Showing posts with label Education. Show all posts
Showing posts with label Education. Show all posts

Saturday, September 14, 2013

विज्ञान और जनांदोलन को जोड़ने वाली शख्सियत

जब मैं पिछले साल विनोद रैना जी से मिला था और उनके साथ में पचमढ़ी गया था तब मुझे जरा भी भान नहीं था कि यह हमारी आखिरी मुलाकात होगी। उन्होंने मुझसे कहा था कि अब इंटरनेट के माध्यम से मिलते रहेंगे।

परसों जब 12 सितंबर को भोपाल से सचिन जैन का एसएमएस मिला कि विनोद रैना जी नहीं रहे तो विश्वास ही नहीं हुआ। उनका दिल्ली में उसी दिन (12 सितंबर की) शाम को निधन हो गया। हालांकि कुछ दिन पहले एकलव्य के साथी गोपाल राठी ने खबर दी थी कि विनोद भार्इ कैंसर से पीडि़त हैं।

आज वे नहीं हैं तब उनके बारे में सोचने पर मेरे मानस पटल पर उनकी कर्इ छवियां बन-बिगड़ रही हैं। लेकिन जो छवि उनकी पहचान  थी वो उनकी घनी दाढ़ी, गोल चश्मा और सदाबहार मुस्कान। और गर्मजोशी से मिलना।

मेरा उनसे काफी पुराना परिचय है। करीब 30-32 साल पुराना। जब वे होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम के सिलसिले में किशोर भारती संस्था आया करते थे।

उस समय बनखेड़ी से किशोर भारती तक पहुंचने के लिए कोर्इ वाहन नहीं चलते थे तो बनखेड़ी से साइकिल से जाना पड़ता था। अक्सर विनोद भार्इ भी साइकिल से आते थे।

उन दिनों होशंगाबाद विज्ञान का पाठयक्रम विकसित हो रहा था और विनोद भार्इ जैसे शिक्षाविद  और वैज्ञानिक उसे विकसित करने में योगदान दे रहे थे। अक्सर जब मैं वहां जाता था तब वहां देखता था कि कोसम वृक्षों के नीचे बैठकर मीटिंग हो रही है। शिक्षक, शिक्षाविद और विभिन्न विषयों के जानकर विज्ञान के प्रयोग करते रहते थे। उनमें से एक विनोद रैना भी थे।

बाद में जब एकलव्य बना तो विनोद रैना ही उसे बनाने और चलाने वालों में प्रमुख थे। उन्होंने भले ही दिल्ली विष्वविधालय से षिक्षा हासिल की हो लेकिन सही मायनों में उनकी कर्मस्थली मध्यप्रदेश ही बना रहा।

वैज्ञानिक और शिक्षाविद होने के साथ-साथ उनकी पर्यावरण व जनांदोलनों में गहरी रूचि थे। उनका सामाजिक सरोकार से जुड़ाव अंत तक बना रहा। यधपि मैंने उनके साथ औपचारिक रूप से काम नहीं किया लेकिन उनका स्नेह व प्रोत्साहन हमेशा मिलता रहा।

छात्र जीवन में मेरा पहला लेख एकलव्य से प्रकाशित बाल पत्रिका चकमक के पहले अंक में उन्होंने ही छापा था। यह 1985 की बात है। जबकि उन्हें उस समय के हमारे शिक्षकों की नाराजगी का सामना करना पड़ा था।

वे हमेशा जनांदोलनों में विज्ञान की भूमिका देखते थे। जहां भी जनांदोलन उभरते थे, वे अपना समर्थन देते। विनोद भार्इ की मौजूदगी ऐसे आंदोलनों को एक अलग आयाम देती थी। वे मुझे पिछले 25 सालों में कर्इ जगह जनांदोलन में टकराए।

