Friday, September 26, 2014

सुनील भाई का जाना

सुनील भाई नहीं रहे, यह विश्वास करना मुश्किल हो रहा है। जब 16 अप्रैल को उनकी तबीयत बिगड़ी और स्मिता जी और मैं उन्हें इटारसी ले जा रहे थे, तब मैंने उनकी टेबल पर उसी सुबह वार्ता के लिए लिखा अधूरा संपादकीय छोड़ दिया था, यह सोचकर कि वे इटारसी से लौटकर उसे पूरा करेंगे। अब वह अधूरा ही रहेगा।

सुनील भाई को इटारसी में डाॅक्टर को दिखाया तो बताया गया उन्हें पक्षाघात (लकवा) की शिकायत है, जल्द भोपाल ले जाना होगा। इटारसी और भोपाल का रास्ता लंबा है और सड़कें बदहाल, गड्ढे और धूल से भरी हुई। रास्ते में उन्हें तीन उल्टियां हुईं और अंतिम उल्टी में खून आया था।
भोपाल में सुनील भाई के छोटे भाई सोमेश जो खुद डाॅक्टर हैं, पहले से मौजूद थे। अस्पताल पहुंचते ही जांच के लिए ले जाया गया, जहां पता चला कि ब्रेन हेमरेज हुआ है और तत्काल आॅपरेशन करना पड़ेगा। आॅपरेशन हुआ भी पर हालत में सुधार नहीं हुआ। भोपाल से दिल्ली के एम्स में ले जाया गया, जहां उनकी हालत जस की तस बनी रही। आखिरकार 21 अप्रैल को सुनील भाई ने अंतिम सांस ले ली।

सुनील भाई से मेरा परिचय 1985 के आसपास हुआ, जब वे दिल्ली छोड़कर केसला आ गए थे। केसला के जंगल और नदी के किनारे बांसलाखेड़ा है, जहां राजनारायण के साथ सुनील रहते थे। यह बहुत रमणीक स्थान था। इटारसी शहर का युवा राजनारायण यहां अकेला ही रह रहा था और क्षेत्र के आदिवासियों को संगठित कर उनमें चेतना जगाने का काम कर रहा था।

मैं उस समय करीब माह भर रहा और सुनील भाई और राजनारायण के साथ गांव-गांव घूमा। होशंगाबाद जिले का केसला विकासखंड आदिवासी बहुल है। यहां गोंड और कोरकू आदिवासी रहते हैं। इस इलाके में दो समस्याएं प्रमुख थी-एक पानी की और दूसरी विस्थापन की। पीने का पानी की समस्या तो थी ही, खेत भी प्यासे थे। इस इलाके के 44 गांव तवा बांध से विस्थापित हुए, लेकिन इनके खेतों तक नहरें नहीं पहुंची, पानी मिला ऊपरी हिस्से को।

इसी प्रकार भारतीय फौज द्वारा गोला-बारूद के परीक्षण के लिए बनाई गई प्रूफरेंज में यहां के 26 गांव उजाड़े गए। आर्डिनेंस फ़ैक्टरी से 9 गांवों की जमीनें गईं और अब सतपुड़ा टाईगर रिजर्व से सैकड़ों सालों से बसे गांवों को उजाड़ा जा रहा है। यह पूरा जिला उजाड़े और भगाए गए लोगों का बन गया है। सुनील भाई विस्थापितों के संघर्ष से गहरे रूप से जुड़े थे।
महीने भर की तैयारी के बाद 1985 में पानी लाओ संघर्ष मोर्चा बना और इसके तहत केसला से होशंगाबाद पदयात्रा की गई जिसमें करीब 100 आदिवासी शामिल थे। मुट्ठी बांधकर, हवा में हाथ लहराकर नारे लगाते हुए इन असहाय और गरीब समझे जाने वाले आदिवासियों को देखकर मैं ऊर्जा से भर उठा।

इसके बाद मैं इस इलाके में सैकड़ों बार गया। 1995-96 के दौरान यह, रहा भी। यह स्थान हमेशा मेरे लिए एक तीर्थस्थल की तरह रहा। जैसे कोई बनारस और हरिद्वार जाता है और वहां से कोई अच्छाई लाता है। मैं भी यहां हमेशा कुछ अच्छाई ढूढ़ता था। अच्छे विचार सुनता-समझता था। और सुनील भाई से सवाल करता था- वे बहुत सहज थे और खुले हुए थे। उनका सब कुछ सबके लिए था। उनसे किसी भी मुद्दे पर कभी भी बात की जा सकती थी। बहस और बातचीत की जा सकती थी। उनका और उनकी पत्नी स्मिता जी का स्नेह मुझे ही नहीं मेरे जैसे कई लोगों को मिला, जो उनके हो गए और सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय हो गए।

सुनील और राजनारायण ने आदिवासियों के साथ मिलकर 1985 में किसान आदिवासी संगठन का गठन किया। और यहीं से शुरू हो गया आदिवासियों के हक और इज्जत की लंबी लड़ाई का सिलसिला। गांव-गांव में बैठकें होने लगीं। पर बीच में एक धक्का लगा। 1990 में राजनारायण की एक सड़क हादसे में मौत हो गई। सुनील भाई ने हिम्मत नहीं हारी, अकेले ही टिके रहे। धीरे-धीरे फागराम, गुलिया बाई और विस्तोरी जैसे नए कार्यकर्ता तैयार हुए और संगठन फिर बढ़ने लगा।

