नहीं है। बहरहाल, यह कहा जा सकता है कि यह प्रयोग अंधेरे में उम्मीद बंधाता है जो सराहनीय होने के साथ-साथ अनुकरणीय भी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;यह रपट दो वर्ष पहले बनाई गयी थी पर आज भी गनियारी में जन स्वास्थ्य सहयोग केन्द्र संचालित किया जा रहा है। रपट के कुछ अंश प्रस्तुत हैं।&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6488502539236057488-7742990766368259891?l=hashiye-par.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hashiye-par.blogspot.com/feeds/7742990766368259891/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2009/11/blog-post.html#comment-form' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/7742990766368259891'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/7742990766368259891'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2009/11/blog-post.html' title='कम कीमत में बेहतर इलाज की मिसाल है जन स्वास्थ्य सहयोग'/><author><name>Baba Mayaram</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07974100393280656159</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TQ2zSrZyPhI/AAAAAAAAAKE/mmnqrZO0TCI/S220/baba_fb.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/SwgUVsk9FwI/AAAAAAAAADs/WL5nHBiRxY4/s72-c/P1050116.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6488502539236057488.post-4804577658886170267</id><published>2009-10-11T17:46:00.000+05:30</published><updated>2009-10-11T18:45:03.177+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Raikheda'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Ajandhana'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='irrigation'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='water'/><title type='text'>पहाड़ खोदकर खेतों को पानी पिलाया</title><content type='html'>आमतौर पर बिना बिजली, बिना डीजल ईजन या पशुधन की ऊर्जा के बगैर खेतों की सिंचाई करना मुश्किल है लेकिन सतपुड़ा के घने जंगलों में स्थित दो गांव के लोगों ने यह कर दिखाया है। अपनी कड़ी मेहनत, कौशल और सूझबूझ से वे पहाड़-जंगल के नदी- नालों से अपने खेतों तक पानी लाने में कामयाब हुए और अनाज पैदा करने लगे। जंगल पर आधारित जीवन से खेती की ओर मुडे आदिवासी भरपेट भोजन करने लगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 302px; FLOAT: right; HEIGHT: 214px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5391321688404166258" border="0" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/StHSgtswhnI/AAAAAAAAAC8/mLJ3ZDaMsRo/s320/Picture+066.jpg" /&gt;होशंगाबाद जिले के पिपरिया विकासखंड में सतपुड़ा के घने जंगलों के बीच बसे वनग्राम राईखेड़ा में प्यासे खेतों को पानी पिलाने की पहल करीब 20 पहले शुरू हुई, जब गांव के 16 लोगों ने गांजाकुंवर नामक नदी से पानी लाने का बीड़ा उठाया। यह काम आसान नहीं था। खेतों से नदी की दूरी लगभग 5 किलोमीटर दूर थी, जिसके बीच में नाली निर्माण का श्रमसाध्य कार्य करना आवशयक था।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;लेकिन इन संकल्पवान लोगों की माली हालत भी अच्छी नही थी। वे खुद मजदूरी कर गुजारा करते थे। उनका इस सामुदायिक स्वैच्छिक काम मे ज्यादा समय लगने से उनके सामने रोजी-रोटी का संकट पैदा हो रहा था क्योंकि इससे उन्हें आर्थिक मदद तो नही ही मिलती थी, उल्टे अपने संसाधन इसमें लगाना पड़ रहा था। इसके लिए कुछ कर्ज भी लिया गया। शुरुआत मे लोगो ने इस सार्थक पहल का मजाक उठाया। कुछ ने कहा कि यह ऊंट के पीछे नशेनी (सीढी) लगाने का काम है, जो असंभव है। यानी पहाड़ से खेतों तक पानी लाना टेढी खीर है। फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और यह काम जारी रखा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;इस जनोपयोगी पहल से सकि्रय रूप से जुड़े लालजी कहते हैं कि हमने इस काम की प्रेरणा गांव के ही एक बुजुर्ग से ली थी जो एक अन्य कुंभाझिरी नदी से अपने खेत तक पानी लाया था। यह बात करीब 40-45 साल पुरानी है। फिर हम 16 लोगों ने इस काम को करने की ठानी जिसे हमने एक साल में पूरा कर लिया। जिन लोगों को शुरू मे हम पर इस काम को करने का विशवास नहीं हो रहा था, बाद में वे भी हमारे साथ हो गए।