चाहे वह बड़े बांधों के खिलाफ नर्मदा बचाओ का आंदोलन हो या सुदूर छत्तीसगढ़ में लोहे की खदानों के मजदूरों का आंदोलन, चाहे वह भोपाल के गैस पीडि़तों का आंदोलन हो या फिर होशंगाबाद के विस्थापित आदिवासियों का आंदोलन। वे सभी जगह सक्रिय रहे। वे उनमें शामिल तो होते ही थे बल्कि शोध व जानकारी एकत्र कर आंदोलनों को मजबूती प्रदान करते थे। चाहे वह बड़े बांधों के खिलाफ नर्मदा बचाओ का आंदोलन हो या सुदूर छत्तीसगढ़ में लोहे की खदानों के मजदूरों का आंदोलन, चाहे वह भोपाल के गैस पीडि़तों का आंदोलन हो या फिर होशंगाबाद के विस्थापित आदिवासियों का आंदोलन। वे सभी जगह सक्रिय रहे। वे उनमें शामिल तो होते ही थे बल्कि शोध व जानकारी एकत्र कर आंदोलनों को मजबूती प्रदान करते थे। वे किसी भी मुददे की तह में जाकर उसे समझते और फिर जनता के सामने तार्किक ढंग से अपने अनूठे अंदाज में रखते थे, जो कि एक वैज्ञानिक की शैली  होती है।

विनोद रैना और एकलव्य संस्था का योगदान अमूल्य है क्योंकि उन्होंने विज्ञान को एक प्रयोगशाला से निकालकर एक सोच के रूप में पेश किया। सवाल उठाने और जिज्ञासा को किसी भी खोज और प्रयोग के लिए आवश्यक बताया। मौजूदा शिक्षा जो केवल रटकर परीक्षा में उगल देने की कला है उसे समझने व सीखने का माध्यम बताया।

 शिक्षकों और छात्रों के लिए विज्ञान को एक दिलचस्प विषय बनाया। बाल विज्ञान के छात्रों व षिक्षकों को खेत-खलिहानों में पतितयां पहचानने, प्रयोग के लिए मिटटी के नमूने एकत्र करते व खरपतवारों की पहचान करते देखा जा सकता था। ऐसा अदभुत दृश्य मेरे आंखों के सामने तैर रहा है क्योंकि मुझे भी इस विज्ञान को पढ़ने का मौका मिला है। हालांकि सरकार ने बेतुके आरोप लगाकर उस लोकप्रिय प्रयोग को बंद करवा दिया। पर इससे उसका महत्व किसी भी रूप में कम नहीं होता।

एकलव्य के होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम की देश-दुनिया में सराहना हुर्इ। भारत की शिक्षा में यह अनूठा प्रयोग सरकारी स्कूलों में 30 साल तक चला जिससे विनोद रैना न केवल जुडे़ रहे बलिक उनकी इसमें प्रमुख भूमिका रही।

बाद में वे पीपुल्स साइंस मूवमेंट, भारत ज्ञान विज्ञान समिति, वर्ल्ड सोशल फोरम और अनेक जनांदोलनों से जुड़े रहे। विनोद भार्इ की कमी हर जगह बनी रहेगी। लेकिन उनका काम और उनकी वैज्ञानिक सोच सदैव रास्ता दिखाती रहेगी।

संयोग है कि मैं उसी गांव का रहने वाला हूं, जहां किशोर भारती संस्था थी। होशंगाबाद के इसी गांव में आकर विनोद भार्इ ने एक अलग राह पकड़ ली जो दिल्ली जैसे महानगरों में न जाकर मध्यप्रदेश के दूरदराज के गांवों तक जाती थी। उन्होंने मध्यप्रदेश को अपना कार्यक्षेत्र  बनाया और यहां के स्कूलों में शिक्षा का काम किया जो मिसाल बन गया। ऐसे अनूठे व्यकितत्व के धनी विनोद भार्इ सदा हमारे दिलों में जिंदा रहेंगे।

Thursday, October 25, 2012

तोत्तो चान


तोत्तो चान बीस साल बाद फिर पढ़ रहा हूं। यह एक ऐसी जापानी लड़की की कहानी है कि जिसका स्कूल एक रेल के डिब्बे में लगता है। तोत्तो चान को उसकी अजीबोगरीब हरकतों व बाल सुलभ रूचियों की वजह से उसके पहले वाले स्कूल से निकाल दिया गया था। उसके मां-बाप को यह चिंता सताए जा रही थी कि अब कैसे पढेगी?