लंबी लड़ाई के बाद तवा बांध पर विस्थापितों को मछली का अधिकार मिला। सुनील भाई के नेतृत्व में अभूतपूर्व सफलता मिली। अगर स्थानीय संसाधनों-जल, जंगल, जमीन पर स्थानीय लोगों को अधिकार दिया जाए तो उनका संरक्षण भी होगा और लोगों को रोजगार भी मिलेगा, यह काम इसकी बेहतरीन मिसाल है।

सुनील भाई अपने छात्र जीवन से ही विख्यात समाजवादी किशन पटनायक व समाजवादी विचारों से जुड़ गए। जब वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय दिल्ली में अध्ययनरत थे तब वे अपने साथियों के साथ ‘समता एरा’ नामक पत्रिका का संपादन करते थे और खुद ही उसे छात्रों में बांटते थे। उस समय उन्होंने असम आंदोलन के समर्थन में दिल्ली से गुवाहाटी तक साईकिल यात्रा व सिख विरोधी दंगों के खिलाफ पंजाब से दिल्ली अमृतसर पदयात्रा की।

पूंजीवाद के विकल्प के रूप में समाजवाद के हिमायती थे। वे हर तरह की गैरबराबरी के खिलाफ थे। बराबरी और समता पर आधारित समाज चाहते थे। उनका जीवन भी वैसा ही था। न कोई तामझाम और न आडंबर। न घर में टीवी है, न कोई वाहन। न जमीन, न कोई जायदाद। सरल और सादा जीवन। सीमित जरूरतें। उनका जीवन बहुत ही सादगीपूर्ण था। उनकी अडिग सिद्धांतनिष्ठा, ईमादारी और तपे हुए जीवन का कोई जोड़ नहीं हैं। संत की तरह जीवन जीने वाले सुनील भाई में व्यवस्था परिवर्तन की गहरी तड़प थी वे बाबा आम्टे का उदाहरण देते हुए कहते थे की बाबा की भारत जोड़ो यात्रा के दौरान कई युवा जुड़े। हमें भी देश में लंबी यात्रा करनी चाहिए जिससे नए युवा जुड़े। और वे परिवर्तन के वाहक बने।
सुनील और राजनारायण ने आदिवासियों के साथ मिलकर 1985 में किसान आदिवासी संगठन का गठन किया। और यहीं से शुरू हो गया आदिवासियों के हक और इज्जत की लंबी लड़ाई का सिलसिला। गांव-गांव में बैठकें होने लगीं। पर बीच में एक धक्का लगा। 1990 में राजनारायण की एक सड़क हादसे में मौत हो गई। सुनील भाई ने हिम्मत नहीं हारी, अकेले ही टिके रहे। धीरे-धीरे फागराम, गुलिया बाई और विस्तोरी जैसे नए कार्यकर्ता तैयार हुए और संगठन फिर बढ़ने लगा।
आमतौर पर राज चाय बनाकर कार्यकर्ताओं को पिलाना इत्यादि बहुत से काम। उन्हें भीड़ में बैठकर विज्ञप्ति व पर्चे लिखते देखा जा सकता था, उन्हें हाथ से लिखना पसंद था।

दुबला पतला शरीर, दाढ़ी, चश्मा और स्मित मुस्कान ही उनकी पहचान थी। उनके कंधे पर टंगे झोले में पर्चे, पुस्तिकाएं और सामयिक वार्ता होती थी। वे पैदल चलना पसंद करते थे। मितभाषी और अल्पहारी तो थे ही। लेकिन जब वे भाषण देते थे तो उनके कंठ में सरस्वती विराजमान हो जाती थीं। उनमें भीड़ खींचने और उसे बांधे रखने की अद्भूत क्षमता थी। वे एक अर्थशास्त्री थे जिस सरल ढंग से वे अर्थव्यवस्था की बारीकियों को समझाते थे, उसकी कोई सानी नहीं है। उनके लेख राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते थे।

सुनील भाई निचले स्तर से जनशक्ति के माध्यम से बदलाव चाहते थे। आदिवासी, किसान और वंचित तबकों की समस्याओं के लिए उन्हें ही संगठित कर उनका हल ढूंढ़ते थे। हरदा, बैतूल और होशंगाबाद में बरसों से यह कोशिशें की जा रही हैं। देश के अलग-अलग कोनों में भी समाजवादी जनपरिषद के साथी यह प्रयास कर रहे थे। ओडि़शा में नियमगिरि की लड़ाई इसका अच्छा उदाहरण है। 

पिछले डेढ़ साल से सामयिक वार्ता दिल्ली से इटारसी आ गई वे चाहते थे कि देश में वैचारिक बहस चलते रहना चाहिए। वार्ता इसका माध्यम बने। कार्यकर्ताओं के वैचारिक प्रशिक्षण व देश-दुनिया के बदलाव व विचारों को जानने का यह जरिया बने। वैकल्पिक राजनीति के वे प्रमुख सिद्धांतकारों में एक थे। वे चाहते थे व्यवस्था में बदलाव हो और इसके विभिन्न पहलुओं पर बहस चले। सही बदलाव तभी होगा।

