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Friday, December 28, 2012

सतपुड़ा का मैला आंचल


कश्मीर उप्पल
 
हमारे नर्मदांचल के लेखक, पत्रकार, संपादक, एकिटविस्ट बाबा मायाराम जमीन से जुडे़ मुददों पर लिखने वाले के रूप में जाने जाते हैं। उनके लेखन में देस की मिटटी की सोंधी महक होती है। बाबा मायाराम का लेखन ही नहीं वरन उनका संपूर्ण लेखकीय कर्म हमें साक्षात भूमि की भाषा-भूषा से जोड़ देता है। यह उनके लेखन की विषेषता है कि हमें महसूस होता है कि हम ही साक्षात रूप से गरीब ग्रामीणजनों से मिल रहे हैं। आदिवासियों तथा पाठक के बीच में से लेखक का हटे रहा बाबा की विषेषता है। वे स्वयं प्रयास कर हमें कुछ नहीं दिखाते वरन हमें उठाकर ग्रामीण अंचल के किसी गांव में पहुंचा देते हैं।

सतपुड़ा के बाशिन्दे बाबा मायाराम के जादुई लेखन का वह संग्रह है जिसमें होकर हम गांव और जंगल के बाशिन्दे से मिलते हैं। इन बाशिन्दे में सतपुड़ा के जंगल के आदिवासियों का ही नहीं शेर, गाय, बैल और पक्षियों का जीवन दर्ज है। पालतू पशुओं के साथ-साथ जंगल के पशुओं को भी आदिवासियों के जीवन का अंग मानने वाले बाबा जंगल के उस दर्द का बखान करते हैं जिसने सभी को उदास और अकेला कर दिया है।

पहले कभी आदमी खुद तय करता था वहां कहां बसे रहे, बोये खाये और अपना सामाजिक जीवन बनाये। पर आज व्यवस्थाएं तय करती हैं कि आदमी कहां रहे? कम से कम आदिवासियों से तो यह मौलिक अधिकार छीन ही लिया गया। अब यह खतरा जंगलों से होता गांव-गांव में भी पैर फैला रहा है।

बाबा कहते हैं कि होशंगाबाद विस्थापितों का जिला बन गया है। 1970 में बने तवा बांध से लेकर सतपुड़ा टाइगर रिजर्व, पू्रफरेंज आदि के कारण कई गांव विस्थापित कर दिये गये हैं। बाबा मायाराम इन्हीं विस्थापितों के गांव में हमें ले जाकर खड़ा कर देते हैं और हम देखते और सुनते जाते हैं।

बाबा सबसे पहले हमें आदिवासी गांव धांई ले जाते हैं। "मैं बहुत अकेला हो गया हूं। मेरे घर मं यहां आने पत्नी मेत्रोबाई, पुत्र सुकुमार, नाती, भाई बलवंत और उसकी लड़की की हो गई हैं। जो पैसा था, सब खत्म हो गया। घर में जो गहने-जेवर थे वे भी बिक गए। घर में खाने को नहीं है तो इलाज से कहां से करवाएं?" यह कहना है आधार सिंह का। आधार सिंह नई धांई के निवासी है, जिसे चार वर्ष पहले बोरी अभयारण्य से विस्थापित करके बाहर बसाया गया है। घर में आई मुसीबत के कारण उसकी छोटी बेटी रजनी ने स्कूल छोड़ दिया। वे एक नाती की पढ़ाई को लेकर भी चिंतित हैं। इनकी लड़कियां जलाऊ लकड़ी का गटठा बेच रही हैं, उससे जैसे-तैसे घर की गुजर बसर चल रही है।

मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में बोरी अभयारण्य भारत का पहला आरक्षित वन है। अब बोरी अभयारण्य, सतपुड़ा राष्ट्रीय उधान और पचमढ़ी अभयारण्य को मिलाकर सतपुड़ा टाइगर रिजर्व बनाया गया है। कुल मिलाकर आदिवासियों के 75 गांव है और इतने ही गांव सीमा से लगे हुए हैं।  आज नई धांई में नदी के बदले हैंडपंप है। बोरी में अंदर धांई में सोनभद्रा नदी बहती थी। वहां पानी इफरात था, आज वे बूंद-बूंद के लिए मोहताज हैं। बोरी अभयारण्य के अंदर पुराने गांव में कोरकू आदिवासियों का जीवन जंगल पर आधारित था। वहां तेंदू,अचार, गोंद, फल-फूल, कंदमूल (ननमाटी, जंगली रतालू, बेचांदी, कडुमाटी,) भभोड़ी (कुकरमुत्ता) आदि बहुतायत में मिलते थे। अब इन नये बसे गांव में जीने का कोई सहारा नहीं होने के कारण महिलाओं को सिरगटठा (जलाऊ लकड़ी) बेचने का काम करना पड़ता है।

