Sunday, November 14, 2010

नर्मदा से साक्षात्कार- छोटे धुंआधार में

जब कभी मौका मिलता है नर्मदा चला जाता हूं। इस बार दीवाली के बाद भाई दूज पर नरसिंहपुर बहन के घर गया। वहां से चिनकी घाट के नीचे घूरपुर गांव के पास छोटा धुंआधार गए। साथ में बेटा और भांजा था। वैसे तो नरसिंहपुर से 20-25 किलोमीटर की दूरी है पर पक्की सड़क है पर आगे का रास्ता कठिन है। शेर नदी के कुछ आगे से बाएं की तरफ मुड़ना पड़ता है। खेत हैं और उनके बीच पगडंडी।

अरहर, ज्वार के हरे-भरे खेत मन मोह रहे थे। अरहर के खेत के बीच से मोटर साइकिल जाते हुए ऐसा लग रहा था जैसे हम किसी गुफा में प्रवेश कर रहे हैं। अरहर के उंचे पौधे पीले फूलों और फल्लियों से लगे थे। उनके बीच से गुजरते हम उनसे टकरा रहे थे या कहें उनके स्पर्श से रोमांच से भर रहे थे। बेटा बहुत हथेलियों से उन्हें स्पर्श कर उछल-उछल पड़ रहा था। भांजा गाड़ी चला रहा था। और में ऐसे खेतों को देखकर धन्य हो रहा था। क्योंकि खेतों में ही असली उत्पादन होता है। एक बीज लगाओ और सैकड़ों बीज होते हैं। यह नर्मदा कछार का इलाका अरहर के लिए प्रसिद्ध है।

आगे बढ़े तो अरहर के साथ ज्वार के भुटटे दानों से लदे लटक रहे थे। ये दाने मोतियों जैसे चमक रहे थे। चिड़िया दाना चुगने के लिए इधर-उधर फुदक रही थी। हालांकि यहां की खेती असिंचित है, पर मिट्टी बहुत उपजाऊ है। कुछ खेतों में बोउनी की तैयारी की जा रही थी। जबकि कुछ खेतों में किसान चना वगैरह की बोउनी कर रहे थे।

अब हम पूछते-पाछते छोटे धुंआधार पहुंच चुके थे। सुबह के करीब 10 बजे होंगे। छोटी हरी-भरी पहाड़ी और बड़ी नीली चट्टानें। देखते ही हम उछल पड़े। बहुत मजा आ गया। चट्टानों और नुकेले पत्थरों के बीच नर्मदा वेग से उछलती-कूदती बह रही हैं। चट्टानों से नर्मदा मचलती-खेलती आगे बढ रही है। घूरपुर घाट पर नर्मदा तट चौड़ा है जो यहां आकर बहुत संकरा हो गया है। यहां नर्मदा की एक अनुपम छटा और सौंदर्य है। जैसे वह शांत वातावरण और एकांत में अपने ही अंदाज में मचल रही हो।

जबलपुर के पास भेडाघाट धुआंधार में जहां ऊपर से खांई मे गेंद की भांति टप्पा खाकर गिरती है और उछलती है। जबकि यहां विशाल तट से एकदम संकरी होती हुई चट्टानों के बीच तेज गति मचलती आगे बढ़ती हैं। सौंदर्य ऐसा बिखेरती है कि देखते ही बनता है। मेरे बेटे ने कई फोटो लिए। चूंकि उसकी चित्रकारी और फोटोग्राफी विशेष रूचि है, इसलिए वह कभी इस चट्टान पर कभी उस चट्टान पर चढ़कर अलग-अलग ढंग से नर्मदा के रूप कैमरे में कैद कर रहा था।

मैं नर्मदा को एकटक निहारता रहा। नर्मदा को कई जगह कई रूपों में देख चुका हूं। जबलपुर का ग्वारी घाट, भेड़ाघाट, बरमान, केतोघान, सांडिया, महेश्वर, ओंकारेश्वर और खलघाट जैसे कई स्थानों में नर्मदा के दर्शन किए हैं। नर्मदा एक नदी का नाम नहीं है जो अमरकंटक से निकलकर अरब सागर में मिलती है। बल्कि वह नर्मदा किनारे के लोगों के लिए जीवन है। प्रेरणा स्त्रोत है। इसके बहाव के साथ-साथ ही संस्कृति और सभ्यता पल्लवित और पुष्पित हुई है। मेखल पर्वत से उद्गमित होकर यह नाचती-गाती, चमकती छलांग लगाती हुई आगे बढ़ती है। नर्मदा किनारे के लोग अपने जीवन में नर्मदा के पास अपनी कामना लेकर आते हैं। वह जीवनदायिनी है।

अब लौटने का समय हो गया है। घूरपुर घाट पर स्नान किया। यहां कुछ महिलाएं और बच्चे स्नान कर रहे हैं। मछुआरे जाल डालकर बैठे हैं। मैं सोच रहा था क्या भविष्य हम नर्मदा के इस सौंदर्य को बचा पाएंगे। हमने इस पर पहले ही बड़े-बड़े बांध बना लिए है। स्वाभाविक प्रवाह को रोक दिया है। अब नर्मदा के किनारे कोयला बिजलीघर बनाने की योजनाएं आ रही हैं।

4 comments:

  1. बहुत-बहुत धन्यवाद नर्मदा मैया के दर्शन करवाने के लिए और इस छोटे धुंआधार की जानकारी देने के लिए, अगली बार जब भी नरसिंगपुर जायेंगे छोटे धुंआधार अवश्य जायंगे...

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  2. नरेंद्र मौर्यNovember 15, 2010 at 1:24 AM

    बाबा, नर्मदा की रिपोर्टिंग गजब की है। पढ़कर नर्मदा में लोटने का मन करता है। लंबा अरसा हो गया नर्मदा से मिले हुए। आपकी रिपोर्टिंग ने नर्मदा की यादों को ताजा कर दिया। आभार।

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  3. हर हर हर नर्मदे। नर्मदे हर।

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  4. बाबा भाई
    नर्मदा के यात्रा करने के लिए शुक्रिया. मुझे लग रहा था की बेगड़ जी के बाद क्या कोई उतना सरल और ग्राह्य लेखन कर पायेगा. पर यह पोस्ट पड़ने के बाद इस चिंता से दूर हुआ जा सकता है. सरल लेखन का सौंदर्य आपकी पोस्ट में जगह-जगह हिलोर लेता है. विकल्प की फोटोग्राफी भी निखर रही दिन ब दिन. मेरी शुभकामना उसके लिए

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