सामयिक वार्ता के इटारसी आने के बाद सुनील भाई की चिंता उसको लेकर हमेशा बनी रही। वे इसकी सामग्री से लेकर वितरण तक की चिंता करते थे। हम लोग हर अंक के बारे में योजना बनाते थे। यह अंक क्रोनी कैपिटलिज्म पर है। यह सुझाव भी सुनील भाई का था। वार्ता के इस अंक के संपादन का पूरा कार्य सुनील भाई के अंतिम कार्यों में से एक है। बीमार होने के कुछ समय पहले तक वे वार्ता का काम कर रहे थे। उनकी खास बात यह भी थी कि आदिवासी गांव में रहकर देश-दुनिया के बदलावों पर पैनी नजर रखते थे। हाल ही में हमने लातीनी अमरीका पर वार्ता का अंक निकाला था।

जब समाज में जीवन मूल्य इतने गिर गए हों, कोई बिना लोभ-लालच के सार्वजनिक व राजनैतिक काम न करता हो, सुनील भाई जैसे लोगों को देखकर किसी भी देशप्रेमी का दिल उछल सकता है। अल्बर्ट आइंस्टीन ने गांधी के लिए कहा था कि ‘आनेवाली पीढ़ियां शायद मुश्किल से ही यह विश्वास करेंगी कि गांधीजी जैसा हाड़ मांस का पुतला कभी इस धरती पर हुआ होगा।’ सुनील भाई के लिए भी यह कथन सटीक बैठता है।

लेकिन भारतीय लोकमानस में महान व्यक्तियों व महापुरूषों का गुणगान करने की परंपरा है। इससे हम अपने दायित्व से स्वतः ही मुक्त हो जाते हैं। सुनील भाई का व्यक्तित्व और जीवन प्रेरणादायी है। वे रचना और संघर्ष के रास्ते पर चलकर समाजवाद और नई दुनिया का सपना देखते थे। अगर हम उनके इस काम को कुछ आगे बढ़ा सकें तो यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

Saturday, September 14, 2013

विज्ञान और जनांदोलन को जोड़ने वाली शख्सियत

जब मैं पिछले साल विनोद रैना जी से मिला था और उनके साथ में पचमढ़ी गया था तब मुझे जरा भी भान नहीं था कि यह हमारी आखिरी मुलाकात होगी। उन्होंने मुझसे कहा था कि अब इंटरनेट के माध्यम से मिलते रहेंगे।

परसों जब 12 सितंबर को भोपाल से सचिन जैन का एसएमएस मिला कि विनोद रैना जी नहीं रहे तो विश्वास ही नहीं हुआ। उनका दिल्ली में उसी दिन (12 सितंबर की) शाम को निधन हो गया। हालांकि कुछ दिन पहले एकलव्य के साथी गोपाल राठी ने खबर दी थी कि विनोद भार्इ कैंसर से पीडि़त हैं।

आज वे नहीं हैं तब उनके बारे में सोचने पर मेरे मानस पटल पर उनकी कर्इ छवियां बन-बिगड़ रही हैं। लेकिन जो छवि उनकी पहचान  थी वो उनकी घनी दाढ़ी, गोल चश्मा और सदाबहार मुस्कान। और गर्मजोशी से मिलना।

मेरा उनसे काफी पुराना परिचय है। करीब 30-32 साल पुराना। जब वे होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम के सिलसिले में किशोर भारती संस्था आया करते थे।

उस समय बनखेड़ी से किशोर भारती तक पहुंचने के लिए कोर्इ वाहन नहीं चलते थे तो बनखेड़ी से साइकिल से जाना पड़ता था। अक्सर विनोद भार्इ भी साइकिल से आते थे।

उन दिनों होशंगाबाद विज्ञान का पाठयक्रम विकसित हो रहा था और विनोद भार्इ जैसे शिक्षाविद  और वैज्ञानिक उसे विकसित करने में योगदान दे रहे थे। अक्सर जब मैं वहां जाता था तब वहां देखता था कि कोसम वृक्षों के नीचे बैठकर मीटिंग हो रही है। शिक्षक, शिक्षाविद और विभिन्न विषयों के जानकर विज्ञान के प्रयोग करते रहते थे। उनमें से एक विनोद रैना भी थे।

बाद में जब एकलव्य बना तो विनोद रैना ही उसे बनाने और चलाने वालों में प्रमुख थे। उन्होंने भले ही दिल्ली विष्वविधालय से षिक्षा हासिल की हो लेकिन सही मायनों में उनकी कर्मस्थली मध्यप्रदेश ही बना रहा।

वैज्ञानिक और शिक्षाविद होने के साथ-साथ उनकी पर्यावरण व जनांदोलनों में गहरी रूचि थे। उनका सामाजिक सरोकार से जुड़ाव अंत तक बना रहा। यधपि मैंने उनके साथ औपचारिक रूप से काम नहीं किया लेकिन उनका स्नेह व प्रोत्साहन हमेशा मिलता रहा।

छात्र जीवन में मेरा पहला लेख एकलव्य से प्रकाशित बाल पत्रिका चकमक के पहले अंक में उन्होंने ही छापा था। यह 1985 की बात है। जबकि उन्हें उस समय के हमारे शिक्षकों की नाराजगी का सामना करना पड़ा था।

वे हमेशा जनांदोलनों में विज्ञान की भूमिका देखते थे। जहां भी जनांदोलन उभरते थे, वे अपना समर्थन देते। विनोद भार्इ की मौजूदगी ऐसे आंदोलनों को एक अलग आयाम देती थी। वे मुझे पिछले 25 सालों में कर्इ जगह जनांदोलन में टकराए।