विस्थापन के समय यह दलील दी जाती है कि बच्चों का भविष्य बेहतर होगा। नई धांई मे एक ही कक्षा में पांच कक्षाओं के बच्चे ठुंसे हैं। मैले-कुचेले, फटे-पुराने कपड़े पहने आपस में बतिया रहे हैं। नये बसे गांव धांई के कई-कई चित्र हमारे सामने आते हैं। बच्चों के माता-पिता रोजगार के लिए सुबह ही कहीं चले जाते हैं। बच्चे अपने जंगल को याद कर उदास हो जाते हैं।

यही कहानी हर गांव की है। डोबझिरना की कहानी तो और भी दुखदायी है। विस्थापन कितनी उलझन भरी प्रकि्रया है कि यह अपने रिश्तेदारों और मिलकर रहने वाले लोगों को आपसी अलगाव पैदा कर रही है। बोरी अभयारण्य के गांव धांई के लोगों को बसाने के लिए पहले से बसे डोबझिरना के लोगों को जमीन से बेदखल कर दिया गया। जिस जंगल को बचाने के लिए आदिवासियों का विस्थापन किया गया उसी जंगल के हजारों पेड़ काट-काटकर नये गांवों को बसाया गया। जंगल काटने के पीछे व्यवस्था के छोटे बडे़ लोगों के अपने-अपने हितों की कहानी अलग से है।

"बचपन की बहुत सी यादें हैं। इस जंगल के माहुल के फल खाते थे। अचार, तेंदू, महुआ खाते थे। नदी में कूद-कूदकर नहाते थे। वहां ठंडा वातावरण रहता था। पेड़ों की छांव में खेलते थे। लेकिन अब हमारी पूरी जिंदगी बदल गई है। सिरगटठा बेचने के अलावा दूसरा कोई काम नहीं है। न हम ढंग से पढ़े और न ही कभी मौका मिला।"
यह कहना है इंदिरा नगर के जबरसिंह का। सतपुड़ा राष्ट्रीय उधान बनते समय इसका गांव नीमघान को विस्थापित कर दिया गया था।

इंदिरा नगर में बसे लोगों का कहना है कि न तो उन्हें कोई मुआवजा मिला न जमीन। मकान बनाने के लिए इंदिरा आवास योजना के अंतर्गत 1500 मिले, शायद इसी कारण इंदिरा  नगर नाम पड़ गया था।
इसी तरह के अनेक गांव हैं। बाबा मायाराम काजरी-रोरीघाट, नयाखेड़ा, सांडिया, छींदापानी, गाजनिया बेड़ा, रांईखेड़ा आंजनखेड़ा अनेक गांव ले चलते हैं। इन गांवों की अपनी -अपनी दर्द भरी कहानी है जिसे गांव के लोग और बच्चे अपने-अपने तरीके से सुनाते हैं।

 हम शहरों में रहने वाले लोग आदिवासियों के दुख दर्द हैरानी से सुनते रहते हैं। शहरों में अतिक्रमण हटाने वाला शासन-प्रशासन शहरी लोगों से अनुनय विनयं किया करते रहता है। शहर की सड़कें सामने वालों का रौब देखकर खुद अपना मार्ग बदल लेती हैं। कैसे एक देश में सरकार के दो-दो कानून चलते हैं। जंगल में बसा आदिवासियों का एक छोटा सा गांव इसलिए उजाड़ दिया जाता है कि देश का विकास करना है और पर्यावरण को बचाना है। वहीं दूसरी ओर देष की सरकारें बड़े से छोटे षहरों में बिना अनुमति बनाई गई गैरकानूनी कालोनियों को कानूनी मान्यता दे देती हैं। एक देश का एक कानून उसके नागरिकों के लिए अलग-अलग तरह से लागू होता है। समझ में नहीं आता है कि जंगली कानून कहां चल रहा है? जंगल में या शहरों में? इस पुस्तक में तवा के मछुआरों की कहानी मालिक से वापिस चोर शीर्षक से दी गई है जिससे सरकार के गलत काम करने का तरीका हम देखते हैं। इसी तरह विस्थापन के डर से सहमी हैं जंगल की बेटियां, आदिवासी छात्राओं की दर्द भरी कहानी है।