&lt;br /&gt;इस इलाके की भौगोलिक बनावट ने इसमें मदद की। एक तो पहाड़ी ढलान होने के कारण गांजाकुंवर नदी में थोड़ा ऊपर जाने पर ऐसी जगह मिल गई, जो गांव के खेतों से ऊंची थी। वहां पत्थर का छोटा सा बांध बनाने पर पानी को नालियों में मोड़कर गुरूत्वाकषण बल से ही खेतों में पहुंचाया जा सकता था। दूसरा, इस नदी में साल में आठ-नौ महीने पानी बहता रहता था। जंगलों के बीच होने के कारण पानी की धारा चलती रहती थी।&lt;br /&gt;जंगल और पहाड़ के बीच स्थित गांजाकुंवर नदी से पानी लाने के लिए खेतों तक नाली बनाने का बड़ा और कठिन काम शुरू किया गया। ऊंची-नीची पथरीली जमीन में नाली निर्माण होने लगा। कहीं पर कई फुट गहरी खुदाई की गई तो कहीं पर बड़ी-बड़ी चट्टानों और पत्थरों को फोड़ा गया। कहीं पर पेडों के खोल से छोटा पुल बनाया गया तो कहीं नाली पर भूसे और मिट्टी का लेप चढ़ाया गया। पत्थरों की पिचिंग की गई,जिससे पानी का रिसाव न हो। और इस प्रकार, अंतत: ग्रामवासियों को 5 किलोमीटर दूर से अपने खेतों तक पानी लाने में सफलता मिली। इस काम में महिलाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/StHWXwL1dFI/AAAAAAAAADM/pC317hZaplY/s1600-h/Picture+074.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 232px; FLOAT: left; HEIGHT: 206px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5391325932499072082" border="0" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/StHWXwL1dFI/AAAAAAAAADM/pC317hZaplY/s320/Picture+074.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहाड़ से उतरे सरपट पानी से सूखे खेत तर हो गए। गेहूं और चने की हरी-भरी फसलें लहलहा उठीं। भुखमरी और कंगाली के दौर से गुजर रहे कोरकू आदिवासियों के भूखे पेट भर गये। लोगों के हाथ में पैसा आ गया। वे धन-धान्य से परिपूर्ण हो गए।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;यहां सभी ग्रामवासियों को नि:शुल्क पानी उपलब्ध है। पानी के वितरण में प्राय: किसी प्रकार के झगड़े नहीं होते हैं। अगर कोई छोटा-मोटा विवाद होता भी है तो उसे शंतिपूर्ण ढंग से सुलझा लिया जाता है। इस संबंध में लालजी का कहना है कि यहां सबके खेतों को पानी मिलेगा, यह तय है। यह हो सकता है कि किसी को पहले मिले और किसी को बाद में, पर मिलेगा सबको। फिर विवाद बेमतलब है। इसके अलावा, नाली मरम्मत का कार्य भी मिल-जुलकर किया जाता है। आज गांव में दो नालियां गांजाकुंवर नदी से और तीन नालियां कुंभाझिरी नदी से आती हैं। कुल मिलाकर, पूरे गांव के खेतों में सिंचाई की व्यवस्था हो गई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;राईखेड़ा की तरह वनग्राम आंजनढाना में भी इसी तरह की सामूहिक सिंचाई की व्यवस्था है। बल्कि आंजनढाना में यह व्यवस्था राईखेड़ा से पहले की है। राईखेड़ा और आंजनढाना के बीच में भी कुछ मील का फासला है। गांववासियों का कहना है कि यहां के पल्टू दादा ने बहुत समय पहले इसकी शुरूआत की थी। वे ढोर चराने का काम करते थे। और जब वे सतधारा नाले में ढोरों को पानी पिलाने ले जाते थे तब वे वहीं पड़े-पड़े घंटों सोचा करते थे कि काश! मेरे खेत में इस नाले का पानी पहुंच जाता, तो मेरे परिवार के दिन फिर जाते।