तभी उन्हें इस नए स्कूल का पता चला। तोत्तो चान अपनी मां के साथ इस स्कूल में दाखिले के लिए तो डरी-सहमी थी लेकिन वहां का माहौल देखते उसका डर धीरे-धीरे खुषी में बदल गया। उसे यह जानकर हैरानी हुर्इ कि उसका स्कूल एक रेल डिब्बे में है, किसी बिलिडंग में नहीं।

तोत्तो ने अपनी मां से सवाल पूछा कि हेडमास्टर हैं या स्टेशन मास्टर। तोत्तो ने ही जवाब दिया कि जब वे इतने रेल डिब्बों के मालिक हैं तो स्टेशन मास्टर हुए न।

हेडमास्टर जी ने तोत्तो की मां से कहा आप जा सकती है, मैं आपकी बेटी से बात करना चाहता हूं। पहले तोत्तो को लगा कि मैं क्या बात करूंगी। जब हेडमास्टर जी ने कहा कि  अब तुम अपने बारे में मुझे बताओ। कुछ भी, जो तुम बताना चाहो, सब कुछ। तोत्तो ने कहा जो मुझे अच्छा लगे बताउ। उसने जो कुछ कहा वह अनगढ़ था। कभी वह जिस रेलगाड़ी से आर्इ थी उसके बारे में बताती। कभी अपने पुराने स्कूल की सुंदर शिक्षिका के बारे में तो कभी यह कि अबाबील का घोंसला कैसा है?

पापा और मम्मी कैसे हैं? मास्टर जी पूछते जाते, फिर। वह बताती जाती। फिर उसने अपनी सुंदर फ्राक के बारे में बताया। जब खूब सोचने पर भी कुछ नहीं बोली तब मास्टर जी ने कहा तोत्तो चान अब तुम इस स्कूल की छात्रा हो।

अब स्कूल वह बड़े मजे से जाने लगी। दोपहर भोजन के बाद सैर करने जाती थी, यह उसे नर्इ चीज लगी। सैर करने जाते समय ही शिक्षक ज्ञान-विज्ञान की छोटी-छोटी चीजें बताते। फूल कैसे बनता है, स्त्रीकेसर व पुंकेसर क्या होता है।

यह किताब काल्पनिक नहीं है, बलिक ऐसा स्कूल सचमुच था, जिसे कोबाया ने बड़े जतन से बनाया था। जापान में तोत्तो अब एक मशहूर दूरदर्षन कलाकार के रूप में जानी जाती है, जिन्होंने यह किताब लिखी है। यह किताब बेस्ट सेलर है। अगली किस्त में तोत्तो के बारे में और जानिए...

Saturday, January 22, 2011

गांव की खबरों से जुड़ते बच्चे

इस वर्ष खाली रह गया तालाब, यह शीर्षक था एक दीवार अखबार का, जो सतपुड़ा पर्वतीय क्षेत्र के एक छोटे से गांव के स्कूली बच्चों ने तैयार किया था। रंग-बिरंगी स्याही से हस्तलिखित अखबारों को जब मैंने देखा तो देखता ही रह गया। हरे-भरे खेत, जंगल, मोर, शेर, नदी, नहर और तालाब के सुंदर चित्रों ने मन मोह लिया। यह दीवार अखबार बच्चों ने तीन दिनी कार्यशाला के बाद बनाए थे।


2 से 4 दिसंबर तक चली मीडिया कार्यशाला के आखिरी दिन बच्चों की टोलियों ने 9 दीवार अखबार बनाए। इसके पहले उन्होंने अपने आसपास के मुद्दों की पहचान और लेखन की बारीकियों को जानने की कोशिश की। मेरी स्कूली बच्चों के साथ यह दूसरी कार्यशाला थी। ग्रामीण पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के लिए कार्यशालाओं का पूर्व अनुभव था।

बच्चों ने खबर बनाने से लेकर संपादन तक सभी काम खुद किए। संपादक के नाम चिट्ठी और साक्षात्कार की सावधानियों को समझा। कार्यशाला में 6 वीं से लेकर 8 वीं तक के करीब 40 बच्चों ने भाग लिया। यह कार्यशाला मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में पिपरिया के पास समनापुर में हुई। यह कार्यशाला एकलव्य संस्था के सहयोग से की गई।

दूसरे दिन बच्चों की टोलियों ने गांव और खेत-खलिहान में जाकर ग्रामीणों से साक्षात्कार लिए। अपने ही बच्चों को नई भूमिका में देखकर ग्रामीणों को सुखद आश्चर्य हुआ। खेती-किसानी, जंगली जानवर, गांव के परंपरागत रोजगार, पशुपालन, बिजली-सड़क की दैनंदिन समस्याएं आदि विषयों पर जानकारी एकत्र की। एक टोली को गांव की कुछ महिलाओं के सवालों का भी सामना करना पड़ा, जो किसी पत्रकार के लिए आम बात है। लेकिन इन बच्चों के लिए यह नई और परेशानी की बात थी।