चाहे वह बड़े बांधों के खिलाफ नर्मदा बचाओ का आंदोलन हो या सुदूर छत्तीसगढ़ में लोहे की खदानों के मजदूरों का आंदोलन, चाहे वह भोपाल के गैस पीडि़तों का आंदोलन हो या फिर होशंगाबाद के विस्थापित आदिवासियों का आंदोलन। वे सभी जगह सक्रिय रहे। वे उनमें शामिल तो होते ही थे बल्कि शोध व जानकारी एकत्र कर आंदोलनों को मजबूती प्रदान करते थे। चाहे वह बड़े बांधों के खिलाफ नर्मदा बचाओ का आंदोलन हो या सुदूर छत्तीसगढ़ में लोहे की खदानों के मजदूरों का आंदोलन, चाहे वह भोपाल के गैस पीडि़तों का आंदोलन हो या फिर होशंगाबाद के विस्थापित आदिवासियों का आंदोलन। वे सभी जगह सक्रिय रहे। वे उनमें शामिल तो होते ही थे बल्कि शोध व जानकारी एकत्र कर आंदोलनों को मजबूती प्रदान करते थे। वे किसी भी मुददे की तह में जाकर उसे समझते और फिर जनता के सामने तार्किक ढंग से अपने अनूठे अंदाज में रखते थे, जो कि एक वैज्ञानिक की शैली  होती है।

विनोद रैना और एकलव्य संस्था का योगदान अमूल्य है क्योंकि उन्होंने विज्ञान को एक प्रयोगशाला से निकालकर एक सोच के रूप में पेश किया। सवाल उठाने और जिज्ञासा को किसी भी खोज और प्रयोग के लिए आवश्यक बताया। मौजूदा शिक्षा जो केवल रटकर परीक्षा में उगल देने की कला है उसे समझने व सीखने का माध्यम बताया।

 शिक्षकों और छात्रों के लिए विज्ञान को एक दिलचस्प विषय बनाया। बाल विज्ञान के छात्रों व षिक्षकों को खेत-खलिहानों में पतितयां पहचानने, प्रयोग के लिए मिटटी के नमूने एकत्र करते व खरपतवारों की पहचान करते देखा जा सकता था। ऐसा अदभुत दृश्य मेरे आंखों के सामने तैर रहा है क्योंकि मुझे भी इस विज्ञान को पढ़ने का मौका मिला है। हालांकि सरकार ने बेतुके आरोप लगाकर उस लोकप्रिय प्रयोग को बंद करवा दिया। पर इससे उसका महत्व किसी भी रूप में कम नहीं होता।

एकलव्य के होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम की देश-दुनिया में सराहना हुर्इ। भारत की शिक्षा में यह अनूठा प्रयोग सरकारी स्कूलों में 30 साल तक चला जिससे विनोद रैना न केवल जुडे़ रहे बलिक उनकी इसमें प्रमुख भूमिका रही।

बाद में वे पीपुल्स साइंस मूवमेंट, भारत ज्ञान विज्ञान समिति, वर्ल्ड सोशल फोरम और अनेक जनांदोलनों से जुड़े रहे। विनोद भार्इ की कमी हर जगह बनी रहेगी। लेकिन उनका काम और उनकी वैज्ञानिक सोच सदैव रास्ता दिखाती रहेगी।

संयोग है कि मैं उसी गांव का रहने वाला हूं, जहां किशोर भारती संस्था थी। होशंगाबाद के इसी गांव में आकर विनोद भार्इ ने एक अलग राह पकड़ ली जो दिल्ली जैसे महानगरों में न जाकर मध्यप्रदेश के दूरदराज के गांवों तक जाती थी। उन्होंने मध्यप्रदेश को अपना कार्यक्षेत्र  बनाया और यहां के स्कूलों में शिक्षा का काम किया जो मिसाल बन गया। ऐसे अनूठे व्यकितत्व के धनी विनोद भार्इ सदा हमारे दिलों में जिंदा रहेंगे।

Friday, December 28, 2012

सतपुड़ा का मैला आंचल


कश्मीर उप्पल
 
हमारे नर्मदांचल के लेखक, पत्रकार, संपादक, एकिटविस्ट बाबा मायाराम जमीन से जुडे़ मुददों पर लिखने वाले के रूप में जाने जाते हैं। उनके लेखन में देस की मिटटी की सोंधी महक होती है। बाबा मायाराम का लेखन ही नहीं वरन उनका संपूर्ण लेखकीय कर्म हमें साक्षात भूमि की भाषा-भूषा से जोड़ देता है। यह उनके लेखन की विषेषता है कि हमें महसूस होता है कि हम ही साक्षात रूप से गरीब ग्रामीणजनों से मिल रहे हैं। आदिवासियों तथा पाठक के बीच में से लेखक का हटे रहा बाबा की विषेषता है। वे स्वयं प्रयास कर हमें कुछ नहीं दिखाते वरन हमें उठाकर ग्रामीण अंचल के किसी गांव में पहुंचा देते हैं।

सतपुड़ा के बाशिन्दे बाबा मायाराम के जादुई लेखन का वह संग्रह है जिसमें होकर हम गांव और जंगल के बाशिन्दे से मिलते हैं। इन बाशिन्दे में सतपुड़ा के जंगल के आदिवासियों का ही नहीं शेर, गाय, बैल और पक्षियों का जीवन दर्ज है। पालतू पशुओं के साथ-साथ जंगल के पशुओं को भी आदिवासियों के जीवन का अंग मानने वाले बाबा जंगल के उस दर्द का बखान करते हैं जिसने सभी को उदास और अकेला कर दिया है।