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके लिए उन्होंने सतत् प्रयास किए। शुरुआत मे नदी पर दो बांध बांधने की कोशिश की पर वे कामयाब नहीं हुए। वे अपने काम में जुटे रहे और अंतत: उन्होने अपने बाडे में पानी लाकर ही दम लिया। शुरूआत में उन्होंने सब्जियां लगाईं- प्याज, भटा, टमाटर, आलू और मूली वगैरह। फिर गेहू बोने लगे। पल्टू दादा के बेटे बदन सिंह ने बताया कि आज हम उनकी वजह से भूखे नही है। गांव भी समृद्ध है। पहले हम सिर्फ़ बारिश में कोदो, मक्का बोते थे। अब गेहूं- चना की फसल ले रहे हैं। गांव के लोगो को भी पानी मिल रहा है।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बहुमूल्य व सार्थक पहल में राईखेड़ा, आंजनढाना के बाद कोसमढोड़ा, तेंदूखेड़ा और नयाखेड़ा जैसे कुछेक गांव के नाम और जुड़ गए हैं। इस तरह प्यासे खेतों में पानी देकर अन्न उपजाने की यह पहल क्षेत्र में फैलती जा रही है। हालांकि आंजनढाना में पक्की नाली का निर्माण वनविभाग के मारफत करवाया गया है लेकिन राईखेड़ा में यह काम अब तक नहीं हो पाया है। गांववालों का कहना है इसके लिए स्वीकृति मिल चुकी है फिर भी इसे लटकाया जा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुल मिलाकर, इस पूरी पहल से कुछ बातें साफ तौर पर दिखाई देती है। एक तो यह पूरा काम प्रकृति और पर्यावरण से सामंजस्य बनाकर किया गया क्योंकि आदिवासियों का प्रकृति से गहरा रिशता है। वे जंगल और वन्य जीवों के सबसे करीब रहते आए हैं। उन्हें इसकी जानकारी है। और इस पूरे काम में न तो परिवेश को नुकसान पहुंचा, न जंगल को और न ही किसी वन्य जीव को। इसमें सिंचाई के लिए पानी लाने में किसी बिजली की जरूरत भी नही पड़ी। लिहाजा बिजली तार भी नहीं खींचे गए। और न हीं डीजल ईंजन की आवशयकता पड़ी। कोई ध्वनि प्रदूषण भी नही हुआ। इस प्रकार प्रकृति, वन्य जीव और जंगल का संरक्षण करते हुए कृषि के लिए पानी की व्यवस्था करना संभव हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह भी जाहिर होता है कि घने जंगलों में रहने वाले ग्रामवासियों के विकास और पर्यावरण संरक्षण में कोई टकराव होना जरूरी नहीं है। वन संरक्षण और वन्य प्राणी संरक्षण के लिए उन्हें हटाना जरूरी नही है। ऐसे तरीके खोजे जा सकते हैं, जिनसे दोनों उद्देशय पूरे हो सकें। लेकिन विडंबना यह है कि इसके बावजूद सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान और सतपुड़ा टाईगर रिजर्व से विस्थपित करने कोशिश की जा रही है।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;दूसरी बात यह है कि अगर मौका मिले तो बिना पढे-लिखे लोग भी अपने परंपरागत ज्ञान, अनुभव और लगन से जल प्रबंधन जैसे तकनीकी काम को बेहतर ढंग से कर सकते है, यह रांईखेड़ा और आंजनढाना के काम से साबित होता है। कहां से और किस तरह से नाली के द्वारा पहाड़ के टेढे-मेढे रास्तों से पानी उनके खेतों तक पहुंचेगा, इसका पूरा अनुमान उन्होंने लगाया और इसमें वे कामयाब हुए। न तो उन्होंने इंजीनियर की तरह नाप-जोख की और न ही इस विषय की किसी से तकनीकी जानकारी ली। अपनी अनुभवी निगाहो से ही उन्होंने पूरा अनुमान लगाया, जो सही निकला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीसरी बात यह है कि सिंचाई व्यवस्था गांव की सामूहिक पहल और प्रयास का परिणाम है। सरकारी योजनाओं एवं सरकारी धन से यह काम नहीं हुआ। सबसे बड़ी बात ग्रामीणों की कभी न हारनेवाली हिम्मत और जिद, थी जिसके कारण आज उनकी और उनके बच्चों की जिंदगी में आमूलचूल बदलाव आ गया। कुल मिलाकर, यह कहा जा सकता है कि ऐसे गांवों को विस्थापित करना बिल्कुल भी उचित नही है। बल्कि इस तरह के प्रयास और करने की जरूरत है। बहरहाल, यह पहल सराहनीय होने के साथ-साथ अनुकरणीय भी है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6488502539236057488-4804577658886170267?l=hashiye-par.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hashiye-par.blogspot.com/feeds/4804577658886170267/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2009/10/blog-post_11.