आम तौर पर स्कूलों मंे छुट्टी के लिए आवेदन पत्र और पत्र लेखन भी याद करवाया जाता है। लेकिन यहां बच्चों ने अपने मन से गांव की समस्याओं पर संपादक के नाम पत्र लिखे। यद्यपि उनकी भाषा में अनगढ़पन और अशुद्धियां थी लेकिन उनमें नयापन था। एक सपाट और सीधी सादी बात थी। उन्होंने बारिश से होने वाली अड़चनों और लड़कियों के लिए जरूरी हाईस्कूल की मांग को अपनी लेखनी का विषय बनाया। राहड (अरहर) दाल के कम उत्पादन के कारण गिनाए।

अगर हम भाषागत त्रुटियों को नजरअंदाज कर दें तो इन बच्चों की सोच और कल्पनाओं का दायरा बड़ा है। गांव से लेकर देश-दुनिया की समस्याओं को उन्होंने अपनी खबरों में जगह दी। अपने स्कूल के खेल मैदान के गड्ढे से लेकर बारिश कम होने जैसी खबरों को प्रमुखता दी। खेल मैदान की स्थानीय समस्या है तो बारिश कम होने का संबंध मौसम परिवर्तन से जोड़ा जा सकता है, जो दुनिया में चिंता का कारण बना हुआ है। दालों के महंगे दामों की चर्चा हो रही है। यह पूरा इलाका दालों के लिए प्रसिद्ध है। नर्मदा कछार की उपजाऊ मिट्टी में पैदा हुई तुअर की दालें मशहूर हैं। यहां बच्चों ने राहड (अरहर )में इल्ली और नगदी फसलों के कारण उसके रकबे में कमी की खबर को प्रमुखता दी।

जंगली सुअरों से फसलों का नुकसान, यह केवल एक गांव की नहीं बल्कि पूरे सतपुड़ा पर्वतीय क्षेत्र की समस्या है। शेर बचाने के लिए तो देश में काफी चिंता जताई जा रही है लेकिन जंगली जानवरों खासकर सुअरों से किसानों की फसलों को बचाने के लिए कोई आवाज नहीं है। जबकि इन क्षेत्रों में बहुत ही मामूली और गरीब किसान हैं। प्रकृति के नजदीक रहने वाले आदिवासी हैं, जो बहुत ही कम संसाधनों में अपना गुजारा करते हैं। लेकिन उनके जंगल से निस्तार पर कई तरह की रोक है।

स्कूली शिक्षा से बाहर देश के बहुत ही कम भाग्यवान बच्चे हैं जिन्हें जानने-सीखने का मौका मिलता है। मौजूदा शिक्षा सिर्फ परीक्षा में कंठस्थ करके उगल देने पर जोर देती है। ठूंस-ठूंस कर ज्ञान की घुट्टी पिलाने से बच्चे शिक्षा से जुड़ते नहीं है, उससे दूर छिटकते हैं। इसमें सोचने-समझने का मौका नहीं मिलता। अपने आसपास के परिवेश से जुड़ना और सीखना। नई-नई चीजों को देखना, उनका अहसास करना और अपने शब्दों में व्यक्त करना, यह भी शिक्षा का एक माध्यम है, ऐसी कोशिश करना फालतू माना जाता है। लेकिन वास्तव में यह भी शिक्षा का एक माध्यम है। इसका एक आयाम है किसी भी चीज को समग्रता में देखना। समाचार बनाने में खबर के सभी पहलुओं को शामिल किया जाता है, जिससे बच्चे किसी खबर के सभी पहलुओं से परिचित हो

छोटी उम्र में ही बच्चे बहुत कुछ सीखते-समझते हैं, यह सर्वज्ञात है। लेकिन यही कीमती समय उनका नीरस और उबाऊ शिक्षा में चले जाते हैं। अगर इस अवधि में उन्हें हम आसपास के वातावरण से जानने-सीखने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। प्रकृति को गुरू मानकर उससे सीखा जाए, और इनसे सीखकर उन्हें शब्दों में ढाला जाए तो बेहतर शिक्षा मिल पाएगी। शिक्षा का एक और एक माध्यम है स्कूली पाठ्यक्रम के अलावा कई तरह की किताबें। किताबों की सैर करना और उनमें गोतें लगाना, शिक्षाप्रद और आनंददायी होता है।