बाबा मायाराम की लगभग 70 पृष्ठों की यह पुस्तक हमारा परिचय प्रशासनिक भेदभाव और राजनीतिक उदासी की दुनिया से कराती है। कसाईघर को ले जाये जाने वाले जानवरों की तरह आदिवासियों को मौत के खूंटों से बांध दिया जाता है। बाबा मायाराम की पुस्तक नगर केंदि्रत सोच पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह लगाती है। इस पुस्तक को पढ़ते हुए लगता है कि हम न जाने दुनिया के किस कोने की दुनिया की बातें पढ़ रहे हैं। हमारी  व्यवस्था के एक अमानवीय चेहरे की यह कहानियां यह भी बताती हैं कि हमारा आंचल भी कितना मैला है।

(साप्ताहिक नगरकथा, 23 दिसंबर, इटारसी से प्रकाशित)

Friday, November 30, 2012

अठखेलियां करती मनोरम नर्मदा

नर्मदा जाने का मौका तलाशता रहता हूं।  भाई दूज पर जब बहन के घर नरसिंहपुर गया तो फिर संयोग बन गया। बहन ने कहा -इस बार बरमान घाट की बजाय चिनकी घाट चलेंगे। वो ज्यादा अच्छा है।
हम आॅटो से जाने तैयार हो गए। छीगरी नदी का पुल पार कर जब गांधी प्रतिमा से आॅटो मुडा तो वह रास्ता जाना-पहचाना था। यहीं बरसों पहले गिरिराज स्कूल में एक वर्ष पढ़ाई की थी। रोज पैदल आना-जाना होता था।
सड़क के दोनों ओर खेतों में किसान बोउनी कर रहे थे। हरे चने के पौधे मिट्टी के ढेलों के बीच से ऊपर झांक रहे थे। घूरपुर के मोड़ के आसपास एक खेत में मेरी निगाह उस खेत पर पड़ी जिसमें ज्वार के भुट्टे भरे दानों से लदे लटक रहे थे। बिल्कुल मोतियों की तरह दिख रहे थे। उन्हें जी भरके देख लेने की चाह अधूरी रह गई, क्योंकि हमारा आॅटो सड़क पर दौड़ रहा था।
 चलचित्र की भांति पेड़, पौधे, गाय, बैल, गांव और खेत, स्त्री, पुरुष और बच्चे छूटते जा रहे थे। गांवों के गोबर से लिपे-पुते मकान और रंगोली आकर्षित कर रहे थे। कहीं-कहीं सजी -धजी दुकानें, मोटरसाइकिलों पर सवार युवा दिखलाई पड़ रहे थे। शेढ नदी में पानी खूब था,  हालांकि काई से पट गई है। फिर भी पुल से गुजरते हुए मनोरम लगी।
रास्ते में कुछ ग्रामीण महिलाएं भी मिलीं जो पैदल नर्मदा स्नान करने जा रही थीं। दूर-दूर से निजी वाहनों से लोग परिवार समेत पहुंच रहे थे। मवेशी भी पीने के लिए जा रहे थे।
जब हम नर्मदा घाट पर पहुंचे तब दोपहर हो चुकी थी। चाैड़ा पाट, विशाल चट्टानें, उन पर से उफनती अठखेलियां करती सौंदर्य से भरपूर नर्मदा। कल-कल, छल-छल की खनकती आवाज। दूर सामने पहाड़ी और हरा-भरा जंगल। बड़ा ही मनमोहक दृष्य। निहारते ही रहो।
स्त्री, पुरुष, बच्चे स्नान कर रहे हैं। मछुआरे  छोटी-छोटी डोंगियों (नावों) में बैठकर मछली पकड़ रहे हैं। डोगियां पानी में चलती अच्छी लग रही हैं। श्रद्धालु अगर नारियल फोड़ते तो बच्चे प्रसाद के लिए लपक पड़ते।