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/4804577658886170267'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/4804577658886170267'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2009/10/blog-post_11.html' title='पहाड़ खोदकर खेतों को पानी पिलाया'/><author><name>Baba Mayaram</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07974100393280656159</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TQ2zSrZyPhI/AAAAAAAAAKE/mmnqrZO0TCI/S220/baba_fb.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/StHSgtswhnI/AAAAAAAAAC8/mLJ3ZDaMsRo/s72-c/Picture+066.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6488502539236057488.post-541825185650830713</id><published>2009-10-09T18:05:00.000+05:30</published><updated>2009-10-09T19:10:52.301+05:30</updated><title type='text'>उम्मीद की किरण दिखा रही हैं छत्तीसगढ़ की दो सरपंच</title><content type='html'>स्वास्थ्य के क्षेत्र में छत्तीसगढ़ की दो महिला सरपंच के कामों की कीर्ति फैलती जा रही है। ये दोनों बिलासपुर जिले के कोटा विकासखंड से हैं। एक है करहीकछार की तिहारिन बाई और दूसरी हैं रतखंडी की पुष्पाराज। दोनों महिला सरपंच आदिवासी समुदाय से हैं तिहारिन बाई उरांव हैं और पुष्पाराज गोंड। दोनों सरपंच होने के साथ-साथ स्वास्थ्य कार्यकर्ता भी हैं और यहां स्वास्थ्य के क्षेत्र में कार्यरत्त गनियारी स्थित गैर सरकारी संस्था जन स्वास्थ्य&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/Ss8z6tXe3eI/AAAAAAAAABY/3ftVe3zbEig/s1600-h/Tiharin+Bhai.JPG"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 180px; FLOAT: right; HEIGHT: 227px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5390584362689289698" border="0" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/Ss8z6tXe3eI/AAAAAAAAABY/3ftVe3zbEig/s320/Tiharin+Bhai.JPG" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt; सहयोग से जुड़ी हुई हैं। &lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;बिलासपुर से 20 किलोमीटर दूर कोटा विकासखंड का मुख्यालय है। इसी क्षेत्र में ये दोनों पंचायतें स्थित हैं। यह आदिवासी बहुल और जंगल वाला पिछड़ा हुआ क्षेत्र है। यहां एक छोटे से कस्बे गनियारी में गैर सरकारी जन स्वास्थ्य सहयोग केन्द्र है, जिसकी स्थापना 1999 में हुई थी। इसे मौजूदा स्वास्थ्य सेवाओं से चिंतित कुछ डाक्टरों ने शुरू किया जिसमें से कुछ डाक्टर आल इंडिया इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल साइंस (एम्स) नई दिल्ली से निकले थे। इसका उद्देशय है ग्रामीण समुदाय को और विशेषकर महिलाओं को सशकत कर बीमारियों की रोकथाम करना और इलाज करना। यह 15 बिस्तर का अस्पताल है, जहां 10 पूरावक्ती डाक्टर हैं। इस केन्द्र के ग्रामीण स्वास्थ्य कार्यक्रम की दोनों कार्यकर्ता हिस्सा हैं।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ये दोनों महिला सरपंच अपने पंचायतों के दायित्व निर्वहन के साथ-साथ स्वास्थ्य कार्यकर्ता का काम भी बखूबी कर रही हैं। उनके इस काम में ग्रामीणों का भी अच्छा सहयोग मिल रहा है। वे अपने गांव में मलेरिया की रोकथाम की मुहिम चलाती हैं, गर्भवती महिलाओं की जांच में मदद करती हैं। वे बच्चों के पोषण और परवरिश के लिए चलाए जा रहे फुलवारी केन्द्र की निगरानी करती हैं और छोटी-मोटी बीमारियों का अपने स्तर प्राथमिक उपचार करती हैं। कुल मिलाकर, वे ग्रामीणों और अस्पताल के बीच में पुल का काम कर रही हैं जिससे गांव में स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हल करने में मदद मिल रही है।