इसी प्रकार, लेखन एक रचनात्मक काम है। उससे बच्चों का भाषाई और लेखन कौशल विकसित होता है, जो शिक्षा का भी एक महत्वपूर्ण आयाम है। जिन बच्चों ने इस कार्यशाला में भाग लिया, उनकी भाषा और वाक्य विन्यास कमजोर था। इसके बावजूद उन्होंने खड़ी बोली में लिखा और जहां उन्हें वे शब्द नहीं मिले, स्थानीय बोली में वाक्य बनाएं। यही कार्यशाला की विशेषता थी। अगर इस तरह की गतिविधियां स्कूलों में और स्कूल के बाहर निरंतर की जाएं तो मौजूदा शिक्षा की स्थिति में सुधार होगा। और शिक्षा के प्रति बच्चों का उनका नजरिया भी बदलेगा। उन्हें पढ़ने में रूचि होगी और मजा भी आएगा।

Wednesday, May 12, 2010

मीडिया शिक्षा का अभिनव प्रयोग

दिव्या, जानकी, दीक्षा, मनीषा,रामकुमार, गोविंद आदि स्कूली बच्चे हाथ में पेन-कापीलिए साक्षात्कार ले रहे थे। डापका गांव के पूर्व सरपंच लक्ष्मण प्रसाद मेहरा और कोरकू  रानी रेवाबाई अपने ही गांव के बच्चों को नई भूमिका में देखकर भाव विह्वल हो गईं। बच्चे सवाल पर सवाल किए जा रहे थे और गांव के लोग उन्हें सुखद आश्चर्य से देख रहे थे। यहां चाहे घरों में काम करती महिलाएं हों या खेत जाने वाले किसान,  दूकान पर बैठे दुकानदार हों या स्कूल के शिक्षक सबसे बच्चों ने सबके साक्षात्कार लिए।  अलग-अलग टोलियों में विभक्त बच्चे पेशेवर पत्रकारों की तरह चर्चा कर रहे थे।

यह दृश्य था मध्यप्रदेश में होशंगाबाद जिले के पिपरिया विकासखंड के एक छोटे से गांव डापका का। यह गांव सतपुड़ा की घाटी की गोद में बसा है। यहां आदिवासी ज्यादा हैं। पिपरिया विकासखंड मुखयालय से यहां की दूरी लगभग १५ किलोमीटर है। यहां के बच्चे अखबार से ज्यादा परिचित नहीं हैं और न ही टेलीविजन पर समाचार सुनते हैं। गांव के लोगों की माली हालत अच्छी नहीं है। खेती-किसानी के अलावा वनोपज और जंगल से निस्तार होता है। कुछ लोग हम्माली के काम के लिए पिपरिया आते हैं।

इस गांव में हमने शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत एकलव्य संस्था के सहयोग से मीडिया कार्यशाला का आयोजन किया । स्कूली बच्चों के साथ मीडिया कार्यशाला का यह मेरा पहला प्रयोग था। इसके पहले मैं ग्रामीण पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ ऐसी कार्यशाला कर चुका हूं। कार्यशाला में माध्यमिक स्तर के ३५ बच्चे शामिल थे। यह कार्यशाला ७ मई से १० मई तक चली।

इस दौरान पहले दो दिनों में मीडिया के विभिन्न माध्यमों का बच्चों पर क्या असर होता है, खबर कैसे बनती है और उन्हें कैसे लिखा जाता है, इस पर चर्चा की गई।  संपादक के नाम पत्र और साक्षात्कार के लिए क्या-क्या तैयारी चाहिए, इस पर प्रकाश डाला गया और इसके अभ्यास किए गए। तीसरे दिन गांव का दौरा किया।   ग्रामीणों से कई मुद्‌दों पर बच्चों ने बातचीत की। जिसमें बिजली कटौती, पीने के पानी की समस्या, फसल की रखवाली, नरवाई (हारवेस्टर की कटाई के बाद गेहूं के ठंडलों में आग लगाई जाती है) से नुकसान, गांव का विकास कैसा होना चाहिए आदि मुद्‌दे शामिल थे। चौथे और अंतिम दिन इन मुद्‌दों पर चमत्कार, नजर, पहल, कोयल, हाथी, कबूतर, सोनपरी आदि दीवार अखबार तैयार किए गए।