भोजन-पानी की तलाष में इधर-उधर घूमते-घामते कौव्वों का एक दल पहुंचा। मैं जिस पत्थर पर बैठा था, उसके नजदीक ही वे अपनी चोंच से पानी में कुछ ढूंढने लगे। मैंने बहुत दिन बाद कौव्वों को देखा और वो भी इतने पास से। अब वे दिखते भी नहीं है।
अब बहन स्नान और पूजा कर बाटी-भर्ता बनाने की तैयारी करने लगी। उसने कंडों (गोबर के उपले) की अंगीठी लगा उसे सुलगा दिया। धुआं उठने लगा। गोबर के उपलों की गंध नथुनों में भरने लगी। जलती अंगीठी में भटा, टमाटर और प्याज भुंजने के लिए डाल दिए। इधर तेज गति से आटा गूंथकर गोल-गोल बाटियां बनाई जाने लगी।
अब कंडे जल चुके हैं उनकी राख को समतल कर बाटियां सिंकने डाल दी गई हैं। बहन की मदद के लिए मैं आ गया। बाटियां उलटाने-पुलटाने में मदद की। इसमें चूक हुई बाटियां जल जाएंगी। यानी नजर हटीं तो दुर्घटना घटी। जलते अंगारे में एक बार मेरी बाएं हाथ की अंगुली जल गई। उसका निशान अब भी है।
अब बाटियां सिक चुकी है। बहन ने उन्हें कपड़े से खुड़-खुडाकर (साफ कर) घी लगाया। भर्ता को फ्राई करने के लिए ईंट-पत्थर का चूल्हा बनाया। सूखी लकड़ियां बीनकर आग सुलगाई।
अब तक पेट में चूहे दौड़ रहे थे। स्नान कर सब लोग आ गए। खकरा (पलाश) के हरे पत्तों पर भर्ता, बाटी और सलाद को परोसा जा चुका था। पास ही एक कुत्ता आकर बैठ गया, जिसके लिए बहन ने दो बाटियां अलग से सेकी थी।
लंबे अरसे बाद नर्मदा तट पर छककर स्वादिष्ट भोजन किया। नर्मदा की गोद में हमेशा ही मां का दुलार मिलता रहा है। आनंददायी यात्रा हो गई। अब लौटने की बेला हो गई। हम घाट के चढ़ाव के कारण उपर तक पैदल गए। देखते हैं कि वह कुत्ता भी हमारे पीछे पीछे विदा करने आ गया, जिसे बहन ने बाटियां खिलाई थी। जब तक हम आॅटो न बैठ गए, वह खड़ा रहा। मैं उसे तब तक देखता रहा जब तक वह आंखों से ओझल न हो गया।
लेकिन मेरा आनंद तब काफूर हो गया जब मैंने नर्मदा की हालत पर विचार किया। शहरीकरण, औद्योगीकरण और नए पावर प्लांटों के कारण नर्मदा में प्रदूषण बढ़ता ही जा रहा है। बड़े बांध बनाकर उसकी अविरल धारा को पहले ही अवरूद्ध कर दिया गया है। उसकी सभी सहायक नदियां धीरे-धीरे दम तोड़ रही हैं। सवाल यह है कि नर्मदा क्या अक्षुण्ण रह पाएगी?

Saturday, November 3, 2012

नीली झील और भारत भवन की सैर

जनगढ़ सिंह श्याम का चित्र
आज भोपाल में बड़ी झील के किनारे सिथत भारत भवन जाना हुआ और वहां चित्रों की प्रदर्शनी देखी तो देखता ही रह गया। कैनवास पर रंगों की अनोखी मनमोहक छटा। यहां एक तरफ प्रसिद्ध चित्रकार जे. स्वामीनाथन व रजा साहब की पेटिंग्स थी थ दूसरी तरफ मंडला के आदिवासी युवक जनगढ़ सिंह श्याम और उनकी पत्नी ननकुसिया का रचना संसार सजीव हो रहा था।