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;इस इलाके में मलेरिया की रोकथाम एक बड़ी चुनौती है। इसके लिए स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के द्वारा कई स्तरों पर मुहिम चलाई जाती है। इसमें दो स्तरों पर काम किया जाता है। एक, मलेरिया के मरीज की पहचान कर उसका तुरंत इलाज करवाना और दूसरा, गांव में मलेरिया के मच्छरों को पनपने से रोकना। इस मुहिम में स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;इस मुहिम में स्कूली बच्चों और कि&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/Ss81i3KM8-I/AAAAAAAAABg/PMI2hV-pTjA/s1600-h/P1050023.JPG"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; FLOAT: left; HEIGHT: 240px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5390586152024339426" border="0" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/Ss81i3KM8-I/AAAAAAAAABg/PMI2hV-pTjA/s320/P1050023.JPG" /&gt;&lt;/a&gt;शोरी बालिकाओं का भी सहयोग लिया जाता है। मच्छरदानी के इस्तेमाल पर जोर दिया जाता है। इस काम में दोनों स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का काम उल्लेखनीय है। जन स्वास्थ्य सहयोग के कार्यक्रम संयोजक प्रफुल्ल चंदेल कहते हैं इनसे हमें मलेरिया की रोकथाम करने में काफी मदद मिली है। इस इलाके में अब मलेरिया से होनेवाली मौतें आधी हो गई है।&lt;br /&gt;इसी प्रकार ये दोनों कार्यकर्ता अपने गांव मे बच्चों के पोषण और परवरिश के लिए चलाए जा रहे फुलवारी केन्द्र में भी मदद करती हैं। वे उनका वजन लेती हैं अगर कम वजन होता है, यानी बच्चा कुपोषित होता है तो उसका वजन बढ़ाने के लिए प्रयास किया जाता है। करहीकछार पंचायत में 5 फुलवारी केन्द्र चल रहे है और रतखंडी में 3 केन्द्र चलाए जा रहे है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जन स्वास्थ्य सहयोग, गनियारी के डा. अनुराग भार्गव का कहना है कि 6 माह से 3 साल तक के आयुवाले बच्चो को समुचित पोषण देने की जरूरत होती है। अगर बच्चा बचपन में कुपोषित रहा तो उसका असर रहता है। इसलिए उन्हें इस अवधि में स्वादिष्ट, गरम, पतले और मुलायम भोजन की जरूरत होती है, जो कि फुलवारी केन्द्रों में दिया जाता है। इसके लिए गांव से प्रतिदिन एक-एक मुट्ठी चावल एकत्र कर फुलवारी को दिया जाता है। ग्रामीणों का सहयोग ऐसे कामों में स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के प्रयासों से ही संभव होता है। दोनों पंचायतों में बाल पोषण का स्तर सुधारने में ये कार्यकर्ता जुटी हुई हैं। करहीकछार की सरपंच तिहारिन बाई का कहना है कि हमारे गांव में 20-22 प्रसव हुए। इसमें सभी बच्चे स्वस्थ थे।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;चिकित्सकों का मानना है कि स्वास्थ्य की दृष्टि से यह बात सिद्ध हो गई है कि कुपोषित व्यक्ति जल्द बीमार होता है। इसलिए बच्चे और बड़े स्वस्थ रहें, यह जरूरी है। इसके लिए अपने आसपास उपलब्ध जंगल और खेत से मिलनेवाले पोषक आहारों को लेने की सलाह दी जाती है। जिसमें फल, फूल, पत्तिया, तिलहन, दाल और अनाज शामिल हैं। इनमें से ज्यादातर अमौदि्रक चीजें होती हैं, जो सहज उपलब्ध होती है, इनकी जानकारी ग्रामीणों को दी जाती है।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;हालांकि दोनों ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं हैं तिहारिन बाई 5वीं तक और पुष्पाराज की शिक्षा 8 वीं तक हुई है। लेकिन गहरी लगन, सक्रयिता और ग्रामीणों के प्रति सेवा भावना से ये अच्छी स्वास्थ्य कार्यकर्ता साबित हो रही हैं। यहां स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के चयन का आधार स्कूली शिक्षा नहीं है, बल्कि ग्रामीणों के साथ व्यवहार में मिलनसार, गांव की सेवा और सहयोग की भावना को ही स्वास्थ्य कार्यकर्ता बनने की योग्यता माना जाता है। और वे चिकित्सकों की सतत् देखरेख और प्रशिक्षण के चलते बखूबी यह काम कर रही हैं। उन्हें प्रशिक्षण सामग्री- पोस्टर, पर्चे, आदि के माध्यम से शिक्षण किया जाता है। इस क्षेत्र में करीब 80 महिला कार्यकर्ता सक्रयि हैं।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अब वे थर्मामीटर से बुखार नापने से लेकर मलेरिया की स्लाइड बनाना और ब्लड प्रेशर की जांच कर लेती हैं। वे बच्चों का वजन कर लेती हैं। स्थानीय खाद्य पदर्थों , विशेषकर पोषण प्रदान करनेवाले फल-फूलों से कुपोषण दूर करने की सलाह देती हैं।