बिजली कटौती से आटाचक्की नहीं चलती और आटा पिसाई नहीं हो पाती, यह बात समझी जा सकती है। लेकिन पड़ोसी के घर से आटा मांगकर रोटी बनाई जाती है, यह बहुत कम लोग जानते हैं। हमारे साथ आए कुछ शहरी मित्रों को यह जानकारी भी नई थी कि फसल को कैसे सुअरों से नुकसान होता है।  जबकि जंगल क्षेत्र में यह समस्या आम और विकट है। जंगली जानवर और खासतौर से सुअर उनकी गेहूं- चना की फसलों को बहुत नुकसान पहुंचाते हैं। इन सभी समस्याओं पर बच्चों ने न केवल इन पर समाचार बनाएं बल्कि सुअर की नकल उतार कर भी बताई। जिस दिन से यहां खेतों में गेहूं-चना का बीज बोया जाता है उसी दिन से रखवाली करनी पडती है। खेत में डेरा डालकर रहना पडता है। अन्यथा जंगली जानवर सुअर, हिरण आदि उनकी फसलों को चौपट कर देते हैं। यह वैसा ही है कि नजर हटी कि दुर्घटना घटी।


स्कूली बच्चों को मीडिया शिक्षा की जरूरत महसूस की जाती रही है।  मीडिया का उन पर कई तरह से असर देखा जा सकता है। नकारात्मक असर की  खबरें आती रहती हैं। उन पर सिनेमा, टेलीविजन, रेडिया और समाचार पत्रों का असर देखा जाता है। जिनमें से आक्रामक हिंसा, नकल, फैशान और उपभोक्ता संस्कृति की ओर रूझान प्रमुख है। लेकिन मीडिया का सकारात्मक असर भी हो सकता है। शॆक्षणिक और सृजनात्मक असर भी हो सकता है, इस पर कम ही ध्यान दिया जाता है। अपने अनुभव और अवलोकन को शब्दों में कैसे अभिव्यक्त कर सकते हैं यह कार्यशाला का एक उद्‌देशय था। एकलव्य के जुडे चंदन यादव ने लेखन को चित्र और कार्टून से जोड कर बच्चों को बताया। एकलव्य पिपरिया के गोपाल राठी, कमलेशा भार्गव और राकेशा कारपेंटर ने पूरी कार्यशाला का संयोजन किया और भोपाल से आईं दीपाली ने उपयोगी सुझाव दिए।

आम तौर पर मीडिया वन-वे दिखाई देता है। वह खबरें या कार्यक्रम देता है और हम उसे देखते हैं। चाहे फिल्मों हो, टेलीविजन हो, रेडियो हो और समाचार पत्र. हों, ये सभी माध्यम वन-वे ही हैं। इनमें दर्शाकों की भूमिका सिर्फ दर्शक तक है। जबकि चाहे मनोरंजन की बात हो या संवाद की, इनमें भागीदारी बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती थी। लेकिन बच्चों में यह दृ्‌ष्टि विकसित करना कि वे खबर के पीछे की खबर को जान सकें। उन पर बात कर सकें और उनमें आलोचनात्मक और विशलेषणात्मक क्षमता विकसित की जा सके। वे मीडिया की बारीकियां समझ सकें और उनमें लेखन कौशाल विकसित हो सके।

कार्यशाला में यह कोशिश की गई कि बच्चों से संवाद बनाया जाए और वे भी इस पूरी प्रक्रिया में शामिल हों और हम बहुत हद इसमें सफल भी हुए। आखिरी दिन यह कोशिश सफल हुई जब उन्होंने खुद अपनी-अपनी टोलियों में दीवार अखबार तैयार किए। अखबार के नाम रखने से लेकर संपादन तक की भूमिका उन्होंने निभाई। वे अपने-अपने काम में इतने मनोयोग और तन्मयता से लगे थे, उन्हें देखते ही बनता था। मैं यह सोच रहा था कि ऐसा माहौल स्कूलों में क्यों  नहीं बन सकता?