भारत भवन के खुलने में थोड़ी देर थी। मैं पास ही बड़ी झील के किनारे पत्थरों पर बैठ गया। दूर-दूर तक नीला पानी। नजरें जहां तक जातीं पानी ही पानी। दूर सफेद बगुलों की टोलियां बैठी हुर्इ। बहुत ही खूबसूरत नजारा।
भारत भवन में दोपहर 1 बजे गए और 3 बजे तक रहे। इस दौरान वहां के कुछ कलाकारों, कर्मचारियों व चित्रकला के विधार्थियों से मुलाकात की। पेंटिंग्स व मूर्तिकला तो देखी ही। मुकितबोध, नागार्जुन, त्रिलोचन व अज्ञेय के कविता पोस्टर भी पढ़े। मुकितबोध के हस्तलिखित पत्र व कविताएं पढ़कर बहुत अच्छा लगा।

जनगढ़ सिंह श्याम का चित्र
मूर्तिकला के स्टूडियो में तीन चार युवा मिटटी से आकृति उकेर रहे थे। एक उभरती मूर्तिकार जिसने हाल ही बड़ोदरा से फाइन आर्ट की स्नातक डिग्री हासिल की है, यहां रोज मूर्ति बनाने का अभ्यास कर रही थीं। मिटटी को ठोंकना-पीटना, चाक पर चढ़ाकर घुमाना, फिर उसे मनचाहा आकार देना, इसमें वह व्यस्त थी। उसे ऐसा करते देखते ही रहे।

जे जे स्कूल बाम्बे से निकले तुषार मूर्ति बनाने के लिए मिटटी को तैयार कर रहे थे। वह कुछ समय के लिए इस स्टूडियो में मूर्तिकला सीख रहे हैं। इसी प्रकार एक युवती जिसने एक महिला की मूर्ति की बनार्इ थी, उसकी मुंदी आंखें को खोल रही थी और कानों को आकार दे रही थी।

यहां लोहे, पीतल, मिटटी व अन्य धातुओं से बनी मूर्तियों की प्रदर्शनी लगी हुर्इ है, जो यहां एक नए वातावरण का निर्माण करती हैं। ऐसा लगता है, झील से जो हवा इनसे टकराती है, जिससे एक नर्इ ध्वनि निकलती है, वह सुरीली व मोहक है।

रूपंकर में चित्रों की प्रदर्शनी लगी थी जिसमें जनगढ़सिंह श्याम, जो मंडला के आदिवासी कलाकार थे और भारत भवन से जुड़े हुए थे, के चित्र भी थे। जनगढ़ की स्मृति इसलिए भी आत्मीय है क्योंकि उन्होंने मेरी कहानी के लिए चित्र बनाए थे। यह कहानी वर्ष 1984 में एक पत्रिका में छपी थी।

आज उनके चित्र देखकर उनकी याद ताजा हो गर्इ, जो सुखद है। जनगढ़ के चित्र आदिवासी संस्कृति के प्रतीक हैं। उसकी पत्नी के चित्र भी देखे। मैंने छत्तीसगढ़ में आदिवासी चित्रकारों के जंगली जानवर, मढर्इ मेले, नृत्य, शिकार, पक्षियों के बहुत सुंदर चित्र देखे हैं, जो मेरे स्मृतियों में बसे हुए हैं।

 जे. स्वामीनाथन की चिडि़या और पहाड़ तो देखे ही रजा की विराट बिन्दु से भी साक्षात्कार हुआ। स्वामीनाथन भारत भवन के शुरूआत से जुड़े और उन्होंने उसे एक आकार दिया। सतपुड़ा की पहाडि़यों में जब मैं अपने बेटे के साथ पक्षियों को विचरण करते देखता हूं, स्वामीनाथन की याद यक ब यक आ जाती है। उनकी स्मृति तबसे मेरे मानसपटल पर अंकित है जब वे गैस पीडि़तों के साथ सड़क पर उतर आए थे।

जे. स्वामीनाथन का चित्र
रजा पकी उम्र फ्रांस से वतन लौट आए हैं, और सकि्य हैं। वे इसी मध्यप्रदेश के माटी पुत्र हैं। उनके संस्मरण नरसिंहपुर में जगदीश भार्इ व रमेश तिवारी सुनाते हैं।