पहले कभी आदमी खुद तय करता था वहां कहां बसे रहे, बोये खाये और अपना सामाजिक जीवन बनाये। पर आज व्यवस्थाएं तय करती हैं कि आदमी कहां रहे? कम से कम आदिवासियों से तो यह मौलिक अधिकार छीन ही लिया गया। अब यह खतरा जंगलों से होता गांव-गांव में भी पैर फैला रहा है।

बाबा कहते हैं कि होशंगाबाद विस्थापितों का जिला बन गया है। 1970 में बने तवा बांध से लेकर सतपुड़ा टाइगर रिजर्व, पू्रफरेंज आदि के कारण कई गांव विस्थापित कर दिये गये हैं। बाबा मायाराम इन्हीं विस्थापितों के गांव में हमें ले जाकर खड़ा कर देते हैं और हम देखते और सुनते जाते हैं।

बाबा सबसे पहले हमें आदिवासी गांव धांई ले जाते हैं। "मैं बहुत अकेला हो गया हूं। मेरे घर मं यहां आने पत्नी मेत्रोबाई, पुत्र सुकुमार, नाती, भाई बलवंत और उसकी लड़की की हो गई हैं। जो पैसा था, सब खत्म हो गया। घर में जो गहने-जेवर थे वे भी बिक गए। घर में खाने को नहीं है तो इलाज से कहां से करवाएं?" यह कहना है आधार सिंह का। आधार सिंह नई धांई के निवासी है, जिसे चार वर्ष पहले बोरी अभयारण्य से विस्थापित करके बाहर बसाया गया है। घर में आई मुसीबत के कारण उसकी छोटी बेटी रजनी ने स्कूल छोड़ दिया। वे एक नाती की पढ़ाई को लेकर भी चिंतित हैं। इनकी लड़कियां जलाऊ लकड़ी का गटठा बेच रही हैं, उससे जैसे-तैसे घर की गुजर बसर चल रही है।

मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में बोरी अभयारण्य भारत का पहला आरक्षित वन है। अब बोरी अभयारण्य, सतपुड़ा राष्ट्रीय उधान और पचमढ़ी अभयारण्य को मिलाकर सतपुड़ा टाइगर रिजर्व बनाया गया है। कुल मिलाकर आदिवासियों के 75 गांव है और इतने ही गांव सीमा से लगे हुए हैं।  आज नई धांई में नदी के बदले हैंडपंप है। बोरी में अंदर धांई में सोनभद्रा नदी बहती थी। वहां पानी इफरात था, आज वे बूंद-बूंद के लिए मोहताज हैं। बोरी अभयारण्य के अंदर पुराने गांव में कोरकू आदिवासियों का जीवन जंगल पर आधारित था। वहां तेंदू,अचार, गोंद, फल-फूल, कंदमूल (ननमाटी, जंगली रतालू, बेचांदी, कडुमाटी,) भभोड़ी (कुकरमुत्ता) आदि बहुतायत में मिलते थे। अब इन नये बसे गांव में जीने का कोई सहारा नहीं होने के कारण महिलाओं को सिरगटठा (जलाऊ लकड़ी) बेचने का काम करना पड़ता है।

विस्थापन के समय यह दलील दी जाती है कि बच्चों का भविष्य बेहतर होगा। नई धांई मे एक ही कक्षा में पांच कक्षाओं के बच्चे ठुंसे हैं। मैले-कुचेले, फटे-पुराने कपड़े पहने आपस में बतिया रहे हैं। नये बसे गांव धांई के कई-कई चित्र हमारे सामने आते हैं। बच्चों के माता-पिता रोजगार के लिए सुबह ही कहीं चले जाते हैं। बच्चे अपने जंगल को याद कर उदास हो जाते हैं।

यही कहानी हर गांव की है। डोबझिरना की कहानी तो और भी दुखदायी है। विस्थापन कितनी उलझन भरी प्रकि्रया है कि यह अपने रिश्तेदारों और मिलकर रहने वाले लोगों को आपसी अलगाव पैदा कर रही है। बोरी अभयारण्य के गांव धांई के लोगों को बसाने के लिए पहले से बसे डोबझिरना के लोगों को जमीन से बेदखल कर दिया गया। जिस जंगल को बचाने के लिए आदिवासियों का विस्थापन किया गया उसी जंगल के हजारों पेड़ काट-काटकर नये गांवों को बसाया गया। जंगल काटने के पीछे व्यवस्था के छोटे बडे़ लोगों के अपने-अपने हितों की कहानी अलग से है।

"बचपन की बहुत सी यादें हैं। इस जंगल के माहुल के फल खाते थे। अचार, तेंदू, महुआ खाते थे। नदी में कूद-कूदकर नहाते थे। वहां ठंडा वातावरण रहता था। पेड़ों की छांव में खेलते थे। लेकिन अब हमारी पूरी जिंदगी बदल गई है। सिरगटठा बेचने के अलावा दूसरा कोई काम नहीं है। न हम ढंग से पढ़े और न ही कभी मौका मिला।"
यह कहना है इंदिरा नगर के जबरसिंह का। सतपुड़ा राष्ट्रीय उधान बनते समय इसका गांव नीमघान को विस्थापित कर दिया गया था।