Saturday, November 28, 2009

स्कूल बिना पढ़ाई : शिक्षक दंपति की मेहनत रंग लाई

केरल में एक शिक्षक दंपति ऐसे हैं, जिन्होंने अपने बच्चों को कभी स्कूल नहीं भेजा। बल्कि खुद ही बच्चों की शिक्षा-दीक्षा की। आज उनके बच्चे पढ़ाई में किसी से पीछे नहीं हैं। बरसों पहले उन्होंने खुद सरकारी स्कूल से त्यागपत्र देकर खुद ही अपने बच्चों की पढ़ाई की जिम्मेदारी ली। पर घिसे-पिटे सरकारी स्कूलों की तरह नहीं बल्कि अपने नए और अनूठे तरीके से। आज उनके बच्चे किसी से कम नहीं हैं। बल्कि शिक्षा के अलावा और भी क्षेत्रों में उनकी प्रतिभा निखर रही है। उनका यह अनूठा आश्रमनुमा स्कूल पालक्कड़ जिले के चित्तूर में है। इस आवासीय स्कूल में 10 बच्चे पढ़ते हैं। स्कूल का नाम सारंग है।

इस स्कूल में बच्चे परीक्षा के लिए नहीं पढ़ते और न ही उन्हें पाठ्यक्रम पूरा करने का दबाव है। वे यहां हर तरह के दबाव से मुक्त हैं, आजाद हैं। वे सीखने के लिए पढ़ते हैं। मजे के लिए पढ़ते हैं। वे रोज अखबार पढ़ते हैं, उस पर चर्चा करते हैं। खेल-खेल में शिक्षा की शिक्षण पद्धति की बातें बहुत होती हैं, लेकिन केरल में इसे अमल में लाया जा रहा है। इस शिक्षक दंपति के बड़े बेटे गौतम को चार भाषाओं के जानकार हैं। वे वेब डिजाइनिंग से लेकर खेती-किसानी के कई काम करते हैं।
गौतम की तरह ही उनकी दोनों बहनें कन्नकी(14) और उन्नीआर्चा(12) भी इसी पद्धति से पढ़ाई कर रही हैं। कन्नकी की मूर्तिकला में रुचि है। जबकि उन्नीआर्चा वायलिन और मृदंग में अपनी प्रतिभा निखार रही हैं। दोनों मर्शल आर्ट, भोजन पकाना और कम्प्यूटर सीख रही हैं। उनके साथ और भी बच्चे सारंग स्कूल में पढ़ते हैं।कुछ समय पहले गौतम सारंग से हुई बातचीत के कुछ अंश यहां प्रस्तुत हैं:-

0 आपके मां-बाप दोनों शिक्षक थे और आपको कभी स्कूल नहीं भेजा?
00 मेरे मां-बाप की सोच थी कि स्कूल में सिर्फ़ जानकारी मिलती है और उसका इस्तेमाल कैसे और किस उद्देशय के लिए करना है, इसे नहीं सिखाया जाता है। यह विवेक से आता है, समझ से आता है, संस्कृति से आता है। मौजूदा शिक्षा व्यवस्था की समस्या है कि वह हमें यह नहीं सिखा पा रही है।
0 जब आप एक दिन भी स्कूल नहीं गए तब आपने कैसे सीखा?
00 सभी बच्चों में सीखने की प्रक्रिया चलती रहती है उन्हें सिखाने की जरूरत नहीं है। उनमें कौशल रहता है लेकिन उसकी हमेशा उपेक्षा होती है। आप जानते हैं कि सीखने के लिए उचित वातावरण की जरूरत होती है। स्कूल में यह वातावरण नहीं मिलता।
0 आपको घर पर क्या यह वातावरण मिला?
00 मेरे मां-बाप दोनों शिक्षक थे। वे सदैव लिखते-पढ़ते रहते थे। घर में अखबार आता था। जब मां-पिताजी पढ़ते थे तो मैं भी उन्हें देखा करता था। मेरे माताजी-पिताजी कुछ लिखते थे तो एक-दूसरे को पढ़कर सुनाते थे। जैसे वे अपने किसी मित्र को पत्र लिखते थे तो पढ़ते थे। वह मैं भी सुनता था। यह बच्चों की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है कि जैसा बड़े करते हैं उसी प्रकार से बच्चे करते हैं।
यानी मुझे लिखने-पढ़ने का वातावरण घर पर ही मिल रहा था। अक्षर, शब्द और उच्चारण का शुरू से ही परिचय मिल रहा था। मैं हमेशा अक्षरों के बीच में था। इस तरह मैंने 4 साल की उम्र में मलयालम सीखना शुरू कर दिया था। लेकिन मेरी बहन 12 साल की हो गई। उसकी पढ़ने में ज्यादा रूचि नहीं है, उसे दूसरी चीजों में है। यानी हर बच्चा अलग है।
0 आपकी विषय की समझ कैसे बनी?
00 मेरी शिक्षा अलग-अलग टुकड़ों में नहीं हुई। मैं हर कहीं, हर समय सीखता रहता था। जो भी हम देखते हैं, सुनते हैं, वह नई चीज होती है। जो महसूस करते हैं, उसे देखते हैं, सूंघते हैं, उसकी खुशबू लेते हैं, उससे नया अनुभव होता है। उससे हमारे मन में नए-नए सवाल उठते रहते हैं। बच्चों में जन्मजात खोजी प्रवृत्ति होती है।
वे हमेशा सवाल करते हैं। वे जानकारी के लिए हमेशा भूखे रहते है। एक उदाहरण से अपनी बात समझाता हूं। जैसे मैं अपनी बाइक में पेट्रोल भरवाने के लिए पेट्रोल पंप गया। वहां मैंने अलग-अलग जगह पर पेट्रोल और डीजल लिखा देखा। इससे हम अक्षर ज्ञान भी कर सकते हैं। पेटोल के बारे में और जानना चाहेंगे तो रसायन की बात हो जाएगी। और अगर हम पेट्रोल के पैसे देंगे तो गणित का ज्ञान हो सकता है।