आज मुझे कलागुरू विष्णु चिंचालकर की भी याद आ गर्इ, जिन्होंने मुझे देखना सिखाया। एक कलादृषिट दी, जिसे  मैं अपने लेखन के जरिए सामने लाने की कोशिश करता रहा हूं। वे कबाड़ से जुगाड़ से बेहतर कृतियों को सृजित कर देते थे। ऐसा मैंने यहां के कलाकारों को बताया। मुझे आष्चर्य हुआ कि उन्होंने कलागुरू विष्णु चिंचालकर का नाम नहीं सुना था।

दीपावली के बाद लगने वाले मढर्इ मेले, मोरपंख से बनी ढालें, देवताओं के चबूतरा, त्रिशूल, शादी-विवाह के समय लगने वाले खम्भ, घड़े, हाथी और मिटटी के बैलों को प्रदर्शित किया गया है।

 चित्रकला कभी लोकमानस में व्याप्त थी। कुम्हारों की  घड़े व सुराहियों पर अंकित चित्र, भितित चित्र, तुलसी कोट व घर के आले व आलमारियों में चित्रकारी, लकडि़यों के दरवाजों पर नक्काशियां जनसाधारण में आम बात थी। आदिवासियों में यह अब भी शेष है।

जे. स्वामीनाथन का चित्र
मैं लौटते समय में सोच रहा था क्या संस्कृति को बचाने के लिए नुमाइश ही काफी है? या इसे संग्रहालयों से बाहर जनजीवन में इसे स्थापित करने की जरूरत है। अगर ये सब बच्चों को दिखार्इ जाएं और कलाकार भी देखें  तो नर्इ संस्कृति की मुहिम शुरू हो सकती है।

Tuesday, October 30, 2012

सतपुड़ा मेरी खिड़की पर


पिछले कुछ महीनों से पिपरिया से इटारसी टे्रन से आना-जाना हो रहा है। इस दौरान कर्इ लोगों से साक्षात्कार होता है। इनमें सब्जी वाले, दूध वाले, मूढगटठा (जलाऊ लकड़ी) व बकरियों के लिए पतितयां ले जाने वाली महिलाएं आदि शामिल होते हैं। इसके अलावा, निर्माण मजदूर, नौकरी पेशा वाले, कालेज के छात्र छात्राएं और स्कूली बच्चे होते हैं।

खिड़की से बाहर देखो तो और भी खूबसूरत नजारा दिखार्इ देता है। फिल्म की रील की तरह चलचित्र दौड़ते दिखार्इ देते हैं। कभी सतपुड़ा की हरी-भरी पहाडि़यां दिखती हैं तो कभी खेतों में हिरण और चिंकारा कुलांचे भरते दिखते हैं। कभी रंग-बिरंगी साडि़यों में महिलाएं काम करते हुए दिखती हैं तो कभी खेतों में निंदार्इ-गुड़ार्इ लोग दिख जाते हैं। कभी छोटे-छोटे नदी नाले तो कभी दूर-दूर तक खेतों में लहलहाती फसलें।

सोहागपुर में पलकमती नदी के पुल से पान के बरेजे दिखते हैं। यहां के बंगला पान बहुत फेमस हैं। यह बहुत पुराना कस्बा है। यहां पुरानी तहसील हुआ करती थी। इसके बारे में एक कहावत है कि पढ़े न लिखे, सोहागपुर रहन लगे। यह कहावत इसलिए भी है कि यहां पर कचहरी में केस लड़े जाते थे। इसके लिए वकीलों की जरूरत होती थी। सोहागपुर में पुरानी तहसील हुआ करती थी।

यहां कुछ नौकरी पेशा वाले, कोर्ट-कचहरी के कारण पढ़े-लिखे लोग रहते होंगे। यहां की सुराहियां, मिटटी के बर्तन व दुर्गा की मूर्तियां प्रसिद्ध हैं। खुरचन नामक मिठार्इ भी खास है। यहां पहले कपड़ा रंगार्इ का उधोग भी हुआ करता था। साडियां प्रिंट होती थी। घरों में चरखे चलते थे। कपड़ा रंगार्इ अब सिर्फ यादों में है। अब तो पलकमती नदी भी कचरे से पट गर्इ है।

सोहागपुर से चले तो गुरमखेड़ी फिर बागरा तवा स्टेशन आता है। बागरा के कबेलू की प्रसिद्धि थी। यहां कबेलू के भटटे हैं। पर अब लेंटर वाली छतों की वजह से इनकी मांग कम है।