इंदिरा नगर में बसे लोगों का कहना है कि न तो उन्हें कोई मुआवजा मिला न जमीन। मकान बनाने के लिए इंदिरा आवास योजना के अंतर्गत 1500 मिले, शायद इसी कारण इंदिरा  नगर नाम पड़ गया था।
इसी तरह के अनेक गांव हैं। बाबा मायाराम काजरी-रोरीघाट, नयाखेड़ा, सांडिया, छींदापानी, गाजनिया बेड़ा, रांईखेड़ा आंजनखेड़ा अनेक गांव ले चलते हैं। इन गांवों की अपनी -अपनी दर्द भरी कहानी है जिसे गांव के लोग और बच्चे अपने-अपने तरीके से सुनाते हैं।

 हम शहरों में रहने वाले लोग आदिवासियों के दुख दर्द हैरानी से सुनते रहते हैं। शहरों में अतिक्रमण हटाने वाला शासन-प्रशासन शहरी लोगों से अनुनय विनयं किया करते रहता है। शहर की सड़कें सामने वालों का रौब देखकर खुद अपना मार्ग बदल लेती हैं। कैसे एक देश में सरकार के दो-दो कानून चलते हैं। जंगल में बसा आदिवासियों का एक छोटा सा गांव इसलिए उजाड़ दिया जाता है कि देश का विकास करना है और पर्यावरण को बचाना है। वहीं दूसरी ओर देष की सरकारें बड़े से छोटे षहरों में बिना अनुमति बनाई गई गैरकानूनी कालोनियों को कानूनी मान्यता दे देती हैं। एक देश का एक कानून उसके नागरिकों के लिए अलग-अलग तरह से लागू होता है। समझ में नहीं आता है कि जंगली कानून कहां चल रहा है? जंगल में या शहरों में? इस पुस्तक में तवा के मछुआरों की कहानी मालिक से वापिस चोर शीर्षक से दी गई है जिससे सरकार के गलत काम करने का तरीका हम देखते हैं। इसी तरह विस्थापन के डर से सहमी हैं जंगल की बेटियां, आदिवासी छात्राओं की दर्द भरी कहानी है।

बाबा मायाराम की लगभग 70 पृष्ठों की यह पुस्तक हमारा परिचय प्रशासनिक भेदभाव और राजनीतिक उदासी की दुनिया से कराती है। कसाईघर को ले जाये जाने वाले जानवरों की तरह आदिवासियों को मौत के खूंटों से बांध दिया जाता है। बाबा मायाराम की पुस्तक नगर केंदि्रत सोच पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह लगाती है। इस पुस्तक को पढ़ते हुए लगता है कि हम न जाने दुनिया के किस कोने की दुनिया की बातें पढ़ रहे हैं। हमारी  व्यवस्था के एक अमानवीय चेहरे की यह कहानियां यह भी बताती हैं कि हमारा आंचल भी कितना मैला है।

(साप्ताहिक नगरकथा, 23 दिसंबर, इटारसी से प्रकाशित)