0 आपने कितनी भाषाएं सीखी और कैसे?
00 मैंने मलयालम, इरूला (आदिवासी भाषा), अंग्रेजी, तमिल और हिंदी आदि भाषाएं सीखी हैं। मेरा सीखने का तरीका है पहले सुनना, फिर बोलना, फिर पढ़ना, फिर लिखना और अंत में व्याकरण सीखना। यह हो सकता है हम सीखने में कई बार गलतियां करते हैं, लेकिन मैं इन्हें सुधारने के लिए हमेशा तैयार रहता हूं। अगर हम शुरू से ही यही सोचेंगे कि मुझसे व्याकरण की गलतियां हो जाएंगी तो सीखने की प्रक्रिया आगे कैसे बढ़ेगी?

0 तमिल कैसे सीखी?
00 तमिलनाडु हमारा पड़ोसी राज्य है। मुझे फोटोग्राफी का शौक है। मैं वहां कैमरे से खीची गई फोटो धुलवाने जाया करता था। तमिल भाषा से मुझे प्यार हो गया। मैं उसे सीखने की कोशिश करने लगा। कुछ समय में लिखना-पढ़ना तो सीख गया पर अर्थ नहीं समझ पाता था। जब थोड़ा बड़ा हुआ तो पूरा सीखने के लिए मैंने फिर कोशिश की। रेडियो सुनता था, तमिल फिल्म देखता था। इस तरह तमिल सीख गया।

0 और आपने क्या-क्या सीखा?
00 बहुत लंबी सूची हो सकती है। जैसे इलेक्ट्रानिक्स, वेब डिजाइनिंग, फोटोग्राफी, सिनेमेटोग्राफी, भारत नाट्यम, कर्नाटक संगीत, टाइपिंग, कपड़ा बुनना, केरल मार्शल आर्ट, कुकिंग और जैविक खेती, पशुपालन आदि। बैंगलौर की एक विज्ञापन एजेंसी के साथ एक विज्ञापन बनाने में मदद की। सहायक कैमरामेन का काम किया। इसके अलावा, मलयालम की दो-तीन फिल्मों में सहायक सिनेमेटोग्राफी का काम किया।
हमारे घर में छोटा पुस्तकालय है। उसमें तरह-तरह की किताबें हैं। मेरे मां-पिताजी और अब मेरे भी अलग-अलग क्षेत्र में काम करने वाले मित्र हैं। कई बार मैं उनके साथ उनके काम में सहयोग करते-करते सीखा। यात्राएं करता हूं। जो काम सीखना है उससे जुड़ता हूं। मैं हमेशा सीखता रहता हूं। इस तरह हमारे आसपास ही ज्ञान का भंडार है। अब इंटरनेट से भी हम सीख सकते हैं।

0 यानी आपने काम के साथ सीखा है?
00 जी हां! सीखने की प्रक्रिया यहीं है। आप पुस्तकों से सीखें या सीधे फील्ड में जाकर या लोगों से बातकर, यही प्रक्रिया सीखने की है।