बागरा से सतपुड़ा की हरी-भरी पहाडि़यां मेरी खिड़की के नजदीक आ जाती हैं। जिसके लिए मैं हमेशा खिड़की की सीट पर ही बैठना पसंद करता हूं, जो कर्इ बार मिल जाती है। इन पहाडि़यों को देखकर इसी क्षेत्र के मशहूर कवि भवानी प्रसाद मिश्र की कविता खुद ब खुद याद आ जाती है- सतपुड़ा के घने जंगल, ऊंघते अनमने जंगल।

आगे चले तो बोबदा यानी गुफा के अंदर से टे्रन गुजरती है। यह काफी लंबा है और इसमे घुप्प अंधेरा रहता है। बच्चे व युवा यहां जोर-जोर से कूका (आवाज) लगाते हैं। इसके बारे में मशहूर लेखक भारतेन्दु हरिशचंद्र ने अपने यात्रा वृत्तांत में जिक्र किया है। तवा पुल पर तवा नदी का मनोहारी दृष्य देखते ही बनता है। नीचे नाव चलती दिखार्इ देती हैं। जाल डाले मछुआरे बैठे रहते हैं। तवा बांध भी दिखार्इ देता है।

सोनतलार्इ से स्कूली लड़के-लड़कियां टे्रन में सवार होते हैं, जो गुर्रा में उतर जाते हैं। वे ट्रेन से अप-डाउन करते हैं। बड़ी संख्या में कालेज जाने वाली लड़कियां जाती हैं। यहां से मूढगटठा वाली महिलाएं भी चढ़ती हैं। इन महिलाओं को पहले जंगल जाना पड़ता है, सूखी लकडि़यां बीनना-काटना पड़ता है। फिर वे इटारसी या सोहागपुर या पिपरिया बेचने लाती है। इनमें से कर्इ ऐसी हैं जो अपने घर के लिए भी लकडि़यां लाती हैं, क्योंकि शहरों में जलाउ लकड़ी महंगी है।

सतपुड़ा के इस होशगाबाद जिला भौगोलिक दृषिट से दो हिस्सों में बांटा जा सकता है। एक है सतपुड़ा की जंगल पटटी व दूसरा है नर्मदा का कछार। रेल की पटरियां दोनों को विभक्त करती हैं। दक्षिण में सतपुड़ा की पहाडि़यां और उत्तर में नर्मदा का कछार। जंगल पटटी में मुख्य रूप से गोंड और कोरकू आदिवासी रहते हैं। और नर्मदा के कछार, जो काफी उपजाऊ माना जाता है, में अधिकांष गैर आदिवासी।

अक्सर टे्रन में कुछ पुराने मित्रों व जान-पहचान वाले लोगों से मुलाकात हो जाती है। कुछ समय पहले पिपरिया के होशगाबाद विज्ञान िशक्षण कार्यक्रम से जुडे़ रहे िशक्षक प्रेमशकर भार्गव व एम. एल. पटेल से मुलाकात हुर्इ। उन्होंने विज्ञान षिक्षण दौरान हुए अनुभव साझा किए।

होषंगाबाद विज्ञान षिक्षण कार्यक्रम की षुरूआत किषोर भारती व फें्रडस रूरल सेंटर रसूलिया ने की  थी। बाद में एकलव्य संस्था ने इस काम को व्यवसिथत ढंग से संभाला। एकलव्य ने विज्ञान षिक्षण के अलावा समाज में व खासतौर से बच्चों में किताबें पढ़ने की रूचि विकसित करने के लिए पुस्तकालय भी खोले। पिपरिया एकलव्य पुस्तकालय में जाता रहता हूं, जहां गोपाल राठी से मुलाकात होती है। वे बरसों से पुस्तकालय चला रहे हैं।

 कहा जा सकता है कि सफर में आनंद है, गंतव्य में नहंी। लेकिन गंतव्य पर  तो पहुंचना पड़ता है ही। पिपरिया स्टेषन पर उतरते ही दक्षिण में एक विशाल वृक्ष दिखता है, जिसमें लाखों की संख्या में परिन्दे का आशियाना है। वे उड़ते-उड़ते चहचहाते हुए उस पर कूदते-फांदते हैं। मैं सोचता हूं अगर ये पेड़ न रहे तो ये कहां जाएंगे?