Friday, November 30, 2012

अठखेलियां करती मनोरम नर्मदा

नर्मदा जाने का मौका तलाशता रहता हूं।  भाई दूज पर जब बहन के घर नरसिंहपुर गया तो फिर संयोग बन गया। बहन ने कहा -इस बार बरमान घाट की बजाय चिनकी घाट चलेंगे। वो ज्यादा अच्छा है।
हम आॅटो से जाने तैयार हो गए। छीगरी नदी का पुल पार कर जब गांधी प्रतिमा से आॅटो मुडा तो वह रास्ता जाना-पहचाना था। यहीं बरसों पहले गिरिराज स्कूल में एक वर्ष पढ़ाई की थी। रोज पैदल आना-जाना होता था।
सड़क के दोनों ओर खेतों में किसान बोउनी कर रहे थे। हरे चने के पौधे मिट्टी के ढेलों के बीच से ऊपर झांक रहे थे। घूरपुर के मोड़ के आसपास एक खेत में मेरी निगाह उस खेत पर पड़ी जिसमें ज्वार के भुट्टे भरे दानों से लदे लटक रहे थे। बिल्कुल मोतियों की तरह दिख रहे थे। उन्हें जी भरके देख लेने की चाह अधूरी रह गई, क्योंकि हमारा आॅटो सड़क पर दौड़ रहा था।
 चलचित्र की भांति पेड़, पौधे, गाय, बैल, गांव और खेत, स्त्री, पुरुष और बच्चे छूटते जा रहे थे। गांवों के गोबर से लिपे-पुते मकान और रंगोली आकर्षित कर रहे थे। कहीं-कहीं सजी -धजी दुकानें, मोटरसाइकिलों पर सवार युवा दिखलाई पड़ रहे थे। शेढ नदी में पानी खूब था,  हालांकि काई से पट गई है। फिर भी पुल से गुजरते हुए मनोरम लगी।
रास्ते में कुछ ग्रामीण महिलाएं भी मिलीं जो पैदल नर्मदा स्नान करने जा रही थीं। दूर-दूर से निजी वाहनों से लोग परिवार समेत पहुंच रहे थे। मवेशी भी पीने के लिए जा रहे थे।
जब हम नर्मदा घाट पर पहुंचे तब दोपहर हो चुकी थी। चाैड़ा पाट, विशाल चट्टानें, उन पर से उफनती अठखेलियां करती सौंदर्य से भरपूर नर्मदा। कल-कल, छल-छल की खनकती आवाज। दूर सामने पहाड़ी और हरा-भरा जंगल। बड़ा ही मनमोहक दृष्य। निहारते ही रहो।
स्त्री, पुरुष, बच्चे स्नान कर रहे हैं। मछुआरे  छोटी-छोटी डोंगियों (नावों) में बैठकर मछली पकड़ रहे हैं। डोगियां पानी में चलती अच्छी लग रही हैं। श्रद्धालु अगर नारियल फोड़ते तो बच्चे प्रसाद के लिए लपक पड़ते।
भोजन-पानी की तलाष में इधर-उधर घूमते-घामते कौव्वों का एक दल पहुंचा। मैं जिस पत्थर पर बैठा था, उसके नजदीक ही वे अपनी चोंच से पानी में कुछ ढूंढने लगे। मैंने बहुत दिन बाद कौव्वों को देखा और वो भी इतने पास से। अब वे दिखते भी नहीं है।
अब बहन स्नान और पूजा कर बाटी-भर्ता बनाने की तैयारी करने लगी। उसने कंडों (गोबर के उपले) की अंगीठी लगा उसे सुलगा दिया। धुआं उठने लगा। गोबर के उपलों की गंध नथुनों में भरने लगी। जलती अंगीठी में भटा, टमाटर और प्याज भुंजने के लिए डाल दिए। इधर तेज गति से आटा गूंथकर गोल-गोल बाटियां बनाई जाने लगी।
अब कंडे जल चुके हैं उनकी राख को समतल कर बाटियां सिंकने डाल दी गई हैं। बहन की मदद के लिए मैं आ गया। बाटियां उलटाने-पुलटाने में मदद की। इसमें चूक हुई बाटियां जल जाएंगी। यानी नजर हटीं तो दुर्घटना घटी। जलते अंगारे में एक बार मेरी बाएं हाथ की अंगुली जल गई। उसका निशान अब भी है।
अब बाटियां सिक चुकी है। बहन ने उन्हें कपड़े से खुड़-खुडाकर (साफ कर) घी लगाया। भर्ता को फ्राई करने के लिए ईंट-पत्थर का चूल्हा बनाया। सूखी लकड़ियां बीनकर आग सुलगाई।
अब तक पेट में चूहे दौड़ रहे थे। स्नान कर सब लोग आ गए। खकरा (पलाश) के हरे पत्तों पर भर्ता, बाटी और सलाद को परोसा जा चुका था। पास ही एक कुत्ता आकर बैठ गया, जिसके लिए बहन ने दो बाटियां अलग से सेकी थी।
लंबे अरसे बाद नर्मदा तट पर छककर स्वादिष्ट भोजन किया। नर्मदा की गोद में हमेशा ही मां का दुलार मिलता रहा है। आनंददायी यात्रा हो गई। अब लौटने की बेला हो गई। हम घाट के चढ़ाव के कारण उपर तक पैदल गए। देखते हैं कि वह कुत्ता भी हमारे पीछे पीछे विदा करने आ गया, जिसे बहन ने बाटियां खिलाई थी। जब तक हम आॅटो न बैठ गए, वह खड़ा रहा। मैं उसे तब तक देखता रहा जब तक वह आंखों से ओझल न हो गया।
लेकिन मेरा आनंद तब काफूर हो गया जब मैंने नर्मदा की हालत पर विचार किया। शहरीकरण, औद्योगीकरण और नए पावर प्लांटों के कारण नर्मदा में प्रदूषण बढ़ता ही जा रहा है। बड़े बांध बनाकर उसकी अविरल धारा को पहले ही अवरूद्ध कर दिया गया है। उसकी सभी सहायक नदियां धीरे-धीरे दम तोड़ रही हैं। सवाल यह है कि नर्मदा क्या अक्षुण्ण रह पाएगी?

Sunday, November 11, 2012

देनवा के किनारे

जब हमारी गाड़ी हरे-भरे जंगल के बीच से गुजर रही थी तो दूर-दूर तक खंबे की तरह खड़े पेड़ों को देखकर दिल उछल-उछल पड़ रहा था  । चारों तरफ शांत  वातावरण, ठंडी हवा, रंग-बिरंगे पक्षी और गाय-बैलों को टिटकारते चरवाहे।

होशगाबाद जिले में दक्षिण में पूर्व से पशिचम तक सतपुड़ा की लम्बवत की खूबसूरत पहाडि़यां हैं। देनवा में दूर-दूर तक नीला पानी। यानी जहां जहां तक नजरें जाती, पानी का संसार। उधर गहरे पानी में लहरें उठती दिखतीं और मेरे अंदर भी। यहां तवा बांध की ठेल थी।

हम सोहागपुर की जंगल पटटी के स्कूल देखने जा रहे थे। कल हम मटकुली के आसपास वनांचल में गए थे। यह दौरा एकलव्य संस्था के द्वारा सतपुड़ा टाइगर रिजर्व के क्षेत्र के स्कूलों का जायजा लेने के लिए किया गया था। आज के दौरे में विकासखंड शिक्षा अधिकारी तिवारी जी भी थे। एकलव्य पिपरिया के गोपाल भार्इ और कमलेश भार्गव तो थे ही।

पहला स्कूल मगरिया का देखा। यहां एक स्वयंसेवी संस्था ने शेक्षणिक सामग्री और पाठयक्रम को सरल ढंग से पढ़ाने के लिए प्रोजेक्टर दिए हैं। खापा, घोघरी, पाठर्इ,टेकापार, उरदोन और सेहरा के स्कूलों का भ्रमण किया।
स्कूल में एक तो शिक्षकों की कमी दिखार्इ दी और जो हैं, वे अन्य कामों में संलग्न रहते हैं। कल सेमरी में कोर्इ शिक्षकों की बैठक थी जिसमें शिक्षक गए थे। जब शिक्षक नहीं है, या जो वे अतिथि शिक्षक हैं,क्या वे प्रशिक्षित हैं, यह सवाल है।