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;वे ओ. आर. एस. का घोल बनाना सिखाती हैं। वे अपने गांव से गुजरने वाली मिनी बसों के जरिये ऐसी छोटी-मोटी जांच के लिए स्वास्थ्य केन्द्र नमूने भेजती हैं जिसकी जांच रिपोर्ट उसी दिन बस से स्वास्थ्य केन्द्र से उन्हें भेज दी जाती हैं। सड़कों के आवागमन का स्वास्थ्य सुविधाओं में सहायक होने का यह एक अच्छा उदाहरण है। एक अच्छे स्वास्थ्य के लिए अच्छे परिवहन की जरूरत होती है।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ग्रामीण स्वास्थ्य कार्यक्रम के प्रमुख डा. योगेश जैन का कहना है कि दोनों स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का सरपंच होने का लाभ हमारे स्वास्थ्य कार्यक्रम में मिलता है। खासतौर से महिला स्वास्थ्य में तो इसका विशेष लाभ होता ही है। गर्भवती महिलाओं की जांच और अन्य बीमारियों की रोकथाम में उनकी वि्शेष भूमिका है। उनकी बात लोग सुनते हैं और मानते हैं। हमारे कार्यक्रम में महिलाओं की भागीदारी सार्थक होती है। उनके पास पंचायत का कुछ अतिरिक्त फंड भी होता है जिसे वे ग्रामीणों के इलाज के लिए खर्च कर सकती हैं।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;यानी कुल मिलाकर, इन दोनों महिला सरपंचों का काम कई मायनों में उपयोगी है। एक, आज जब दवाओं के दाम आसमान छू रहे हैं और स्वास्थ्य सेवाएं लोगों की पहुंच से दूर होती जा रही है, तब गांव की ही महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता गांवों के स्वास्थ्य को बेहतर करने का करें तो यह उपयोगी और सार्थक काम है। दो, देश के अन्य भागों की तरह छत्तीसगढ़ में भी महिलाओं को समाज में कमतर दर्जा मिलता है। यहां एक अंधवि’वास टोनही प्रथा के रूप में प्रचलित है जिसमें किसी महिला को जादू-टोना का आरोप लगाकर उसे प्रताड़ित किया जाता है। हालांकि इसे कानून के द्वारा रोकने के लिए कोशिश की गई है लेकिन ऐसे में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता भी मददगार हो सकती है।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;तीन, बदलाव की प्रक्रिया सदैव जमीनी स्तर से ही शुरु होती है, जिसकी शुरुआत पंचायतों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व के साथ हो चुकी है। यह महिला सशक्तिकरण का भी एक अच्छा और सराहनीय प्रयास है। इस पूरे काम के बारे में करहीकछार की सरपंच तिहारिन बाई कहती है कि मैं लोगों के कुछ काम आ रही हूं, गांव के लिए कुछ कर रही हूं, यह सोचकर बहुत अच्छा लगता है। रतखंडी की सरपंच पुष्पा भी हमेशा ऐसा ही काम करना चाहती हैं। कुल मिलाकर, इन दोनों सरपंचों के काम हमें उम्मीद की किरण दिखा रही हैं, जो सराहनीय होने के साथ अनुकरणीय भी है।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6488502539236057488-541825185650830713?l=hashiye-par.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hashiye-par.blogspot.com/feeds/541825185650830713/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2009/10/blog-post.html#comment-form' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/541825185650830713'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6488502539236057488/posts/default/541825185650830713'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hashiye-par.blogspot.com/2009/10/blog-post.html' title='उम्मीद की किरण दिखा रही हैं छत्तीसगढ़ की दो सरपंच'/><author><name>Baba Mayaram</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07974100393280656159</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/TQ2zSrZyPhI/AAAAAAAAAKE/mmnqrZO0TCI/S220/baba_fb.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_BGwY_uWawgM/Ss8z6tXe3eI/AAAAAAAAABY/3ftVe3zbEig/s72-c/Tiharin+Bhai.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry></feed>