यह अत्यंत निर्धन इलाका है। यहां गोंड और कोरकू आदिवासी निवास करते हैं। देनवा नदी के किनारे गांव बसे हैं। इनमें से ज्यादातर तवा बांध से विस्थापित हैं। तवा और  देनवा के संगम पर बांद्राभान में तवा बांध बना है।
यहां के षिक्षक ने बताया कि यहां के आदिवासी बहुत सीधे-सादे और मददगार हैं। पर हैं बहुत गरीब। गरीब महिलाएं मूढ़गटठा (जलाऊ लकड़ी) बेचकर बच्चों का पेट पालती हैं। उन्हें मूढगटठा के लिए दो दिन श्रम करना पड़ता है। एक दिन वे जंगल जाती हैं, सूखी लकडि़यां बीनती हैं और गटठा बनाकर रखकर आ जाती हैं।

फिर दूसरे दिन सुवह-सबेरे जंगल जाती हैं, उसे लेकर नजदीक के कस्बे सोहागपुर जाती हैं, बेचती है और उन पैसों से राशन व जरूरत की चीजें लाती हैं। मूढगटठा की कीमत 100 रू से लेकर 150 रू. तक होती है।
खापा में स्कूल देखने के बाद गांव घूमने निकल गए। वहां कुछ घरों के आंगन में धान की दावन (धान की बालियों से दाना निकालने के लिए बैलों को घुमाया जाता है) की जा रही थी, जो लंबे अरसे बाद मैंने देखी। बहुत अच्छा लगा। बचपन में अपने गांव में खूब देखते थे।

जब टेक्टर व हार्वेस्टर नहीं थे तब ऐसे ही सब खेती के काम हाथ से किए जाते थे। दावन से धान अलग और उसके ठंडल जिसे पुआल कहते थे, वो अलग। धान से दाने निकालकर उन्हें ओखली में कूटते हैं। सूपा में फटखते हैं जिससे दाना और उसका कोड़ा भूसा अलग  किया जाता है। फिर मिटटी की हांडी में भात पकता था जिसकी खदबद सुनकर ही भूखे बच्चों की आंखें चमक जाती थी।

गोंड आदिवासियों के घरों में लकड़ी से बनी दीवारें भी देखीं। इसके पहले खेतों में बागड़ देखी जो लकड़ी के खंबों व कंटीले वृक्षों की टहनियों से बनी थी। क्योंकि यहां जंगली जानवर फसलों को बहुत नुकसान पहुंचाते हैं।
जंगली सुअर, हिरण, चीतल, सांभर, नीलगाय और बंदर फसलों को चौपट करते हैं। इसलिए खेतों में बागड़ बनार्इ जाती है। मचान बनाए जाते हैं, जिस पर बैठकर खेती की रखवाली की जाती है। जंगलों से भोजन की तलाश में ये जानवर खेतों और मैदानी क्षेत्रों की ओर आ जाते हैं। किसान परेशान हैं।

खेतों में बक्खर चलाते किसान और उनके संग देती महिलाएं भी दिखी। खेती में महिलाओं का योगदान महत्वपूर्ण है। वे बीज भंडारण से लेकर निंदार्इ, गुडार्इ, फसल कटार्इ जैसे कर्इ काम करती हैं।

गांव के कुछ स्कूलों में शैक्षणिक सामग्री की कमी तो थी ही, कहीं टाटपटटी की व्यवस्था भी नहीं थी।   एक स्कूल में तो  एक संकरे कमरे में लगा था, जिसमें सभी प्राथमिक कक्षा के बच्चे एक साथ बैठे थे। बाहर दरी पर आंगनबाड़ी लगी थी जिसमें तीन चार छोटी बचिचयां बैठी थी।

अब शा म हो गर्इ थी। जंगल में संध्या के पहले लोग घरों को लौट आते हैं। जंगल में जानवरों का भय तो रहता ही है। हमारी गाड़ी अब उची-नीची सड़क से पक्की सड़क पर आ गर्इ थी। आते ही फर्राटेदार एक पीली गाड़ी दिखी जो शायद पर्यटन के लिए मढर्इ जा रही थी। जंगली जानवरों और प्राकृतिक सौंदर्य देखने।

सोहागपुर के नजदीक लालिमा लिए सूरज डूबने को हो रहा था। सामने से साइकिलों से स्कूली लड़कियों की टोली दिखार्इ दी जिसे देख बहुत ही अच्छा लगा। यह बदलाव का प्रतीक तो है ही, लड़कियों की आजादी का प्रतीक भी है।

एक समय ऐसा था कि लड़कियों का घर से निकलना मुशिकल था। अब वे स्कूल जा रही हैं। कालेज जा रही हैं। सरकार की लड़कियों को साइकिल देने की योजना की जितनी तारीफ की जाए उतनी कम है। घर आते आते मेरे मन में एक तरफ तो अपूर्व प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर क्षेत्र के भ्रमण का आनंद था, वहीं दूसरी तरफ वहां के लोगों की सिथति, अभाव और कष्ट देखकर वह आनंद कम हो गया लगता है।